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Republic Day Speech And Essay : स्कूल में 26 जनवरी के लिए गणतंत्र दिवस पर भाषण और गणतंत्र दिवस पर निबंध हिंदी में

Republic Day Speech हिंदी में गणतंत्र दिवस पर भाषण 2019 (Republic Day Speech in Hindi 2019) पर लिखने या स्कूल में 26 जनवरी (26 January) के लिए गणतंत्र दिवस पर निबंध हिंदी में (Republic Day Essay in Hindi 2019) लिखना है तो हरिभूमि गणतंत्र दिवस 2019 (Republic Day 2019) के मौके पर आपके लिए लाया है लेखिका ''नौशाबा परवीन'' द्वारा लिखित गणतंत्र दिवस पर सबसे बेस्ट निबंध (Gantantra Diwas Par Nibandh)। 26 जनवरी 2019 (26 January 2019) के मौके पर भारत अपना 70वां गणतंत्र दिवस 2019 (Republic Day 2019 70th) मनाएगा।

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Republic Day Speech

हिंदी में गणतंत्र दिवस पर भाषण 2019 (Republic Day Speech in Hindi 2019) पर लिखने या स्कूल में 26 जनवरी ((26 January) के लिए गणतंत्र दिवस पर निबंध हिंदी में (Republic Day Essay in Hindi 2019) लिखना है तो हरिभूमि गणतंत्र दिवस 2019 (Republic Day 2019) के मौके पर आपके लिए लाया है लेखिका 'नौशाबा परवीन' द्वारा लिखित गणतंत्र दिवस पर सबसे बेस्ट निबंध (Gantantra Diwas Par Nibandh)। 26 जनवरी 2019 (26 January 2019) के मौके पर भारत अपना 70वां गणतंत्र दिवस 2019 (Republic Day 2019 70th) मनाएगा। 1950 में जब 26 जनवरी को हमने संविधान स्वीकार करके अपना पहला गणतंत्र दिवस मनाया तो महादेवी वर्मा के छायावाद और सरोजनी नायडू के कोमल रोमानी गीतों ने हमारी उमंगों को दोहरा कर दिया था। यह स्वाभाविक था। इससे अनेक सपने जुड़े थे। हर कोई मान रहा था अब हमें सदियों की पर्दानशीनी, बाल विवाह, सती प्रथा, निरक्षरता, बहु पत्नी विवाह, एकतरफा तलाक आदि कुप्रथाओं से मुक्ति मिलेगी और साथ ही मनु का यह विचार भी अर्थहीन हो जाएगा कि पुरुष रात दिन स्त्रियों को अपनी देखरेख में रखे, हमेशा अपने वश में रखे, कौमार्यावस्था में स्त्री पिता के अधीन, यौवन में पति के अधीन व वार्धाक्य में पुत्रों के अधीन रहे... (Republic Day Speech in Hindi 2019)...

गणतंत्र दिवस पर भाषण 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध

Republic Day Speech in Hindi 2019 / 26 January / Republic Day Essay in Hindi 2019

आज जब पिछले 69 वर्ष के इतिहास पर मैं नजर डालती हूं तो लगता है कि इस दौरान हमने बहुत कुछ पाया है, लेकिन अब भी बहुत कुछ पाना शेष है। जहां हमने सुनीता विलियम्स की तरह अंतरिक्ष में उड़ान भरी है वहीं जमीन पर हमें मुख्तारन माई बनाने का प्रयास भी जारी है। अगर मुख्तारन माई का प्रतीक याद न रहा हो तो 15 जनवरी की उस दर्दनाक घटना को याद कीजिए जब नई दिल्ली में 51 वर्षीय डेनमार्क की एक पर्यटक को 9 दरिन्दों ने कनाॅट प्लेस के पास ही तीन घंटे तक अपनी सामूहिक दरिन्दगी का शिकार बनाया।

गणतंत्र दिवस पर भाषण 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध

Republic Day Speech in Hindi 2019 / 26 January / Republic Day Essay in Hindi 2019

