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सावित्रीबाई फुले जयंती: अंग्रेजी शासन को अच्छा क्यों मानती थीं सावित्रीबाई फुले

सावित्री बाई फुले जिन्होंने लड़कियों को शिक्षित करने के लिए लड़ाई लड़ी। आज उनका जन्मदिन है। हम उन्हें आधुनिक भारत की पहली शिक्षिका के रूप में तो जानते हैं लेकिन बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि फुले अंग्रेजी शासन को काफी अच्छा मानती थीं।

सावित्रीबाई फुले जयंती: अंग्रेजी शासन को अच्छा क्यों मानती थीं सावित्रीबाई फुले
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सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) का नाम एक बार फिर हर कोई जानता है। हाल ही में यह नाम चर्चा में था। वो इस लिए क्योंकि बहराइच की सांसद सावित्रीबाई फुले ने बीजेपी से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन आज हम बहराइच की सांसद सावित्री बाई फुले की बात नहीं कर रहे हैं।
हम बात कर रहे हैं देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) की। वह सावित्रीबाई फुले जिन्होंने लड़कियों को शिक्षित करने के लिए लड़ाई लड़ी। आज उनका जन्मदिन है (Savitribai Phule Jayanti)। हम उन्हें आधुनिक भारत की पहली शिक्षिका के रूप में तो जानते हैं लेकिन बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि फुले अंग्रेजी शासन को काफी अच्छा मानती थीं।
कई लोगों को आश्चर्य होगा कि जिस अंग्रेजी शासन (British Rule) को भारत का एक बड़ा हिस्सा अत्याचारी और शोषक मानता था उसे भला सावित्रीबाई फुले अच्छा कैसे मान सकती थीं। लेकिन ऐसा ही है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि अंग्रेजों ने भारत को 150 सालों तक जमकर लूटा।
भारतीयों का शोषण किया उन पर अत्याचार किया। लेकिन अंग्रेजों के शासन के बाद ही दलितों, पिछड़ों और महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में आने का अवसर मिला। अंग्रेजों के शासन के कारण ही जाति प्रथा में ढिलाई आई। सावित्रीबाई फुले इसी कारण अंग्रेजी शासन का समर्थन करती थीं।
साथ ही पेशवाई और मुगल शासन को बुरा बताती थीं। उन्होंने अपनी एक कविता में अंग्रेजी शासन को अंग्रेजी मैया कह कर संबोधित किया था। सावित्रीबाई फुले छत्रपति शिवाजी की प्रशंसक थीं। लेकिन पेशवाओं के शासन की घोर विरोधी थीं। इसकी वजह थी कि पेशवाओं के शासन में दलितों, पिछड़ों और शूद्रों को बुनियादी अधिकार नहीं मिले थे।

सिर्फ 17 साल की उम्र में बन गई प्रिंसिपल

सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले का बाल विवाह हुआ था। ज्योतिबा के सहयोग से सावित्रीबाई ने विवाह के बाद शिक्षा पूरी की। ज्योतिबा ने उस सम्य लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला था जिसमें सावित्रीबाई फुले प्रिंसिपल बनीं।

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