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अफगानिस्तान ने सऊदी अरब से कहा- ''बचा लो''

तालिबानी हमलों से झूझ रहे अफगानिस्तान ने सऊदी अरब से मदद की गुहार लगाई है।

अफगानिस्तान ने सऊदी अरब से कहा-
काबुल. अमेरिका के बाद सऊदी अरब अफगानिस्तान का का सहारा बनी जा रहा है। अफ़ग़ानिस्तान करीब 15 साल से तालिबान के खिलाफ लड़ने के लिए अमेरिका का साथ लेता रहा है। लेकिन अब अमेरिका ने अफगानिस्तान की मदद से इनकार कर दिया है। इसलिए अफ़ग़ानिस्तान ने सऊदी अरब से मदद की गुहार लगाई है। अमेरिका ने तालिबान से लड़ने के लिए 5 करोड़ डॉलर खर्च किए हैं। पिछले डेढ़ दशक में यहां अबतक करीब डेढ़ लाख लोगों की जान जा चुकी है।
तालिबानी हमलों से झूझ रहे अफगानिस्तान ने सऊदी अरब से मदद की गुहार लगाई है। अमेरिका के जाने से देश में तालिबान के खतरे को भांपते हुए अफगान नेताओं ने सऊदी से सुरक्षा की मांग की है। हालांकि यह सऊदी पर निर्भर करता है कि वह अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार का समर्थन करेगा या फिर तालिबान का। सऊदी अरब की स्थिति उसको खास बनाती है। लंबे समय से पाकिस्तान का सहयोगी रहा सऊदी हमेशा से इस्लामाबाद के तालिबान को बढ़ावा देने का समर्थन करता रहा है। बीते सालों में सऊदी के शेख और अमीर भी गुप्त रूप से आतंकियों द्वारा छेड़े युद्ध को उकसावा देते रहे हैं।
क्या सऊदी अरब अफगानिस्तान की मदद करेगा-
हालांकि आधिकारिक तौर पर सऊदी अरब ने अफगानिस्तान में अमेरिकी मिशन का समर्थन किया है। सऊदी तालिबान और अन्य सुन्नी चरमपंथी समूहों को मिलने वाली निजी फंडिंग को लेकर भी चुप्पी साध लेता है। सऊदी के नागरिक गुप्त तरीके से तालिबान को आर्थिक मदद देते हैं जिससे इस क्षेत्र में सऊदी बेदह अहम बन गया है। बीते 15 सालों में अमेरिका ने अफगानिस्तान में लोकतंत्र को बढ़ावा दिया है लेकिन अमेरिकी सेना के अफगान से बाहर होते ही सवाल उठता है कि क्या सऊदी अरब अफगानिस्तान की वैसे ही मदद करेगा या वह अपने हित साधेगा?
अफगानिस्तान में लोकतंत्र का भविष्य अंधेरे में-
बीते 24 साल से सऊदी की खुफिया एजेंसी के प्रमुख प्रिंस तुर्की अल-फैजल ने तालिबान को समर्थन देने वाली बात से साफ इनकार कर दिया है। ई-मेल के जरिए भेजे गए जवाब में फैजल ने कहा, 'जब मैं सरकार में था, तो एक पाई भी तालिबान को नहीं दी गई।' उन्होंने आगे कहा, 'सऊदी की ओर से आतंकी समूहों को किसी भी तरह की फंडिंग न पहुंचे इसके लिए सख्त कदम उठाए गए।' अफगानिस्तान के अधिकारियों का मानना है, हाल के महीनों में 40 हजार लड़ाकों के साथ देश के 8 प्रांतों में तालिबान और घातक हुआ है। उसे बढ़ावा देने में विदेशी सूत्रों से आ रहे पैसे का योगदान है। अफगान अधिकारियों की माने तो तालिबान विदेशों से एक अरब डॉलर का फंड मिला है। दूसरी तरफ सऊदी अरब अफगानिस्तान के साथ रक्षा और विकास के क्षेत्र में समझौते कर रहा है।
बता दें कि साल 2001 में अमेरिका ने 9/11 हमले के बाद अफगानिस्ता नें बमबारी शुरू की थी। इसके बाद देश में तालिबान का शासन खत्म हुआ था और लोकतांत्रिक सरकार बनी थी। अब अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर जा रहा है। ऐसे में अफगानिस्तान में लोकतंत्र का भविष्य अंधेरे में दिख रहा है।
साभार- nytimes.com
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