इन 69 वर्षों में हमारे सामने तमाम नई चुनौतियां आती रहीं, जिनमें से कुछ का समाधान निकला और कुछ के लिए संघर्ष अभी जारी है। 1955 के क्रांतिकारी हिन्दू विवाह अधिनियम से हमें कम से कम कानूनन सौतन बनने से मुक्ति और एक खराब विवाह से बाहर निकलने के लिए तलाक का अधिकार भी प्राप्त हुआ व साथ ही तलाक की स्थिति में गुजारे भत्ते का प्रावधान भी हासिल हुआ, लेकिन दहेज के लालची हमें जिंदा जलाने लगे और 1980 के दशक में स्टोव फाड़ कर बहुओं को जिंदा जलाने की समस्या इतनी विकराल हो गई कि इस पर विराम लगाने के लिए कानून में संशोधन की आवश्यकता पड़ी। इसी तरह जब राजस्थान में रूप कवंर को उसके पति की चिता पर सती कर दिया गया तो कल्पना कीजिए की 1987 में हमें सती पर रोक लगाने के लिए कानून बनाने पड़े।

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Republic Day Speech in Hindi 2019 / 26 January / Republic Day Essay in Hindi 2019

दरअसल, प्रगति के लिए जो नियम व योजनाएं बनाई गईं उनमें भी इस पुरुष प्रधान समाज ने ऐसे ऐसे रास्ते निकाल लिए कि आखिरकार नुकसान हमारा ही होना था। मसलन, बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण पाने के लिए 1974 में गर्भपात को कानूनी वैधता प्रदान की गई, लेकिन इसका दुरुपयोग इस अंदाज से किया जाने लगा कि कोख में कन्याओं का कत्ल किया जाने लगा।

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अतः यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कुछ राज्यों में लिंग असंतुलन इतना अधिक हो गया है कि प्रति हजार पुरुष केवल 827 महिलाएं बची हैं। फिर आज भी यह पुरुष प्रधान समाज हमें अपना गुलाम बनाकर ही रखना चाहता है कि हम अपनी मर्जी से उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर सकतीं, अपनी मर्जी से नौकरियां नहीं कर सकतीं और अपनी मर्जी से अपना जीवन साथी नहीं चुन सकतीं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि हायर सेकंड्री स्कूलों में हमारा राष्ट्रीय प्रवेश औसत मात्र 11.42 है और हर स्तर की नौकरियों में हम केवल 18 प्रतिशत हैं। फिर अधिक बड़ा जुल्म यह है कि हम अपनी मर्जी से अपना जीवन साथी भी नहीं चुन सकतीं, अगर ऐसा करने का प्रयास भी करें तो ‘ऑनर किलिंग’ की शिकार हो जाती हैं या हमारा रंग रूप बिगाड़ने के लिए हम पर तेजाब फैंक दिया जाता है।

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Republic Day Speech in Hindi 2019 / 26 January / Republic Day Essay in Hindi 2019

अलबत्ता इस तथ्य से इंकार नहीं है कि स्थितियां सभी राज्यों में अलग अलग हैं। जिन राज्यों में पितृ सत्तात्मक समाज है जैसे हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार आदि वहां ऑनर किलिंग की वारदातें भी होती हैं और एसिड अटैक की संख्या भी ज्यादा है। लेकिन जिन राज्यों में मातृ सत्तात्मक समाज है जैसे उत्तर पूर्वी राज्यों में तो हम नौकरियों में भी अधिक प्रतिशत में हैं और हम पर एसिड अटैक व अन्य हमले भी न के बराबर हैं।

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कहने का अर्थ यह है कि जिन क्षेत्रों में हम आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं उनमें हमारी सामाजिक व शैक्षिक स्थिति भी बेहतर है और हम अधिक सुरक्षित भी हैं। यह स्थिति इससे भी बेहतर हो सकती है अगर राजनीति में भी हमें अपना सही स्थान हासिल हो सके। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि देश की चार प्रमुख राजनीतिक पार्टियों- कांग्रेस (सोनिया गांधी), बसपा (मायावती), अन्ना द्रमुक (जयललिता) व तृणमूल कांगे्रस (ममता बनर्जी)- की हम प्रमुख हैं, लेकिन फिर भी संसद व विधानसभाओं में अपने लिए 33 प्रतिशत आरक्षण हासिल नहीं कर सकी हैं, जिसका विधेयक पिछले तीन दशक से लंबित पड़ा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब तक राजनीति में हमारी बराबर की हिस्सेदारी नहीं होगी तब तक हमारी स्थिति में इच्छा अनुसार सकारात्मक परिवर्तन नहीं आएगा।

