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यूपी: दूसरे चरण की 67 सीटों पर टिकी सियासी दलों की नजरें

छोटे दल बिगाड़ेंगे बड़ी राजनीतिक पार्टियों का सियासी खेल।

यूपी: दूसरे चरण की 67 सीटों पर टिकी सियासी दलों की नजरें
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नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पहले चरण के चुनाव के बाद अब 15 फरवरी को दूसरे चरण के चुनाव पर सियासी दलों की नजरें टिकी हैं। यूपी में भले ही भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच तीसरे दल के रूप में बसपा का मुकाबला माना जा रहा हो, लेकिन पहले दो चरण में इस मुकाबले में रालोद के शामिल होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इस चुनाव में बड़े दल जहां भीतरघात से जूझ रहे हैं, वहीं छोटे दल भी इनका चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटों सहारनपुर से वाराणसी तक कई सीटों पर प्रमुख राजनीतिक दलों को अपनी ही पार्टी के नेताओं की नाराजगी के कारण उनका विरोध झेलना पड़ रहा है। कई सीटों पर तो इन दलों के बागी भी चुनाव मैदान में ताल ठोक चुके हैं। भाजपा ही नहीं, बल्कि सपा, कांग्रेस व बसपा ने भी अन्य दलों को छोड़कर आए नेताओं को बड़ी संख्या में टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा है, तो इन दलों के टिकट के दावेदारों ने बगावती तेवर दिखाते हुए अपने दलों को चुनाव मैदान में उतरकर या फिर अप्रत्यक्ष रूप से सबक सिखाने के लिए कमर कसी हुई है। वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग के दिखाए गये भय के कारण वे छोटे दल भी वोटकाट बन सकते हैं, जो मान्यता लेकर अब तक चुनाव तक नहीं लड़े।
ऐसे छोटे दल भी भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस जैसे बड़े दलों का सिरदर्द बने हुए हैं। मसलन प्रमुख दलों की अंदरूनी कलह का विरोध और छोटे दलों का चुनावी संग्राम में डटे रहने से यूपी के सियासी समीकरण बदलने की संभावना बनी हुई है। ऐसे छोटे दल जीतने के लिए ही न सही, बल्कि प्रदेश में अपने दलों का माहौल बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए चुनाव मैदान में ऐडी से चोटी तक के जोर लगाकर सियासत की जंग में पूरी तरह से सक्रिय चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं। इस प्रकार के कई दल तो ऐसे हैं जो जिस पार्टी का पलड़ा भारी दिखाई दे तो वह उनके पक्ष में कई दलों का भाग्य पलटने की कुबत भी रखते हैं।
इसलिए इन चुनावों में तो बड़े दलों के लिए सिरदर्द बने इन छोटे दलों की सक्रियता से राजनीतिक तौर पर एक बात तो साफ है कि जितना भी मत ये दल अपने पक्ष में करने में सफल होते हैं उतना ही नुकसान बड़े दलों को होना तय है। इन छोटे दलों की राजनीतिक जमीन तैयार करने में वे प्रत्याशी भी सामने है, जिन्हें बड़े दलों ने इस बार टिकट से वंचित किया या उन्हें दरकिनार किया है तो वे निर्दलीय चुनाव लड़ने के बजाए छोटे दलों के टिकट पर जोर अजमाइश कर रहे हैं। यानि छोटे दलों से या निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ रहे बागियों का कुनबे के कारण अपने-अपने वोट बैंक में सेंध लगने का भय बड़े राजनीतिक दलों की नींद हराम किये हुए है, लेकिन इन छोटे दलों से किस दल को कितना नुकसान होगा यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही सामने आयेगा।
बगावती तेवरों से परेशान सभी दल
भाजपा में टिकट बंटवारे से नाराज नेताओं का अंदरखाने विरोध और कुछ बागियों के चुनाव मैदान में आना चिंता का कारण बना हुआ है। सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में परिवारिक दंगल के दौरान प्रत्याशियों के टिकट कटने और दूसरों को प्रत्याशी बनाने के कारण चुनावी संकट बढ़ा है, जिसके कारण सपा को कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इसलिए सपा-कांग्रेस गठबंधन में भी इन दलों के नेता बागी होकर चुनाव मैदान में हैं। यही हाल बसपा का है जिनके टिकट कटने से बगावती तेवर जगजाहिर है और कुछ तो पाला बदलकर अन्य दलों का दामन थामकर बसपा को चुनौती दे रहे हैं। ऐसा हालात का सामना अन्य कई दलों को भी करना पड़ रहा है। भाजपा ने इस बार दूसरे दलों से आए नेताओं को बड़ी संख्या में टिकट दिया गया है। अन्य प्रमुख दलों ने भी इसी रणनीति को चुनावी पटरी पर उतारा है, तो ऐसी सीटों पर पुराने नेताओं की नाराजगी स्वाभाविक है।
