Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

सांता बाबा के जादुई झोले की कहानी

हकीमपुर शहर में सांता बाबा सिर्फ क्रिसमस में ही आकर नहीं उपहार बांटते थे, वह हर महीने बच्चों को उनकी जरूरत के मुताबिक उपहार बांटते थे। ये सारे उपहार उनके एक जादुई झोले में भरे होते। किसी दूसरे शहर से अपने दादाजी के पास आए घमंडी राहुल को शरारत सूझी, उसने सांता बाबा के जादुई झोले को गायब करके तरह-तरह के उपहार हासिल करने चाहे। क्या राहुल को उसके मनचाहे उपहार मिल सके?

सांता बाबा के जादुई झोले की कहानी
हकीमपुर शहर में सांता बाबा सिर्फ क्रिसमस में ही आकर नहीं उपहार बांटते थे, वह हर महीने बच्चों को उनकी जरूरत के मुताबिक उपहार बांटते थे। ये सारे उपहार उनके एक जादुई झोले में भरे होते। किसी दूसरे शहर से अपने दादाजी के पास आए घमंडी राहुल को शरारत सूझी, उसने सांता बाबा के जादुई झोले को गायब करके तरह-तरह के उपहार हासिल करने चाहे। क्या राहुल को उसके मनचाहे उपहार मिल सके?