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अब तक की दास्तान कुछ उदासी भरी प्रतीत होती है, लेकिन स्थितियां बहुत जगह बहुत बेहतर भी हैं (देखें बाॅक्स)। ऐसा नहीं है कि हम केवल दुकानों पर जाकर साड़ियों व जेवरात के लिए ही मौल भाव करती हैं। हम प्रेरणादायक शख्सियतें ही नहीं बल्कि उन पुरुषों व महिलाओं के लिए ‘हीरो’ भी हैं जो टाॅप पर पहुंचने का सपना देखती हैं। यही कारण है कि देश की जो सबसे सम्मानित बैंक हैं उनको हम ही चला रही हैं। आइए हम से मिलिए, हम हैं चंदा कोचर (आईसीआईसीआई की प्रबंध निदेशक व सीईओ), नैना लाल किदवाई (ग्रुप जरनल मेनेजर एचएसबीसी इंडिया), शिखा शर्मा (एमडी व सीईओ एक्सिस बैंक), विजय लक्ष्मी अय्यर (सीएमडी बैंक ऑफ इंडिया), कल्पना मोरपारिया (सीईओ जेपी मोर्गन इंडिया) और काकू नखाटे (कंट्री हेड बैंक ऑफ अमरीका मेरिल लिंच)।

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दरअसल, पुरुष प्रधान समाज की तमाम गंभीर चुनौतियों के बावजूद ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसमें हमने अपनी उल्लेखनीय प्रतिभा से सकारात्मक व महत्वपूर्ण योगदान न दिया हो और यह सिलसिला अब तक जारी है। मसलन, टैक्नोलाॅजी के क्षेत्र को ही लीजिए, जिसे अब तक हम महिलाओं के लिए अच्छा स्थान नहीं माना जाता था कि हमें भौतिकशास्त्र व गणित विषयों में कमजोर मान लिया जाता था। लेकिन आज अपनी हिम्मत व साहस से हमने साबित कर दिया है कि टैक्नोलाॅजी में भी हम माहिर हैं, यह अलग बात है कि हमारी संख्या अभी इस क्षेत्र में हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है।

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गौरतलब है कि फिलहाल भारतीय टैक्नोलाॅजी कम्पनियों में महिलाओं की हिस्सेदारी एंट्री स्तर पर 40 प्रतिशत है, जो मिडिल स्तर पर कम होकर 20-25 प्रतिशत रह जाती है और वरिष्ठ प्रबंधक स्तर पर प्रतिशत मात्र 10 ही है। लेकिन इसके बावजूद भविष्य बेहतर दिखाई दे रहा है। मसलन, पिछले साल बेंग्लुरु में विमेन इन टैक्नोलाॅजी कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें लगभग 250 महिलाओं ने हिस्सा लिया। अच्छी बात यह थी कि इनमें से ज्यादातर उस प्रेरणा की तलाश में आई थीं जिससे वह टैक्नोलाॅजी के क्षेत्र में अपना करिअॅॅर बना सकें। सम्मेलन की आयोजक रश्मि मोहन जो कि बेंग्लुरु के याहू लैब्स में इंजीनियरिंग मेनेजर हैं, अपने 13 वर्ष के अनुभव की रोशनी में बताती हैं, ‘‘ऐसी महिलाओं की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है जो टैक्नीकल भूमिकाएं निभाना चाहती हैं। वह आर्किटेक्ट बनना चाहती हैं और इसके लिए समय व प्रयास के निवेश से भी पीछे नहीं हट रही हैं।’’