छोटे दलों ने की नींद हराम
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार प्रमुख राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों के लिए छोटे एवं अपंजीकृत दलों की भी भरमार हैं यानि डेढ़ सौ दलों के करीब दल अपने प्रत्याशियों को खड़े करके बड़े दलों को चुनौती दे रहें हैं। इनमें 30 दल तो ऐसे हैं जिन्हें चुनाव आयोग ने पिछले महीने जनवरी में ही पंजीकृत गैरमान्यता प्राप्त दलों के रूप में मान्यता दी है। जिनमें महिला सशक्तिकरण पार्टी, इंडियन सर्वहित पार्टी, अखंड राष्ट्रवादी पार्टी, भारतीय बेरोजगारी पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय जागरूक दल, सबका दल-यूनाइटेड, भारतीय जन-जन पार्टी,भारतीय कामगार पार्टी, बहुजन आवाम पार्टी, भारतीय संगम पार्टी, दलित शोषित पिछडा अधिकार दल, गरीब उत्थान पार्टी, पूर्ण स्वराज मंच, इंसाफवादी पार्टी, किसान पार्टी प्रमुख हैं, जबकि लोकदल, पीस पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, राष्ट्रीय कृषक दल, बहुजन मुक्ति पार्टी, जन अधिकार मोर्चा जैसे सैकड़ो दल चुनावी जंग लड़ रहे हैं। इन छोटे दलों ने बड़े राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों की नींद हराम कर रखी है। कई छोटे दल तो ऐसे हैं जिनमें कई प्रत्याशी तो ऐसे हैं जो जीत नहीं सकते, लेकिन अपना मत प्रतिशत बढ़ाने के लिए जिस प्रकार जोर आजमाइश कर रहे हैं। ऐसे दलों के प्रत्याशी किसी जीतने वाले बड़े दल के प्रत्याशी को हराने की कुबत रखते ही हैं।
खुद बढ़ाई दलों ने बगावत
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सहारनपुर जिले में बेहट सीट पर भाजपा ने महावीर राणा को टिकट दिया है। वे बसपा छोड़कर भाजपा में कुछ दिन पहले ही आए हैं। पार्टी के इस फैसले से नाराज राना आदित्य प्रताप ने भाजपा प्रत्याशी का खुला विरोध कर रहे हैं। आदित्य रानी देवलता के बेटे हैं जो पहले विधायक भी रह चुकी हैं। राजघराने से जुड़े इस परिवार का अपने क्षेत्र में खासा प्रभाव माना जाता है। इसी तरह नकुड़ में धर्म सिंह सैनी, सहारनपुर देहात में मनोज चौधरी भाजपा प्रत्याशी हैं। दोनों चुनाव से पहले बसपा में थे। उन्हें पार्टी में शामिल कर तत्काल पार्टी उम्मीदवार भी बना दिया गया। पुराने भाजपा नेता इस बात को लेकर नाराज हैं। पार्टी के आम कार्यकर्ता ऐसे प्रत्याशियों को बाहरी मान रहे हैं तथा उन्हें सबक सिखाने के लिए अंदर खाने सक्रिय हैं।
इसी प्रकार सहारनपुर की गंगोह सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी नोमान मसूद हैं लेकिन इनके खिलाफ सपा के बागी इंद्रसेन गूजर भी ताल ठोंक रहे हैं। यद्यपि सपा नेतृत्व ने इंद्रसेन को निष्कासित कर दिया है लेकिन साइकिल चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में हैं। यदि सीट भाजपा के खाते में जाती है तो इसके लिए भाजपा से ज्यादा खुद गठबंधन में दरार के चलते नेताओं की भितरघात ही जिम्मेदार होगी। बरेली में आंवलां सीट पर समाजवादी पार्टी ने पूर्व सांसद सर्वराज सिंह के बेटे सिद्धराज सिंह को प्रत्याशी बनाया है। सपा के दिग्गज नेता महिपाल यादव पार्टी प्रत्याशी को हराने के लिए खुले आम कर कर रहे हैं। उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधि के लिए निष्कासित भी कर दिया गया लेकिन वे सपा को नुकसान पहुंचाने में जुटे हुए हैं। यह कुछ उदाहरण हैं प्रदेश में तमाम सीटों पर चुनावी समीकरण को भितरघाती ही बिगाड़ने में जुटे हुए हैं। अलबत्ता बसपा में भितरघात की सबसे कम समस्या है। क्योंकि वहां पार्टी कैडर को स्थानीय नेता आसानी से नहीं प्रभावित कर पाते हैं।
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