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अब नहीं होगी मेरी-तेरी-उसकी बात

कल देर रात हिंदी कहानी आंदोलन के अंतिम स्तंभ राजेंद्र यादव का देहावसान हो गया। वह कई तरह की शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त थे।

अब नहीं होगी मेरी-तेरी-उसकी बात
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कल देर रात हिंदी कहानी आंदोलन के अंतिम स्तंभ राजेंद्र यादव का देहावसान हो गया। वह कई तरह की शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त थे। केवल हिंदी कहानी ही नहीं हंस पत्रिका के जरिए भी उन्होंने हिंदी साहित्य को भरपूर समृद्ध किया।हिन्दी पट्टी के बौद्धिक जीवन पर छाए पुरातनपंथी विचारों को उन्होंने अपने खास निडर और तार्किक अंदाज में चुनौती दी और साहित्य में महिलाओं, दलितों समेत अन्य वंचित तबकों के हस्तक्षेप के लिए स्पेस बनाया। उनके साहित्यिक अवदान को याद करते हुए अपनी र्शद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं कुछ वरिष्ठ साहित्यकार।

राजेंद्र जी के विवेक-शक्ति को साहित्य जगत ने पहचाना ही नहीं

राजेंद्र जी के देहांत से कुछ घंटे पहले ही कल रात मेरी उनसे फोन पर बात हुई थी। किसी पत्रिका के बुंदेलखंड विशेषांक के बारे में मुझे बता रहे थे और मुझे पढ़ने के लिए कहा। मैंने उनसे अंतिम वाक्य यही कहा कि आप जीवनभर मुझे एक टीचर की तरह पढ़ाते ही रहे। आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उनके बिना मेरा लेखकीय जीवन कभी पूरा नहीं हो सकता था। इतने कम वर्षों में मेरे इतने उपन्यास और कहानी संग्रह आए, उन सबकी प्रेरणा कहीं न कहीं मुझे उन्हीं से मिली। मैं उन्हें अपना बेस्ट टीचर मानती हूं। लेकिन वास्तव में वह बहुत सख्त टीचर की तरह मेहनत करवाते थे। मेरे लिखे की कभी उन्होंने मेरे सामने तारीफ नहीं की, हमेशा कमी ही बताते थे। कई बार मैं उनके रवैए से नाराज भी हो जाती थी लेकिन वह मुझसे कभी नाराज नहीं हुए। दूसरों से जरूर मेरी तारीफ करते या फिर अपने संपादकीय में लिख देते थे।
वह बाहर से जितने बेलौस, अक्खड़ कठोर दिखते थे, भीतर से उतने ही भावुक और कोमल हृदय व्यक्ति थे। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि राजेंद्र जी हमारे बारे में इतना कुछ अनर्गल कहा जाता है, इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? इस पर वह मुस्कुराए फिर थोड़ा ठहरकर बोले, ‘मैत्रेयी तुम्हारा मेरा संबंध तो कृष्ण और द्रौपदी जैसा है।’वास्तव में राजेंद्रजी की क्षमताओं, विवेक और उनकी शक्ति को साहित्य समाज में न तो पहचाना गया और न ही वो सम्मान मिला, जिसके वह योग्य थे। उनके विमशरें, उनकी वैचारिक-बेबाक टिप्पणियों को हमेशा स्त्री-देह विमार्श या जानबूझकर विवाद पैदा करने वाला घोषित कर उपेक्षित कर दिया जाता था। उनकी शक्तियों का रचनात्मक उपयोग नहीं किया गया। मेरी मां के मरने पर जितना दुख मुझे हुआ था, उससे कहीं ज्यादा दुख मुझे आज हो रहा है।
विलक्षण व्यक्तित्व था राजेंद्र जी का
आमतौर पर किसी भी क्षेत्र में कुछ रचनात्मक करने वाले के देहावसान पर मुहावरे के तौर पर हम कह देते हैं कि अपूर्णनीय क्षति हुई है, उनकी जगह को भरा नहीं जा सकता है। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि यह मुहावरा राजेंद्र जी के लिए पूरी तरह मुफीद है। उनके जैसा व्यक्ति न उनसे पहले साहित्य जगत में हुआ था और न कभी भविष्य में होगा। अपने व्यक्तित्व में अलग-अलग तरह के तमाम पहलुओं को समेटे वह अपनी तरह के विलक्षण व्यक्ति थे। जहां तक उनके हिंदी साहित्य में रचनात्मक अवदान की बात है तो उन्होंने कई बेहतरीन रचनाएं दीं। नई कहानी आंदोलन में उनकी भूमिका से हम सभी परिचित हैं ही।
इन सबसे बढ़कर पिछले 25 वर्षों से हंस के संपादन के जरिए उन्होंने जो साहित्य में रचनात्मक कार्य किया, वह भी विलक्षण ही रहा है। अनेक नए लेखकों को उन्होंने न केवल जगह दी बल्कि उन्हें विकसित करने में भी हंस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्त्री विर्मश-दलित विर्मश जैसे मुद्दों पर सराहनीय अंक निकाले, जिनसे साहित्य जगत में पर्याप्त चर्चा का अवसर मिला। तो कह सकते हैं कि राजेंद्र जी न केवल विलक्षण व्यक्ति के रूप में याद किए जाएंगे बल्कि एक रचनाकार और संपादक के रूप में उनकी भूमिका को भी भुलाया नहीं जा सकता।
गिर गया नई कहानी का आखिरी स्तंभ

राजेंद्र जी के जाने से हिंदी जगत की नई कहानी का आखिरी स्तंभ भी गिर गया। मोहन राकेश और कमलेश्वर के बाद नई कहानी आंदोलन के वही एक स्तंभ के रूप में हमारे बीच मौजूद थे। उनके जाने से हिंदी साहित्य को अपूर्णनीय क्षति हुई है। मैं तो कहूंगा कि हिंदी कहानी का शलाका पुरुष और भीष्म पितामह हमेशा के लिए हमसे दूर हो गया। मन्नूजी के प्रति मैं अपनी शोक संवेदना प्रकट करता हूं। नई कहानी के अलावा पिछले लगभग 25 वर्षों से हंस के जरिए भी उन्होंने साहित्य जगत में सार्थक हस्तक्षेप किया। हंस में लिखे उनके संपादकीय हिंदी साहित्य की धरोहर की तरह हमेशा हम सबके पास रहेंगे। उसमें लिखने की, गहनता से विचार करने और विविध मुद्दों पर बेबाक राय रखने क

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