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अब सड़क पर रहने वाले बच्चों को मिलेगा रोटी-कपड़ा और मकान समेत ये सुविधाएं

सड़क पर रहने वाले 63 फीसदी बच्चे अनपढ़ हैं।

अब सड़क पर रहने वाले बच्चों को मिलेगा रोटी-कपड़ा और मकान समेत ये सुविधाएं
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नई दिल्ली. केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री (डब्ल्यूसीडी) मेनका गांधी का कहना है कि सरकार देश के हर बच्चे के भले के लिए प्रतिबद्ध है। इसी को ध्यान में रखकर ऐसी नियमावली (एसओपी) को तैयार किया गया है, जिसकी मदद से सड़क पर रहने वाले बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पुर्नवास और स्वरोजगार के लिए स्किल ट्रेनिंग देने की व्यवस्था की जा सकेगी। एसओपी में बच्चों की श्रेणियां बनाई गई हैं। जिससे खासकर उन बच्चों की तलाश की जाएगी जो अपने परिवार से किसी ने किसी वजह से अलग हो गए हैं और अब बुरे हालात में रह रहे हैं, घर नहीं जाना चाहते। एसओपी नियमावली बनाकर मंत्रालय की यह कोशिश है कि ऐसे बच्चों को सुरक्षित जगहों (बाल गृह) पर भेजा जाए, ढूंढने के बाद उनके परिवार से मिलाया जाए। यह जानकारी मेनका ने यहां मंगलवार को एसओपी को जारी करते हुए दी। कार्यक्रम में दिल्ली उच्च-न्यायालय के न्यायाधीश मुक्ता गुप्ता, एनसीपीसीआर की अध्यक्ष स्तुति कक्कड़, सेव द चिल्ड्रन अभियान की ब्रांड एंबेसडर व बॉलीवुड अभिनेत्री दीया मिर्जा, सेव द चिल्ड्रन के सीईओ हरपाल सिंह शामिल हुए।
ऐसे बनी नियमावली
एसओपी को तैयार करने की जिम्मेदारी मंत्रालय ने राष्ट्रीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को दी थी। इसके लिए धरातल पर एक व्यापक सर्वे किया गया और क्षेत्रीय स्तर पर इस क्षेत्र में काम करने वाले 35 गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा पटना, लखनऊ, हैदराबाद और मुंबई जैसे शहरों में मंत्रणाएं भी आयोजित की गई। इसके अलावा नियमावली का प्रारूप तैयार करने से पहले एनसीपीसीआर ने दिल्ली में सड़क से बचाए गए बच्चों के साथ विचार-विमर्श भी किया था।
एजेंसियों के बीच बनेगा समन्वय
एनसीपीसीआर का कहना है कि इस एसओपी को तैयार करने के पीछे एक बड़ी वजह मौजूदा सिस्टम में इस मामले पर काम करने वाली विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी थी। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। क्योंकि इसमें एनजीओ, पुलिस और बाल विकास समिति (सीडब्ल्यूसी) की भूमिका को कदम-दर-कदम स्पष्ट किया गया है। पहले यह देखने को मिलता था कि एक ही मामले में अलग-अलग एजेंसियां एक जैसे काम करती हुई नजर आती थीं। एसओपी के जरिए संबंधित विभागों और एजेंसियों को मौजूदा सिस्टम के तहत ही काम करना पड़ेगा। इसके लिए अगल से किसी सिस्टम को स्थापित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
63 फीसदी बच्चे अनपढ़
एसओपी तैयार करने के लिए जिन पांच शहरों का सर्वे किया गया था। उसमें यह तथ्य निकलकर सामने आया कि वहां सड़क पर रहने वाले 63 फीसदी बच्चे निरक्षर हैं। 68 फीसदी पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। केवल 3 से 16 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो पढ़ते हैं। पांच शहरों में सड़क पर रहने वाले बच्चों की आबादी (0 से 6 वर्ष तक) 19 से 32 फीसदी के बीच है। इसमें लड़कियां 37 फीसदी है। जो लड़कियां अपने परिवारों के साथ सड़क पर रहती हैं, उनका आंकड़ा 38 से 45 फीसदी है। इन बच्चों के मुख्य व्यवसाय कूड़ा उठाना, भीख मांगना, सड़क पर सामान बेचना, सड़क किनारे स्टॉल पर काम करना है। ये ज्यादातर कच्ची आबादी के बीच रहते हैं, झुग्गी-झोपड़ी में सोते हैं। आंकड़ों के हिसाब से दिल्ली में सड़क पर रहने वाले बच्चों की कुल संख्या 50 हजार है। 2016 में सेव द चिल्ड्रन द्वारा कराए गए सर्वे के अनुसार मुगलसराय, पटना, लखनऊ, कोलकात्ता, हावड़ा, हैदराबाद जैसे शहरों में सड़क पर रहने वाले बच्चों की कुल संख्या 84 हजार 563 है।
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