यह बात है हकीमपुर शहर की। दूसरी जगहों पर सांता क्लॉज साल में एक बार क्रिसमस के मौके पर आकर बच्चों को उपहार बांटते लेकिन हकीमपुर के बच्चे बड़े भाग्यशाली थे, क्योंकि वहां के सांता बाबा साल में एक बार नहीं बल्कि हर महीने की चार तारीख को उपहार बांटने आते थे।
हकीमपुर शहर कोई बहुत बड़ा नहीं था। बहुत छोटा-सा शहर था। सब एक-दूसरे को जानते-पहचानते थे। आसानी से पूरा शहर को साइकिल पर बैठकर देखा जा सकता था। होता यूं था कि शहर के बड़े पोस्ट ऑफिस के बाहर लगे लाल डब्बे में बच्चे सांता बाबा के नाम चिट्ठी लिखकर डाल देते थे।
उस चिट्ठी में वे लिखते थे कि उन्हें सांता बाबा से क्या चाहिए, साथ ही यह भी लिखना होता था कि वह चीज क्यों चाहिए? वह मांग पूरी करनी है या नहीं, इसका निर्णय सांता बाबा ही करते थे। पेन-पेंसिल, स्कूल बैग, किताबें, जूते, कपड़े जैसी मांगें वे एकदम पूरी करते थे।
पिछले महीने मुन्नी को गुड़िया, शबाना को चूड़ियां, राजू को नया स्वेटर भी मिला पर रमन की साइकिल की मांग सांता बाबा ने ठुकरा दी। कहा, ‘मेरे छोटे से जादुई झोले में साइकिल नहीं आ पाती..।’
सांता बाबा कौन हैं, कहां से आते हैं, यह बच्चों को पता नहीं चलता था। क्रिसमस के खास मौके पर वह सांता क्लॉज की तरह लंबी दाढ़ी-मूंछों के साथ लाल कैप और लाल ड्रेस पहन कर आते थे, बाकी दिनों में उनकी दाढ़ी-मूंछें तो सांता क्लॉज जैसी रहतीं, बाकी वह ड्रेस साधारण पहनते।
उनके आने पर चिट्ठी लिखने वाले बच्चे इकट्ठे हो जाते। वे एक-एक करके उनके सामने आते, उनके जादुई झोले के सामने अपनी मांग जोर से कहते। फिर सांता बाबा जादुई झोले पर तीन बार यह मंत्र फूंकते, ‘मांग अगर है जरूरी तो फिर हो पूरी.. वरना रहे अधूरी।’ अगर झोले से चीज निकल आती तो समझों उस बच्चे की मांग जरूरी थी, इसलिए जादुई झोले ने पूरी कर दी, वरना नहीं।
क्रिसमस की छुट्टी में आजकल किसी दूसरे शहर से चौधरी साहब का आठ वर्षीय पोता राहुल हकीमपुर आया हुआ था। उसने जब सांता बाबा के बारे में सुना तो पहले उसे विश्वास नहीं हुआ लेकिन जब यह सब उसने अपनी आंखों से देखा तो अचरज में पड़ गया कि कैसे सांता बाबा धड़ाधड़ अपने झोले पर मंत्र मारकर उसमें से चीजें निकाल रहे थे, और सबको बांट रहे थे।
राहुल बहुत शैतान और घमंडी किस्म का लड़का था। उसके खुराफाती दिमाग में आया, ‘क्यों न बाबा का जादुई झोला चुरा लिया जाए, मंत्र तो बिल्कुल आसान है और मैंने सुनकर याद भी कर लिया है। मैं भी सांता बाबा की तरह मंत्र बोलकर जादुई झोले से मनचाही चीजें पा सकता हूं.. मोबाइल, वीडियो गेम, घड़ी... अरे वाह!,कितना मजा आएगा..’, ऐसी कल्पना कर राहुल नाचने लगा।
एक दिन जब सांता बाबा बच्चों को उपहार बांटकर लौट रहे थे तो राहुल ने उनका पीछा किया। कुछ देर चलकर सांता बाबा एक पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठ गए। उन्होंने अपना झोला एक तरफ रख दिया। राहुल तो ऐसे ही मौके के इंतजार में था। उसने चुपके से झोला लिया और भागकर दूर एक खंडहर में छिप गया।
फिर उसने जादुई झोले के सामने अपनी इच्छा बोली, ‘स्मार्ट फोन..’ और मंत्र बोला, ‘मांग अगर है जरूरी तो फिर हो पूरी, वरना रहे अधूरी’, लेकिन यह क्या, झोला खाली था। राहुल परेशान हो उठा। उसने सोचा शायद मांग कुछ ज्यादा बड़ी हो गई। फिर उसने झोले के सामने अपनी इच्छा बोली, ‘घड़ी’ और फिर मंत्र दोहराया...लेकिन इस बार भी झोले से कुछ नहीं निकला।
वह सोचने लगा, बाकी बच्चों के लिए उपहार तो निकलते हैं, फिर मेरे लिए क्यों नहीं निकल रहे, क्या यह मांग भी बड़ी है? इस बार उसने झोले की परीक्षा लेने के लिए मात्र एक पेंसिल मांगी और फिर दोबारा मंत्र बोला, ‘मांग अगर है जरूरी तो फिर हो पूरी, वरना रहे अधूरी’,लेकिन यह क्या, इस बार भी झोला खाली ही था।
यह देख राहुल को गुस्सा आ गया। वह चिल्लाया, ‘सब झूठ है, इस झोले में कोई जादू नहीं है... यह किसी को कुछ नहीं दे सकता है..।’ तभी उसे किसी के जोर-जोर से हंसने की आवाज सुनाई दी। पीछे मुड़कर देखा तो वहां सांता बाबा खड़े हंस रहे थे।
बाबा को देख राहुल डर गया लेकिन उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा, ‘मेरे बच्चे, सच कहा तुमने, झोले में कोई जादू नहीं है। वैसे भी किसी को कुछ देने के लिए कोई जादू-वादू नहीं चाहिए, इसके लिए तो इंसान में बस दो ही बातें होनी चाहिए, देने की नीयत और नि:स्वार्थ भावना।
जिस दिन तुम कुछ पाकर नहीं बल्कि किसी को कुछ देकर खुश होना सीख लोगे, उस दिन यह झोला अपने आप ही उपहारों से भर जाएगा।’ यह कहकर सांता बाबा अपना झोला लेकर चले गए और राहुल शर्मिंदा होकर घर लौट गया। राहुल को सांता बाबा की बात समझ में आ गई थी।
Share it
Top