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Republic Day 2019: भारतीय गणतंत्र के 69 वर्ष, चुनौतियां-समस्याएं और समाधान

आज संपूर्ण भारतवर्ष गणतंत्र दिवस की 69वीं वर्षगांठ मना रहा है। निश्चित ही यह गर्व-उल्लास का अवसर है। लेकिन इसके साथ ही हमें गणतंत्र के समक्ष मौजूद चुनौतियों-सवालों को भी नहीं भूलना चाहिए। निरंतर सक्रिय हो रहे सामाजिक-राजनीतिक विघटनकारी स्वर अखंड गणतंत्र के लिए कितने खतरनाक हैं? गणतांत्रिक व्यवस्था के आधार स्तंभों में टकराव को कैसे रोका जा सकता है? राजनीतिक शुचिता कैसे क्रियान्वित हो सकती है और एक नागरिक के तौर पर हम अपने कर्त्तव्य किस तरह निभा सकते हैं? ऐसे ही ज्वलंत सवालों पर सरस्वती रमेश से अपने विचार साझा कर रही हैं अलग-अलग क्षेत्रों की प्रसिद्ध हस्तियां।

Republic Day 2019: भारतीय गणतंत्र के 69 वर्ष, चुनौतियां-समस्याएं और समाधान
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आज संपूर्ण भारतवर्ष गणतंत्र दिवस की 69वीं वर्षगांठ मना रहा है। निश्चित ही यह गर्व-उल्लास का अवसर है। लेकिन इसके साथ ही हमें गणतंत्र के समक्ष मौजूद चुनौतियों-सवालों को भी नहीं भूलना चाहिए। निरंतर सक्रिय हो रहे सामाजिक-राजनीतिक विघटनकारी स्वर अखंड गणतंत्र के लिए कितने खतरनाक हैं? गणतांत्रिक व्यवस्था के आधार स्तंभों में टकराव को कैसे रोका जा सकता है? राजनीतिक शुचिता कैसे क्रियान्वित हो सकती है और एक नागरिक के तौर पर हम अपने कर्त्तव्य किस तरह निभा सकते हैं? ऐसे ही ज्वलंत सवालों पर सरस्वती रमेश अपने विचार साझा कर रही हैं अलग-अलग क्षेत्रों की प्रसिद्ध हस्तियां।
हमारे सामने कोई आदर्श नहीं है
सुभाष कश्यप, संविधान विशेषज्ञ
भारतीय गणतंत्र के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती चारित्रिक ह्रास की है। सिर्फ राजनीति ही नहीं, व्यवसाय, नौकरी और हर क्षेत्र में भयानक चारित्रिक ह्रास हुआ है। लोग नैतिकता, मूल्यों, मान्यताओं से दूर होते जा रहे हैं। हमारे लिए सफलता और संपदा ही सब कुछ बन चुकी है। राजनीति में अगर सत्ता मिले तो लोग किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे सामने रोल मॉडल जिसे हम आदर्श कहते हैं, वही नहीं है। न परिवार के अंदर, न राजनीति में, न बिजनेस में और न दूसरे क्षेत्रों में। एक समय था जब हमें हर जगह ऐसे लोग मिलते थे, जिनकी चारित्रिक दृढ़ता, त्याग, तपस्या, मूल्यों का हम अनुकरण करते थे। आज के युवाओं के सामने मॉडल ऐसे आते हैं, जो राजनीति में सफल हैं, बिजनेस में सफल हैं या कहीं और सफल हैं। उसके लिए भले ही उन्होंने अनैतिक तरीके अपनाए हों। मूल्यों, आदर्शों से समझौता किया हो। लेकिन इन बातों की ओर कोई ध्यान नहीं देता। सिर्फ उसकी सफलता की ओर देखते हैं और उसका ही अनुकरण करते हैं। यही कारण है कि आज न सिर्फ सरकारें भ्रष्ट हैं बल्कि हम सबका चरित्र भी भ्रष्ट हुआ है। सफलता ही मुख्य है, आदर्श और नैतिकता कुछ भी नहीं। जब आदर्श ही ठीक नहीं होंगे तो आम आदमी का चारित्रिक ह्रास होना लाजिमी है।
