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गुजरात चुनाव 2017: पार्टियों की निगाहें इन तीन चेहरों पर टिकी, भाजपा और कांग्रेस इनके बिना पस्त

गुजरात के ऐसे तीन चेहरे भाजपा के सामने सीना ताने खड़े है जो भाजपा की नाक के लिए बड़ी चुनौती साबित हो रहे हैं।

गुजरात चुनाव 2017: पार्टियों की निगाहें इन तीन चेहरों पर टिकी, भाजपा और कांग्रेस इनके बिना पस्त

गुजरात विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए पहाड़ जैसी चोटी बन कर डरा रहा है। जिसके पीछे गुजरात के ऐसे तीन चेहरे भाजपा के सामने सीना ताने खड़े है जो भाजपा की नाक के लिए बड़ी चुनौती साबित हो रहे हैं।

ये हैं वह 3 चेहरे

हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी, अल्पेश ठाकोर, इन तीनो की बिसात गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 के लिए बिछाई गई हैं। पिछले चुनावों 2002 ,2007, 2012 में करीब 45-50 फीसद पर कब्जा जमाने वाली भाजपा के पसीने छूट रहे हैं। यानि आकड़े साफ है कि ये 3 चेहरे भाजपा के चुनावी समीकरण को बिगाड़ने कोई कोर कसर नही छोड़ने वाले हैं।

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जो चेहरा (हार्दिक पटेल) मोदी के दौर में पला बड़ा हुआ है और जिग्नेश, अल्पेश ने राजनीति का पाठ पढ़ा। वहीं तीन चेहरे 2017 में ऐसी राजनीतिक इबारत रच रहे हैं। जहां पहली बार में खरीद-फरोख्त के आरोप भाजपा पर थोपे हैं।

यहां मुझे रहीस फिल्म का एक डायलॉग याद आ रहा है, जिसमें शारूख खान कहते है कि गुजरात की हवा बदल रही है इसको कहा तक रोकोगें साहेब। ठीक उसी तरह से गुजरात विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए चुनौती पेश कर रहे है।

इस हवा को नियंत्रण में करने के लिए राहुल गांधी भी अल्पेश ठाकोर को कांग्रेश में शामिल करने के लिए मंच पर बगल में बैठने को मजबूर नजर आए। और वही गुपचुप तरीके से हार्दिक से मिलने को बेताब है। चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद जिग्नेश से भी हर समझौते के लिए तैयार नजर आ रहे हैं।

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यदि मोदी के चेहरे पर भाजपा चुनाव जीत रही है तो भाजपा को मोदी चेहरे के आसरे पर राजनीति सही साबित हो सकती है। यहां समझना होगा कि इसी चेहेर पर भाजपा 2002, 2012 के चुनाव जीती है।

अगर अब भाजपा मोदी चेहरे पर चुनाव जीत रही होती तो अपने दिल्ली के चेहरे को गुजरात क्यों भेजती। ये साफ है कि कोई भी बड़ी पार्टी अपने हाइलाईट चेहरे को अभी तक नहीं तलाश सकी है। और पुराने चेहरे के आसरे ही चुनाव प्रचार में दिलों-जान से लगी हुई है।

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ऐसे चुनावी हालात में इन 3 चेहरे यानी हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी, अल्पेश ठाकोर पर देश की दोनों बड़ी पार्टियों की निगाहें टिकी हुई हैं। क्योंकि गुजरात में 54 फीसदी ओबीसी, 18 फीसदी पाटीदार और 7 फीसदी दलित आबादी है। जो आज अपने आपको दोंनो पार्टीयों के शासन काल में ठगा महसूस कर रहे हैं जिनको लुभाना दोनों के लिए आसान नहीं हैं।

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