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क्या नेहरु की जानकारी में स्टालिन ने नेताजी को फांसी पर चढ़ाया?

नेताजी सुभाषचंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) का आज जन्मदिन है। उन्हें गुमशुदा हुए 73 साल गुजर चुके हैं। लेकिन आज तक उनकी गुमशुदगी वैसे ही रहस्य बनी हुई है जैसे आजादी मिलने के समय थी। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत (Subhash Chandra Bose Death) को लेकर कई बार तरह-तरह के कयास लगाते जाते रहे हैं। लेकिन साल 2015 में इस रहस्यकथा को तब नए पंख मिल गए जब 10 जनवरी 2015 को भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कोलकाता में मर्चेट चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा आयोजित एक समारोह में दावा किया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) की मौत 1945 में, किसी विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी बल्कि सोवियत संघ के नेता जोसेफ स्टालिन के इशारे पर उनकी हत्या की गई थी।

क्या नेहरु की जानकारी में स्टालिन ने नेताजी को फांसी पर चढ़ाया?
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) का आज जन्मदिन है। उन्हें गुमशुदा हुए 73 साल गुजर चुके हैं। लेकिन आज तक उनकी गुमशुदगी वैसे ही रहस्य बनी हुई है जैसे आजादी मिलने के समय थी। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत (Subhash Chandra Bose Death) को लेकर कई बार तरह-तरह के कयास लगाते जाते रहे हैं। लेकिन साल 2015 में इस रहस्यकथा को तब नए पंख मिल गए जब 10 जनवरी 2015 को भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी (Subrahmanya Swami) ने कोलकाता में मर्चेट चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा आयोजित एक समारोह में दावा किया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) की मौत 1945 में, किसी विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी बल्कि सोवियत संघ के नेता जोसेफ स्टालिन के इशारे पर उनकी हत्या की गई थी।
यही नहीं स्वामी ने सनसनीखेज अंदाज में यह भी दावा किया कि भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) इस बात से अवगत थे कि बोस साइबेरिया के याकुत्स्क जेल में कैद हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी (Subrahmanya Swami) के मुताबिक भारत सरकार के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक 1945 में मौत को धता बताकर बोस चीन के मंचूरिया इलाके में चले गए थे, जो कि उन दिनों रूस के कब्जे में था। उन्हें आशा थी कि रूस उनकी मदद करेगा। लेकिन स्टालिन ने उन्हें गिरफ्तार करके साइबेरिया की एक जेल में डाल दिया।
वहीं उन्हें 1953 में किसी समय या तो फांसी पर चढ़ा दिया गया या उनका दम घोंट दिया गया। स्वामी ने कहा कि यद्यपि इस संबंध में जल्दबाजी में और परिणाम का अध्ययन किए बिना दस्तावेजों को सार्वजनिक करना कठिन है ; क्योंकि ऐसा करने से ब्रिटेन तथा रूस के साथ भारत के रिश्ते प्रभावित होंगे। लेकिन वह इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने के लिए प्रधानमंत्री को राजी करेंगे। मालूम हो कि नेताजी की मौत से संबंधित सरकार के पास कोई 41 फाइलें हैं जिनमें से अभी तक सिर्फ 2 को ही सार्वजनिक किया गया है।