भूल गए भारतीयता : हमारे संविधान निर्माताओं के लिए देश की अखंडता ही सर्वोपरि रही। उन्होंने देश की एकता को ध्यान में रखते हुए सारा संविधान बनाया। लेकिन जो राजनीतिक व्यवस्था हमने स्वीकारी, उसमें भारतीयता को पीछे कर दिया गया। हमारे नेताओं को लगता है कि उनको अलग-अलग पहचान बनाने में ज्यादा फायदा है। अगर वे लोगों के सामने जाकर कहेंगे कि वे भारतीय हैं तो उन्हें वोट नहीं मिलेगा। वोट भारतीयता के नाम पर नहीं मिलता बल्कि धर्म और जाति के नाम पर मिलता है। हमने तो यूनिटी को सेलिब्रेट करने की जगह विभिन्नता को निजी फायदे के लिए भुनाया है।
बढ़ रही है अराजकता: भारतीय गणतंत्र का आज जो माहौल है, उसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। हम अराजकता की स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। जनता और राजनीतिक व्यवस्था के बीच एक खाई बन गई है और यह दिन-ब-दिन और चौड़ी हो रही है। लोकतंत्र के लिए इससे भयानक और कुछ भी नहीं कि जनता का विश्वास राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासन से उठ रहा है। राजनेता, जनता का विश्वास जीतने में नाकाम हो रहे हैं। भीड़ का कहीं भी हावी हो जाना, असल में अराजकता की चरम सीमा है।
स्वाधीनता के बाद हमें सबसे पहले स्व. की भावनाओं से प्रेरित होकर अपनी व्यवस्था बनानी चाहिए थी। लेकिन यह हमारी सबसे बड़ी गलती है कि आज भी औपनिवेशिक व्यवस्थाएं कायम हैं। कुछ लोगों का कहना है कि हमने ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था को अपनाया मगर सच यह है कि उन्होंने जो औपनिवेशिक कानून और व्यवस्था बनाई थी, हमने वही अपनाया। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि स्वाधीनता के बाद भी इन व्यवस्थाओं को बदला नहीं गया। अब उसकी खामियां हमारे लोकतंत्र में भी दिखाई देने लगीं, तो जब तक व्यवस्थाएं नहीं बदली जाएंगी तब तक बदलाव होना मुश्किल है।
तभी संभव है बदलाव : हमारा जो लिखित संविधान है, उसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्थापना और उनके कार्यों के बारे में लिखा है। इन तीनों के दायित्वों और कर्तव्यों को परिभाषित और परिसीमित किया गया है। अब हो यह रहा है कि तीनों ही अपने-अपने काम सुचारु रूप से नहीं कर पा रहे। लाखों केस पेंडिंग पड़े हैं, भ्रष्टाचार में व्यवस्थाएं डूबी हैं। नियम-कानून का पालन नहीं हो रहा। सुशासन अभी भी स्वप्न मात्र है। हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार है। नौकरियां बिकती हैं, पद खरीदे-बेचे जाते हैं। संसद के लिए करोड़ों खर्च होते हैं लेकिन संसद चलने ही नहीं दी जाती। संवैधानिक सुधारों में भी असंवैधानिक निर्णय दिए जाते हैं। ऐसे में व्यवस्थाएं चरमराएंगी ही। हमें कुछ आमूल-चूल परिवर्तन करने होंगे। नियमों का सख्ती से पालन कराना होगा, बदलाव तभी संभव है।
सबसे बड़ा खतरा है लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण
ओम प्रकाश शर्मा, सेवानिवृत्त न्यायाधीश-पारिवारिक न्यायालय, जयपुर
लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण हमारे गणतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। हमारा पूरा गणतंत्र लोकतंत्र पर ही आधारित है। लेकिन आज जिस तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया गलत दिशा में चल रही है, धर्म, जाति, क्षेत्रीयता की राजनीति की जा रही है, इससे सबसे बड़ा नुकसान हमारे लोकतंत्र को ही है। इससे बचने का उपाय यही है कि जनता के भीतर पॉलिटिकल अवेयरनेस आए। राजनीतिक दल देश की जनता को पूरी तरह से अज्ञान में रखे हुए हैं। पॉलिटिकल आइडियोलॉजी बिल्कुल विलुप्त होती जा रही है। कोई भी दल किसी पॉलिटिकल आइडियोलॉजी के तहत जनता से बात ही नहीं करता। जनता न तो पॉलिटिकल आइडियोलॉजी के लिए ट्रेंड है और न ही उससे वाकिफ। जाति, धर्म, क्षेत्र, लाभ या संबंधों के आधार पर वोट मांगे और दिए जाते हैं। जब तक जनता में राजनीतिक जागरुकता नहीं आती और इंटेलेक्चुअल इस क्षेत्र में काम नहीं करते, तब तक कुछ नहीं हो सकता। सरकारें बदलती रहेंगी लेकिन बदलाव नहीं आएगा।
दूर करें क्षेत्रीय असंतुलन : लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के बाद दूसरा बड़ा खतरा क्षेत्रीयता का उभार और क्षेत्रीय असंतुलन है। इतिहास को देखें तो भारत का संघ एक तरह से रिवर्ट प्रॉसेस से बना है। मतलब ऐसा नहीं हुआ कि राज्यों ने मिलकर एक संघ बना लिया। संघ ने देश को राज्यों में बदला है। हमारे देश में अलग-अलग क्षेत्रों में जो अलग-अलग सरकारें हैं, उनका गठन संकीर्ण क्षेत्रीयता के आधार पर हो रहा है। अगर किसी क्षेत्र में कोई जाति का प्रभाव प्रबल है तो वहां उसकी सरकार बन जाती है। कहीं कोई धार्मिकता प्रबल है तो वही सरकार गठन में प्रभावी होती है। हर क्षेत्र की अलग-अलग जरूरतें, परिस्थितियां और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। लेकिन हमारे देश में केंद्र ने प्राय: आंचलिकता को इग्नोर किया। अंचलों को इग्नोर करने के कारण ही इतनी विषमताएं और असंतुलन बढ़ा है। अगर हमें मजबूत संघ बनाना है तो पहले इस असमानता को खत्म करना होगा।
भीड़तंत्र की सक्रियता का कारण : इधर हाल के वर्षों में भीड़ द्वारा अराजकता की घटनाएं बढ़ी हैं। दरअसल, यह भीड़ कहीं न कहीं सत्ता द्वारा पोषित होती है। जहां भी ऐसी कोई घटना होती है, वह वहां की सरकार-प्रशासन की शह के बिना नहीं होती। कानून और व्यवस्था की ओर से की गई ढिलाई ऐसे असामाजिक तत्वों को बढ़ावा देते हैं। जब तक सत्ता की ओर से अपराधीकरण को रोका नहीं जाएगा तब तक ऐसी घटनाएं नहीं रुकेंगी।
भीड़ के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी कानून तोड़ने या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की वारदातें सामने आती हैं। लेकिन भीड़ प्रायोजित और व्यक्तिगत स्तर के अंतर को समझना होगा। आज अगर आम आदमी कानून तोड़ता है, रिश्वत देता या लेता है और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो इसकी एक पुख्ता वजह है। आज उसके सामने कोई आदर्श ही नहीं है। जब शीर्ष पर बैठे लोगों को आम आदमी बड़े-बड़े भ्रष्टाचार करते देखता है तो उनकी तुलना में अपने छोटे भ्रष्टाचार को जस्टीफाई कर लेता है। हमारा राष्ट्रीय चरित्र ऐसा हो गया है। असल में, आज हमारे देश में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है। अब जनता भी इसे कोई मुद्दा नहीं समझती तभी तो भ्रष्ट से भ्रष्ट नेता बार-बार चुनाव जीत कर आता है। जनता अपने नेताओं के भ्रष्टाचार को इग्नोर कर रही है। जो घोषित अपराधी हैं और जो