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जाट आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, आरक्षण के पीछे कहीं चुनावी मकसद तो नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने जाट आरक्षण पर केंद्र सरकार से 9 अप्रैल तक जबाव मांगा है।

जाट आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, आरक्षण के पीछे कहीं चुनावी मकसद तो नहीं
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने जाट समुदाय को अन्य पिछडा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से 9 अप्रैल तक जबाव मांगा है। जाटों को लुभाने के लिए संप्रग सरकार ने केंद्रीय नौकरियों में उन्हें आरक्षण देने की घोषणा तो कर दी है, लेकिन इसे अदालत में जायज ठहराना आसान नहीं होगा। जाटों को आरक्षण देने का फैसला करते समय सरकार ने अदालत के उन सभी फैसलों को भुला दिया, जिनमें
पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाए बिना आरक्षण देने की मनाही की गई है। लोकसभा चुनाव के समय लागू किए गए जाट आरक्षण का हश्र भी कहीं अल्पसंख्यक आरक्षण जैसा ना हो, जिसकी घोषणा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए की थी, लेकिन उसका लाभ मुसलमानों को नहीं मिला।
सरकार अगर जाट आरक्षण को अदालत के पचड़े से बचाना चाहती थी, तो उसे कोर्ट से तय मानकों का पालन करना चाहिए था। पहली शर्त है कि लाभ पाने वाला समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा हो। उसके पिछड़ेपन के आंकड़े भी होने चाहिए, नहीं तो संविधान में दिए बराबरी के अधिकार को झुठलाना मुश्किल होगा। आंकड़े जरूरी हैं, ताकि बराबरी के अधिकार के अपवाद का सहारा लेकर लागू किए जा रहे आरक्षण को सही ठहराया जा सके। राजनीति की पाठशाला में आरक्षण शुरू से पहला सबक रहा है।
नीचे की स्‍लाइड्स में जानि‍ए, आरक्षण देने के मानक -

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