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रिक्शा चालक पिता ने बेटी के लिए खरीदी 5 लाख की राइफल

रिक्शा चालक मणिलाल की बेटी मित्तल एक राष्ट्रीय स्तर की शूटर है।

रिक्शा चालक पिता ने बेटी के लिए खरीदी 5 लाख की राइफल
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अहमदाबाद. हमारे भारत देश में बलिदान और दृढ़ता के बारे में बात करें तो यहां न जाने कितने ही ऐसे लोग मौजूद हैं जो जीवन में कुछ करने के लिए अपने बच्चों को पढ़ाने, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए क्या कुछ नहीं करते। ऐसी ही एक बलिदान की कहानी है अहमदाबाद में एक रिक्शा चालक मणिलाल गोहिल की जिसने अपनी बेटी को पांच लाख रुपए की एक जर्मन राइफल लाकर दे दी। मणिलाल ने ये रुपए अपनी बेटी की शादी के लिए बचा कर रखे थे। मणिलाल की बेटी मित्तल एक राष्ट्रीय स्तर की शूटर है।
आश्चर्य की बात तो तब हुई जब पिता और बेटी स्थानीय पुलिस आयुक्त के पास राइफल के लाइसेंस के लिए आवेदन करने के लिए गए। अधिकारी हैरान थे कि एक रिक्शा चालक इतनी महंगी राइफल खरीदने में कामयाब कैसे हो गया। पुलिस ने मणिलाल को आवश्यक अनुमति प्राप्त करने में मदद की और उनके प्रयासों के लिए उसकी प्रशंसा भी की।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, रिक्शा चालक की बेटी मित्तल ने कहा, 'मेरे पिता और मेरे परिवार ने सिर्फ मेरे महंगे शौक को पूरा करने के लिए बहुत बलिदान दिया है। इस राइफल के मिलने के बाद मैं अंतर्राष्ट्रीय स्तर में भाग लेने और अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए कड़ी मेहनत करूंगी।' अहमदाबाद के गोमतीपुर क्षेत्र में मित्तल अपने माता-पिता और दो भाइयों के साथ एक चॉल में रहती है और चार साल से शूटिंग का अभ्यास कर रही है।

शूटिंग के लिए मित्तल के जुनून का अंकुरण तब हुआ जब उसने अहमदाबाद में राइफल क्लब में कुछ निशानेबाजों को निशाना लगाते देखा था। मित्तल ने तभी फैसला कर लिया था कि वह भी उन निशानेबाजों की तरह ही एक निशानेबाज बनेगी। एक ऐसा परिवार जो सिर्फ ऑटो रिक्शा चालक मणिलाल के ऊपर निर्भर है और उस परिवार में इस तरह के महंगे शौक को आसानी से पूरा कर पाना नामुमकिन था। फिर भी मणिलाल ने अपनी बेटी को राइफल खरीद कर दिया ताकि उसके पास अपनी राइफल हो। मित्त्ल को पहले राइफल क्लब मे किराए पर बंदूक लेनी पड़ता थी।

2013 में कम से कम अभ्यास होने के बावजूद मित्तल ने 57वें अखिल भारतीय राष्ट्रीय चैंपियनशिप शूटिंग में भाग लिया और साथी निशानेबाजों अंजू शर्मा और लज्जा गोस्वामी के साथ-साथ एक कांस्य पदक जीता था।

राष्ट्रीय स्तर में भाग लेने के बाद मित्तल का आत्मविश्वास काफि बढ़ गया लेकिन आगे के प्रशिक्षण के लिए बिना अपने राइफल के आगे बढ़ना मुश्किल था। उसके पिता और बड़े भाई जैनिश ने उसके लिए एक 50 मीटर रेंज की जर्मन बन्दूक खरीदने के लिए धन की व्यवस्था करनी शुरू कर दी थी। मतलब यह कि जो पैसे मित्तल की शादी के लिए रखे गए थे उसका इस्तेमाल किया जा सकता था। छह महीने के बाद इसमें कोई संदेह नहीं है कि परिवार के लिए एक कठिन दौर आ गया था। मणिलाल और जैनिश के प्रयासों से मित्तल को उसकी खुद की राइफल प्राप्त हुई और अब वह दिसंबर 2016 में होने वाले राष्ट्रीय टूर्नामेंट में भाग ले सकती है।

मित्तल की नई राइफल का वजन 8 किलो और एक गोली की लागत 31 रुपए है। मित्त्ल को किसी भी टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए कम से कम 1000 राउंड गोलियां खरीदनी पड़ेगी। इस तरह के एक महंगी राइफल खरीदने के बाद, उसके परिवार को अब इन गोलियों की खरीद की बाधा का सामना करना पड़ रहा है।

शूटिंग मित्तल की पहली जुनून नहीं थी। उनका सपना भारतीय सेना में शामिल होने का था। लेकिन उसकी कम ऊंचाई होने की वजह से ऐसा नहीं कर पाई। मित्त्ल ने पीएसआई की परीक्षा पास कर ली थी, लेकिन उसके शारीरिक कद कम होने के कारण सेना में शामिल नहीं हो सकती थी। मित्तल का छोटा भाई मितेश भी एक पिस्तौल शूटर के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए कोशिश कर रहा है।

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