भ्रष्टाचार में सजायाफ्ता हैं, दोनों ही चुनाव जीत कर आते हैं। आज भ्रष्टाचार में लोग आकंठ डूब चुके हैं और भ्रष्टाचार के प्रति बिल्कुल असंवेदनशील बन चुके हैं। जब तक भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति नहीं होगी हमें आम आदमी से ईमानदार होने की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। उम्मीदवारों का चयन भी उसके जीतने की संभावना देखकर होता है। नेहरू, गांधी, लोहिया को आदर्श मानकर चली पार्टियों ने आज अपनी विचारधाराओं को तिलांजलि दे दी है। आज पार्टियां अवसरवाद और सत्ता की राजनीति कर रही हैं। बदलाव की असल चाबी जनता के हाथ में ही है। भ्रष्ट और अपराधियों को ही जनता नकारना शुरू कर दे तो कुछ तो बदलाव नजर आने ही लगेगा।
निजी स्वार्थों का टकराव
इधर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की एक नई समस्या उभरी है। भारतीय गणतंत्र का सेपेरेशन ऑफ पावर की थ्योरी चेक एंड बैलेंसेज पर आधारित है। सबकी अपनी-अपनी सीमाएं हैं लेकिन पिछले लंबे समय से यह देखा गया है कि कार्यपालिका और विधायिका अपने कार्य सही तरह से नहीं कर रही हैं। इससे न्यायिक सक्रियता बढ़ने लगी। लेकिन इसकी भी अपनी सीमाएं होनी चाहिए। कई बार विधायिका एक निर्णय के लिए सुप्रीम कोर्ट को मानती है और दूसरे के लिए उसे गलत ठहरा देती है। दोहरा मानदंड तो विधायिका अपनाती है। जहां कहीं भी न्यायपालिका और विधायिका में टकराव होता है, वह असल में सत्ता में बैठे राजनीतिक दलों के निजी हितों का टकराव है। इसका उपाय यह है कि न्यायपालिका इतनी सख्त हो कि हर किसी को कंटेंप्ट के मामले में सजा दे या फिर जनमत संग्रह हो।
निजी स्वार्थ त्यागकर होना होगा एकजुट
एल. एन. राव, सेवानिवृत्त डीसीपी, दिल्ली पुलिस
आज हमारे देश में जो माहौल है, वह हमारे गणतंत्र के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता। किसी भी मुद्दे को लेकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर असल बात से जनता को गुमराह रखा जाता है। लोगों को अंधेरे में रखने के पीछे राजनीतिक एजेंडे होते हैं। इससे न सिर्फ देश आंतरिक रूप से कमजोर हो रहा है बल्कि विदेशों में भी देश की छवि खराब हो रही है। अगर हमारे गणतंत्र को मजबूत बनाना है तो सभी राजनीतिक पार्टियों को निजी स्वार्थ की राजनीति छोड़नी होगी। जब तक हम एकजुट हो देश के बारे में नहीं सोचेंगे हमारे गणतंत्र के समक्ष चुनौतियां समाप्त नहीं होंगी।
खतरनाक है क्षेत्रीयता के आधार पर बांटना: जहां तक क्षेत्रीयता के उभार की बात है तो विकास के लिए यदि क्षेत्रीयता की बात की जाए तो यह गलत नहीं है लेकिन स्वार्थ के लिए देश को क्षेत्रीयता के आधार पर बांटना गणतंत्र के लिए खतरनाक है। विघटनकारी तत्वों के दबाव में देश को किसी भी रूप में नहीं बांटा जाना चाहिए। हमें वह पुरानी कहावत नहीं भूलनी चाहिए कि चार लकड़ियों को यदि एक साथ तोड़ा जाए तो वे नहीं टूटती लेकिन उन्हें अलग-अलग कर तोड़ा जाए तो वे आसानी से टूट सकती हैं। यानी जो शक्ति और मजबूती साथ रहकर होगी, वह अलग-अलग नहीं हो सकती। विकास के लिए क्षेत्रीयता की बात हो, बैर के लिए नहीं।