बाकी सभी फाइलों को राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए गुप्त रखा गया है। जबकि नेताजी के परिजन, कुछ इतिहासकार तथा उनके समर्थक सभी फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग पिछले काफी दिनों से कर रहे हैं। वैसे इन शेष फाइलों में क्या रहस्य छिपा है इन फाइलों को खोलने से ही पता चलेगा लेकिन जहां तक विमान दुर्घटना में नेताजी की मौत वाली कहानी है वह कई तरीके से झूठी साबित हो चुकी है। अमेरिका ने नेताजी मामले की जांच करने वाले मुखर्जी आयोग को लिखा था कि ऐसे किसी विमान हादसे का कोई रिकॉर्ड नहीं है।
इसी तरह मुखर्जी आयोग को इस बात का भी पता चला था कि ताइवान के किसी अस्पताल में उस समयावधि के किसी जले हुए शव का भी कोई रिकॉर्ड नहीं है। स्वामी के मुताबिक नेताजी 1947 में जीवित थे और नेहरू इस बात को जानते थे। स्वामी की यह पहली चैंकाने वाली बात है जिसका अब तक के किसी भी जांच आयोग ने जिक्र नहीं किया। वैसे नेताजी की मौत का स्टालिन एंगल कोई पहली बार चर्चा में नहीं आया। पहले भी कई बार ये आशंकाएं उजागर हो चुकी हैं।
सबसे पहले हाल में 27 नवंबर सन 1999 को यह बात चर्चा में तब आयी थी जब एक शोध छात्रा ‘अगर खबरों में आया छद्म नाम नहीं था तो दिमित्री तेरेश्कोवा, के हाथ रूस की बदनाम जासूसी संस्था केजीबी की एक गुप्त चिट्ठी हाथ लग गयी थी जिसके मुताबिक 12 अक्टूबर 1947 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस साइबेरिया की जेल में 138 गैर सोवियत संघी कैदियों के साथ बंद थे।
तब भी इस बात को लेकर खूब चर्चा हुई थी कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को स्टालिन ने फांसी पर लटका दिया था और जापान के ताईहोकू हवाई अड्डे पर हुई विमान दुर्घटना से उनकी मृत्यु एक मनगढ़ंत कहानी थी। लेकिन चर्चाएं चर्चाओं तक ही सीमित रहीं। तब भी केंद्र में बीजेपी की साझा सरकार थी।
वह चुप रही और नेताजी की मौत पहले की ही तरह रहस्य के आवरण में लिपटी रही। दुनिया में शायद ही किसी दूसरी अजीम शख्सियत की मौत इतनी रहस्यमयी हो जितनी कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) की लगातार बनी है। उनकी मौत की रहस्यात्मकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी मौत को भारत के पांच महान रहस्यों में से एक माना जाता है। हालांकि कुछ साल पहले एक बार फिर से जापान के डाक्टर योशिमो ने सार्वजनिक बयान देकर यह साबित करने की कोशिश की थी कि नेताजी की जापानी हवाई अड्डे में विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी (Subhash Chandra Bose Death)।
माना जाता है की उन्होंने उन्हें अंतिम समय देखा था। लेकिन फिर भी उनकी मौत पर से पर्दा नहीं उठ रहा। गुमशुदगी के 73 साल गुजर जाने के बाद हालांकि अब यह आशा तो किसी को नहीं है कि नेताजी अभी कहीं जिंदा होंगे और वक्त आने पर प्रकट होंगे, लेकिन यह जानने की जिज्ञासा जरूर अधिसंख्य भारतीयों में है कि नेताजी की मौत कैसे हुई क्योंकि कोई भी नहीं मानता कि जैसे बताया जा रहा है वैसे ही मौत हुई होगी? सिर्फ भारत के लोग ही नहीं जापान और सिंगापुर में भी लोग इस कहानी को गढ़ी हुई ही मानते हैं।
सवाल है क्या इस सबके चलते स्टालिन वाली कहानी ही सही है ? परिस्थितियों के साक्ष्यों के हिसाब से देखें तो जवाब हां की तरफ ही जाता है। अभी तक आधिकारिक सच यह है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत 18 अगस्त 1945 के ताईहोकू हवाई अड्डे पर हुई विमान दुर्घटना में हुई। जबकि कोई ऐसा उपलब्ध दस्तावेज नहीं है जो यह साबित करे कि उस रोज कोई ऐसी दुर्घटना हुई थी। जबकि उनके रूस के अधिकार क्षेत्र में जीवित चले जाने की कहानी इसलिए समझ में आती है क्योंकि दूसरा विश्वयुद्ध खत्म होते-होते नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के हिटलर के साथ वैचारिक मतभेद हो गये थे। वह हिटलर और धुरी राष्ट्रों के दूसरे नेताओं के साथ अपने मेलजोल भी खत्म कर चुके थे।
इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि दूसरा विश्वयुद्ध खत्म होते ही दुनिया एक खास किस्म के शीतयुद्ध में उलझ गयी थी। नेताजी जानते थे शीतयुद्ध का अगर कोई देश बेहतर मुकाबला कर सकता है तो वह रूस ही है। इसलिए रूस की सहायता लेना नेताजी सही मानते थे। इसीलिए यह बात समझ में आती है कि उन्होंने विश्वयुद्ध के बाद रूस जाने का फैसला किया होगा।
नेताजी की मौत के रूसी कनेक्शन की कहानी इसलिए भी आकर्षित करती है क्योंकि सोवियत संघ के बिखरने के बाद केजीबी ने उन तमाम दस्तावेजों को या तो गायब कर दिया या उजागर नहीं किया जो नेताजी की मौत से संबंधित थे।
लेकिन जब केजीबी का मुख्यालय इतिहास के शोधार्थियों के लिए खोल दिया गया तो दिमित्री तेरेश्कोवा ‘जैसा कि तब खबर के साथ नाम फ्लैश हुआ था, के हाथ एक चिट्ठी लग गयी जो नेताजी की मौत की तरफ इशारा कर रही थी। वास्तव में जब केजीबी के गुप्त संग्रहालय से नेताजी की फाइलें गायब पाई गई थीं, तभी यह अफवाह गर्म होने लगी थी कि नेताजी से संबंधित जरूर ऐसी कोई बात है जिसे रूस छिपाना चाहता है। यह आरोप इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि जापान के जिस तेनकोजी मंदिर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां रखी हुई हैं, कई बार उन अस्थियों को केजीबी से जुड़े जासूस किसी और व्यक्ति की अस्थियां करार दे चुके हैं।
केजीबी से जुड़े रहे दो जासूसों ने 1973 में वाशिंगटन पोस्ट को बिना अपना नाम बताते हुए यह बताया था कि वे लोग दावे के साथ कह सकते हैं कि तेनकोजी मंदिर में रखी हुई अस्थियां नेताजी की नहीं हैं। यह बात इसलिए भी सच के करीब जाती हुई लग रही है क्योंकि नेताजी की मौत की जांच के लिए बनाए गए खोसला आयोग ने भी विस्तृत साक्ष्यों और दस्तावेजों के जरिए यह साबित किया था कि नेताजी शुरू से ही सोवियत संघ जाना चाहते थे। वह सोवियत संघ से ही भारत की आजादी का संघर्ष चलाना चाहते थे। मगर उनका सोवियत संघ से पहले जर्मनी पहुंचना आवश्यक था। क्योंकि उनके जो अंतर्राष्ट्रीय सूत्र थे, उनकी पहुंच सिर्फ जर्मनी तक ही थी।
साथ ही यह भी सच था कि अगर नेताजी को उस जमाने में तुरंत कहीं से सैनिक सहायता और आर्थिक मदद मिल सकती थी तो वह देश जर्मनी ही था। क्योंकि जर्मनी में मौजूद नेताजी के सूत्रों ने जर्मनी के शासकों से इस तरह के आश्वासन भी ले लिये थे। इसलिए नेताजी सोवियत संघ जाने के बजाय पहले जर्मनी पहुंच गये। उन दिनों जर्मनी में भारत के हजारों सैनिक कैद थे। जर्मनी के शासकों ने नेताजी को आश्वासन दिया था कि वे इन भारतीय सैनिकों को कैद से रिहा कर देंगे जिनका उपयोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपनी आजाद हिंद फौज में कर सकते थे। यह एक और महत्वपूर्ण कारण था जिसके चलते नेताजी ने सोवियत संघ की बजाय पहले जर्मनी ही जाना उचित समझा।
इस तरह नेताजी जर्मनी पहुंच गये और हिटलर के सहयोग के जरिए आजाद हिंद फौज के गठन और संचालन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी। जर्मनी और जापान से मिली सैनिक और आर्थिक सहायता की बदौलत नेताजी ने ब्रिटिश सेनाओं के साथ जमकर मुकाबला किया। लेकिन आजाद हिंद फौज को शुरू-शुरू में तो कई सफलताएं मिलीं, लेकिन समय बीतने के साथ ही उसकी सफलताओं का सिलसिला थम गया। इस शुरुआती कामयाबी के बाद उसके पांव उखड़ने लगे। दरअसल तब तक जर्मनी भी पराजय की कगार पर पहुंच गया था और जापान एक तरह से हारी हुई लड़ाई में आत्महत्या कर रहा था। इस वजह से आजाद हिंद फौज को जापान और जर्मनी दोनों ही देशों से मिलने वाली आर्थिक सहायताएं धीरे से बंद हो गयीं ।