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टेक्नोलाॅजी को लेकर जो महिलाओं के खिलाफ गलत धारणाएं बनी हुई हैं वह धीरे धीरे समाप्त होती जा रही हैं, यह अलग बात है कि अब भी महिलाओं को बेकार की बातें सुननी पड़ती हैं कि ‘तुम महिला की तरह कोड करती हो’ या इस किस्म के ही अन्य अपशब्द, तो भी आधुनिक महिलाएं टेक्नोलाॅजी को अपना जीवन बनाने से पीछे नहीं हट रही हैं। यही कारण है कि ऐसी भारतीय महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है जो केपिस्टर, मदरबोर्ड, रोबोटिक्स, इंटरनेट रिले चैट्स, प्रोग्रामिंग फोरम आदि क्षेत्रों में घुसपैठ कर रही हैं जो कि अब तक पुरुषों का संसार ही समझा जाता था। यह सही है कि टेक्नोलाॅजी फोरमों में पुरुष संस्कृति हावी है, महिलाओं की आवाजें गायब हैं, बहुत सी महिलाएं ऑनलाइन अपने लिंग को छुपाए रखती हैं, लेकिन अब काफी कुछ बदल रहा है। महिला जीक (टैक्नोलाॅजी से सम्बंधित) के व्यक्तित्व में जबरदस्त परिवर्तन आया है। अधिकतर सफल महिलाएं टैकी बहुत साहसी हैं और सामाजिक स्तर पर सेवी भी अगर थोड़ा सा सहारा उन्हें मिल जाए तो वह कामयाब उद्यमी भी बन सकती हैं।

गणतंत्र दिवस पर भाषण 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध

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आज हम महिलाएं जिस मकाम पर हैं उसे हासिल करने में सदियों का संघर्ष हमारे पीछे है, लेकिन जितना कुछ पिछले 64 वर्ष में, तमाम कठिन चुनौतियों के बावजूद, हासिल किया है उतना इतिहास में पहले कभी अर्जित नहीं किया जा सका। इंदिरा गांधी के रूप में हमने संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र पर राज किया, लता मंगेशकर के रूप में करोड़ो संगीत प्रेमियों के दिल पर राज कर रही हैं और चंदा कोचर, नैना लाल किदवाई आदि बन कर भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई बुलंदियों की ओर अग्रसर कर रही हैं। यह सब कुछ संभव न था अगर हमने अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने के बाद एक लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना करते हुए प्रगतिशील संविधान को न अपनाया होता।

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शिखर की तरफ, कदम दर कदम

चंदा कोचर, नैना लाल किदवाई, शिखा शर्मा, कल्पना मोरपारिया, विजय लक्ष्मी अय्यर और काकू नखाटे बैंकिंग व्यवसाय में सबसे बड़े नाम हैं। इन 6 भारतीय महिलाओं ने न केवल देश की 6 प्रमुख बैंकों को अपनी मुठ्ठी में किया हुआ है कि वे इनकी प्रमुख हैं बल्कि जिस प्रकार उन्होंने अपने कार्य व जीवन को संतुलित किया है उससे वह महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि पुरुषों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत हैं। इसलिए यह जानना दिलचस्प रहेगा कि इन महिलाओं की सफलता का वास्तविक राज क्या है।

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2005 से चंदा कोचर का नाम निरंतर विश्व की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में आ रहा है। वह देश की सबसे बड़ी प्राइवेट बैंक आईसीआईसीआई की प्रबंध निदेशक व सीईओ हैं। जोधपुर में जन्मी चंदा कोचर ने जयपुर में अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद मुंबई के जयहिन्द काॅलेज से अर्थशास्त्र में डिग्री हासिल की और फिर जमनालाल बजाज से एमबीए (फाइनेंस) करने के बाद वह 1984 में आईसीआईसीआई में मेनेजमेंट ट्रेनिंग के रूप में भर्ती हुईं और अब 52 वर्ष की आयु में वह इसी बैंक की एमडी व सीईओ हैं 2009 से। हालांकि यह बैंक लिंग तटस्थ होने पर गर्व करती है, लेकिन कोचर के लिए यह सफर आसान न था। उन्हें अपने पुरुष सहकर्मियों की तरह ही कठिन मेहनत करनी पड़ी, बावजूद इसके कि जिस दौर में वह आगे बढ़ने का प्रयास कर रही थीं उस समय कोई भी कम्पनी इस बात में सहज नहीं थी कि एक 24 साल की महिला ऑडिट करे या हिसाब किताब समझाए।

