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Subhash Chandra Bose Birthday: कैसे अपने से 14 साल छोटी इस लड़की के प्यार में पड़ गए ''नेताजी''

साल 1934 की बात थी। सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) उस समय ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में थे। उस समय उनकी पहचान एक कांग्रेसी योद्धा के रूप में की जाती थी। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 1932 को उनकी तबीयत खराब होने लगी। जिसे देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें इलाज के लिए यूरोप जाने की इजाजत दे दी। जहां उन्हें एक लड़की से प्यार हो गया।

Subhash Chandra Bose Birthday: कैसे अपने से 14 साल छोटी इस लड़की के प्यार में पड़ गए नेताजी
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साल 1934 की बात थी। सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) उस समय ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में थे। उस समय उनकी पहचान एक कांग्रेसी योद्धा के रूप में की जाती थी। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 1932 को उनकी तबीयत खराब होने लगी। जिसे देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें इलाज के लिए यूरोप जाने की इजाजत दे दी। लेकिन जैसा कि नेताजी का स्वभाव था। वह केवल वहां इलाज ही न करवाते। नेताजी जब विएना पहुंचे तो उन्होंने निश्चय किया कि वो यूरोप में रह रहे भारतीय छात्रों को आजादी की लड़ाई के लिए एकजुट करेंगे। इसी बीच एक यूरोपीय प्रकाशक ने उनसे 'द इंडियन स्ट्रगल' पर एक किताब लिखने को कहा।
जिसके लिए बोस तैयार हो गए। लेकिन उन्हें एक सहयोगी की जरूरत पड़ी। जिसे अंग्रेजी की टाइपिंग भी आती हो। बोस के एक दोस्त डॉ माथुर ने उन्हें दो लोगों के बारे में बताया। बोस ने दोनों
की जानकारी को देखते हुए बेहतर उम्मीदवार को बुलाया। लेकिन वह इंटरव्यू से संतुष्ट नहीं हुए। जिसके बाद उन्होंने दूसरे उम्मीदवार को इस काम के लिए बुलाया।

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ये दूसरी उम्मीदवार थीं बोस से 14 साल छोटी एमिली शेंकल (Emily Schenkl)। एमिली शेंकल 23 साल की एक खूबसूरत ऑस्ट्रियाई नागरिक थीं। एमिली ने जून 1934 में सुभाष चंद्र बोस के साथ काम करना शुरू किया। उस समय बोस की उम्र 37 साल थी। सुभाष चंद्र बोस से ने एमिली को अपनी सहायिका के तौर पर चुन लिया।
यहां तक बोस भारत की आजादी के लिए लड़ रहे थे लेकिन अचानक से उनमें बदलाव आ गया। सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई शरत चंद्र बोस के पोते सुगत बोस ने सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर 'हिज़ मैजेस्टी अपोनेंट- सुभाष चंद्र बोस एंड इंडियाज स्ट्रगल अगेंस्ट एंपायर' नाम की एक किताब लिखी है।
जिसमें उन्होंने लिखा है कि एमिली से मुलाकात के बाद बोस के जीवन में परिवर्तन आने लगा। सुगत बोस की किताब में लिखा है कि सुभाष को प्रेम और शादी के कई ऑफर मिल चुके थे लेकिन हर बार बोस ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेकिन एमिली की खूबसूरती ने सुभाष पर जादू सा कर दिया।
ऑस्ट्रिया की एक कैथोलिक परिवार में पैदा हुई एमिली के परिवार वालों को पसंद नहीं था कि उनकी बेटी किसी भारतीय के यहां काम करे। लेकिन जब वो लोग सुभाष चंद्र बोस से मिले तो उनके व्यक्तित्व के कायल हो गए। एमिली और बोस दोनों को ही पता था कि उनका रिश्ता बेहद अलग है और मुश्किलों भरा रहेगा।
एक दूसरे को प्रेम पत्र लिखने के दौरान एमिली जहां नेता जी को मिस्टर बोस कहती थीं। जबकि बोस एमिली को मिस शेंकल या पर्ल शेंकल कहते थे। एक पत्र में बोस ने लिखा था कि माय डार्लिंग, समय आने पर ग्लेशियर भी पिघल जाता है। ऐसा ही हाल मेरे अंदर अभी है। मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूं, ये बताने के लिए कुछ लिखने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं।

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जैसा कि हम एक-दूसरे को आपस में कहते हैं, माय डार्लिंग, तुम मेरे दिल की रानी हो। लेकिन क्या तुम मुझसे प्यार करती हो। बोस ने इसी पत्र में अपनी चिंता भी जाहिर की थी। उन्होंने लिखा कि मुझे नहीं पता मेरा भविष्य क्या होगा। शायद आगे की जिंदगी जेल में बितानी पड़े। या गोली मार दी जाए। हो सकता है मुझे फांसी पर लटक दिया जाए।
हो सकता है मैं कभी तुमसे मुलाकात न कर पाऊं। हो सकता है तुम्हें पत्र न लिख पाऊं। लेकिन भरोसा करो, तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगी, मेरी सोच और मेरे सपनों में रहोगी। अगर हम इस जीवन में नहीं मिले तो अगले जीवन में मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।

खूफिया रही शादी

पत्रों से एक दूसरे से बातचीत के बाद जब दोनों मिले तो उन्होंने शादी कर ली। यह शादी कहां और कब हुई इसके बारे में कोई नहीं जानता लेकिन कृष्णा बोस के मुताबिक एमिली ने बताया था कि 26 दिसंबर 1937 को उनके 27वें जन्मदिन पर ये शादी ऑस्ट्रिया के बादगास्तीन में संपन्न हुई थी।
जो उन दोनों का पसंदीदा रिजार्ट था। एमिली ने एक आम भारतीय महिला की तरह माथे पर सिंदूर लगाया था। इस शादी की गोपनीयता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बादगास्तीन में रहने के दौरान नेताजी के भतीजे अमिय बोस उनसे मिलने पहुंचें थे, जहां एमिली महज उन्हें एक सहायक लगी थीं।

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दोनों में करीब 12 सालों तक संबंध रहा। वहीं वह बमुश्किल 3 सालों तक ही साथ रहे। नेताजी और एमिली के प्यार की निशानी के तौर पर 29 नवंबर 1942 को एक बेटी का जन्म हुआ। जिसका नाम दोनों ने अनीता रखा। सुभाष अपनी बेटी को देखने के लिए दिसंबर 1942 में विएना पहुंचते हैं। इसकी जानकारी वह अपने भाई शरत चंद्र को लिखे एक खत में देते हैं। सुभाष उसके बाद ऐसे मिशन पर निकल जाते हैं जहां से वह फिर लौटकर नहीं आए।

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