जबकि बिना आर्थिक सहायता के आजाद हिंद फौज का अंग्रेजी सेनाओं के सामने टिक पाना असंभव सा हो गया। 1945 तक आते-आते नेताजी सुभाषचंद्र बोस इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि अब अगर भारत को कहीं से अपनी स्वतंत्रता आंदोलन चलाने के लिए सहायता मिल सकती है तो वह देश रूस यानी तत्कालीन सोवियत संघ ही था। इसलिए उन्होंने सोवियत संघ में अपने सूत्रों को स्थापित किया और उन सूत्रों की बदौलत वह सोवियत संघ जाकर आजाद हिंद फौज को एक बार फिर से सक्रिय करने का ख्वाब देखने लगे।
स्टालिन के किसी खास दूत के जरिए उन्हें स्टालिन से मिलने और अपनी योजना के लिए स्टालिन से सहायता मिलने के आश्वासन के बाद नेताजी सुभाषचंद्र बोस एक गुप्त योजना के तहत रूस की यात्रा का कार्यक्रम बना लिया। इस योजना के मुताबिक नेताजी एक निश्चित समय सीमा पर फार्मोसा पहुंच गये। दरअसल, ताईहोकू हवाई अड्डा यहीं पर स्थित है। इसी हवाई अड्डे से उन्होंने एक उड़ान के जरिए 18 अगस्त 1945 को सोवियत संघ के लिए उड़ान भरी थी।

नेता जी की पत्नी एमिली।
लेकिन आगे इस कहानी में यह जोड़ दिया गया कि विमान उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें नेताजी की मौत हो गयी। लेकिन कई उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है कि नेताजी अपने इस गुप्त मिशन के चलते मंचूरिया तक पहुंच गये थे लेकिन हिरोशिमा और नागासकी पर अमरीका द्वारा परमाणु बम गिराये जाने के बाद जापान की सेनाएं अचानक युद्ध में पस्त हो गयीं और वे पराजित होकर पीछे लौटने लगीं। इस वजह से रूसी सेनाओं ने मंचूरिया को जापानियों से छीन लिया और उस समय वहां मौजूद नेताजी सुभाषचंद्र बोस को बंदी बनाकर अपने कब्जे में ले लिया। बाद में ये रूसी सैनिक उन्हें रूस ले गये और स्टालिन ने नेताजी को साइबेरिया की उन खतरनाक जेलों में डाल दिया जहां से कैदी सिर्फ मौत के बाद ही बाहर आते हैं।
नेताजी के एक भतीजे अमियनाथ बोस ने खोसला आयोग को बताया था कि एक बार उन्हें एक ब्रिटिश राजनयिक ने फोन किया और फोन पर बताया कि 1947 में नेताजी के साथ रूसी अधिकारियों ने बहुत ही बुरा बर्ताव किया था। नेताजी के इस भतीजे ने यह भी बताया था कि उनके पिता यानी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के भाई शरदचंद्र बोस ने भी 1949 में अपने बेटे को बताया था कि उन्हें कुछ कूटनीतिक सूत्रों के जरिए पता चला है कि सोवियत संघ में नेताजी को साइबेरिया के यातना शिविर में रखा गया था और 1947 में स्टालिन ने उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया था।
गौरतलब है कि नेताजी के बड़े भाई शरदचंद्र बोस ने इस संबंध में तुरंत ही तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल को सूचित किया था और श्री पटेल ने मास्को में उस समय मौजूद भारतीय राजदूत डा. राधाकृष्णन को एक पत्र लिखा था कि उन्हें इस समूचे मामले की असली खबर दी जाए। लेकिन दुर्भाग्य से डा. राधाकृष्णन ने सरदार बल्लभ भाई पटेल के खत का जवाब कभी नहीं दिया। इन तमाम साक्ष्यों की तब और पुष्टि हो जाती है जब दिमित्री तेरेश्कोवा जैसे शोधार्थियों को केजीबी की वह फाइल मिलती है जिससे यह साबित होता है कि 1947 में नेताजी जिंदा थे। क्या इसका यह साफ-साफ मतलब नहीं निकलता कि नेताजी किसी विमान दुर्घटना में नहीं मरे थे बल्कि सोवियत संघ के तत्कालीन शासक स्टालिन ने इस सम्बंध में उन्हें फांसी पर लटका दिया था?

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