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दरअसल, इन सफल महिलाओं को न केवल पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा बल्कि अकसर उन्हें अपनी पारिवारिक व व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को भी कुर्बान करना पड़ा। नैना लाल किदवाई जो कि भारत की पहली महिला थीं हारवर्ड बिजनेस स्कूल में जाने वाली और जो एएनजेड ग्रिडले की पहली महिला प्रमुख बनीं और अब एचएसबीसी इंडिया की ग्रुज जरनल मेनेजर है, बताती हैं, ‘‘अपने विवाह की पहली वर्षगांठ पर मैं आधी दुनिया दूर थी। मैं अपने बच्चों के जन्मदिन, पैरेंट टीचर मीटिंग व ऐसे अनेक अवसर गंवाए हैं। लेकिन फिर भी मेरे पति ने मेरा साथ दिया और मेरी उपलब्धियों का जश्न मनाया। इसी से ही मैं अपने कार्य व जीवन में संतुलन स्थापित करने में कामयाब हो सकी।’’

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शिखा शर्मा को बड़ा ब्रेक उस समय मिला था जब उनसे देश की सबसे पहली प्राइवेट जीवन बीमा कम्पनी आईसीआईसीआई प्रुडेंशियल को स्थापित करने के लिए कहा गया। आज वह एक्सिस बैंक की एमडी व सीईओ हैं। उन्होंने अपना बचपन एक घुमंतु की तरह आजादी, खुलेपन व सुरक्षा में गुजारा। लेकिन मुंबई आकर उन्हें बड़े बंगले की जगह छोटे से फ्लैट में जीवन गुजारना पड़ा। लेकिन अब वह फिर से सुरक्षित व अधिक आराम में हो गई हैं। उनकी सफलता का राज यह है कि कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना संयम बनाए रखा। मसलन, जब आईसीआईसीआई में चंदा कोचर से टकराव के कारण उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा और वह एक्सिस बैंक की प्रमुख बनीं, तब भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक्सिस बैंक जो कि पहले यूटीआई बैंक था में काॅर्पोरेट शैली कार्य संस्कृति विकसित की, जिससे आज वह देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंकों में से एक है।

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Republic Day Speech in Hindi 2019 / 26 January / Republic Day Essay in Hindi 2019

विजय लक्ष्मी अय्यर को न केवल कार्यस्थल पर संघर्ष करना पड़ा बल्कि जब वह 39 वर्ष की थीं तो उनके पति का निधन हो गया, उनके समक्ष 9 व 12 साल की दो बच्चियों और एक बूढ़ी मां की परवरिश का सवाल था, फिर भी उन्होंने अपनी हिम्मत व लगन से यूनियन बैंक में 36 सफल वर्ष गुजारे और अब वह बैंक ऑफ इंडिया में सीएमडी के पद पर हैं।

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जेपी मोर्गन इंडिया की सीईओ कल्पना मोरपारिया का कहना है कि उनकी सफलता का कारण उनके इर्द गिर्द जो दृढ़ शक्ति वाले लोग रहे उनका सहयोग ही है। वह बताती हैं, ‘‘सबसे पहले मेरी मां, फिर मेरे पति और फिर आईसीआईसीआई के पूर्व सीईओ केवी कामत ने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। मुझे अफसोस है कि मेरे अपने कोई बच्चे नहीं हैं और एक महिला के तौर पर इसे मैं अपनी सबसे बड़ी असफलता मानती हूं। लेकिन शायद यह भी हो सकता है कि बच्चे न होने की वजह से मेरे लिए अपने करिअॅर का प्रबंधन करना व उस पर फोकस करना आसान हो गया।’’

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काकू नखाटे को देखकर ऐसा नहीं लगता कि वह काॅर्पोरेट बैंकर हैं। वह अपने आपको साड़ी में लिपटी एक महिला की छवि में नहीं देखना चाहतीं। लेकिन वह अपना काम जानती हैं और इसलिए हर कोई उन्हें गंभीरता से लेता है। यही कारण है कि आज वह बैंक ऑफ अमरीका मेरिल लिंच की भारत में प्रमुख हैं। नखाटे की सफलता का मुख्य कारण वह आत्मविश्वास है जिससे उन्होंने अपने प्रोफेशनल जीवन का प्रबंधन किया है। नखाटे का कहना है कि अगर आप सफल होना चाहते हैं तो अपने लक्ष्य पर फोकस बनाए रखिए और बाकी किसी अन्य चीज की परवाह न कीजिए।’’

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