विघटनकारी तत्वों से रहें सावधान: क्षेत्रीयता के उभार के साथ ही हाल में भीड़ के अराजक होने की घटनाओं में इजाफा हुआ है। भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता लेकिन हर भीड़ को कोई न कोई लीड करने वाला होता है। बिना नेतृत्व, गुट या समर्थन के कोई भी भीड़ अराजकता नहीं फैलाती। मैं समझता हूं कि विघटनकारी ताकतों का इन घटनाओं के पीछे हाथ होता है। ये हमारे देशहित की बात नहीं करते। भीड़तंत्र फैलाने के पीछे उनका छिपा हुआ एजेंडा होता है। यह व्यक्तिगत हित साधने के लिए सार्वजनिक रूप से किसी को नुकसान पहुंचाने की बात है। हमारे गणतंत्र के लिए यह चलन खतरनाक है और इसे कानून के दायरे में रखकर रोका जाना चाहिए। ऐसी घटनाएं आम आदमी के मन में कानून व्यवस्था और सरकार दोनों के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं।
अधिकार के साथ निभाएं कर्तव्य: हमारे देश में कानून तो सही है लेकिन उनका कार्यान्वयन ठीक तरीके से नहीं होता। लोगों को पता है कि ट्रैफिक नियम तोड़ना गलत है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए लेकिन फिर भी वे ऐसा करते हैं। कानून का सख्ती से पालन नहीं कराया जाता इसलिए कानून तोड़ना आम बात हो गई है। हमारा संविधान देश के नागरिकों को अधिकार देता है तो उनके कुछ कर्तव्य भी निर्धारित करता है। जिस तरह हम अपने अधिकार लेना चाहते हैं उसी तरह अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करेंगे तो देश आगे कैसे बढ़ पाएगा।
लोकतंत्र के नए प्रतीक गढ़ने होगे
जाबिर हुसेन, लेखक-राजनीतिक चिंतक
मेरी नजर में सबसे बड़ी चुनौती लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों के प्रति गहराती अनास्था है। आजादी के बाद, नई पीढ़ी को हमने इन उसूलों के प्रति सजग और संवेदनशील बनाने का काम नहीं किया। तकनीक के बाजारवादी प्रभाव ने संविधान की मूल आत्मा को आहत कर रखा है। हमें इसके बुरे प्रभाव को रोकने के लिए शिक्षा की बुनियादी इकाई को अपना सार्थक लक्ष्य बनाना होगा।
इसलिए सक्रिय है भीड़तंत्र : भीड़ आज के समय में एक संस्था का रूप ले चुकी है। असंवेदनशील विधायिका, अकर्मण्य कार्यपालिका और सुस्त न्यायपालिका इसके मुख्य कारण हैं। अराजकता समाज की पहचान बनती जा रही है। कानून निष्प्रभावी हो गए हैं। कानूनों को तोड़ना, उनसे मुठभेड़ करना हमारा सामाजिक आचरण हो गया है। संविधान और कानून की व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू किए बिना हम इस भीड़तंत्र पर लगाम नहीं लगा सकते।
समाज समझे अपनी जिम्मेदारी : सरकार ने स्वयं समाज के बहुत सारे काम अनावश्यक रूप से अपने हाथ में संभाल रखे हैं। दरअसल सरकार किसी भी दल की हो खुद को समाज का विकल्प बनाने की दिशा में बढ़ रही है। इन सारी जिम्मेदारियों को निभाने का दायित्व लेकर सरकार समाज को अपने नियंत्रण में रखना चाहती है। यह सरकार की एक अप्राकृतिक आकांक्षा है। हमें संपूर्ण समाज को अपने लक्ष्यों और दायित्वों के प्रति उत्तरदायी बनाना होगा।
हम अपने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मानते हैं, हम हैं भी, लेकिन हमने अपने आप को लोकतंत्र के सामान्य सिद्धांतों और व्यवहार-पद्धति में प्रशिक्षित नहीं किया है। हमने लोक-जीवन की अपेक्षाओं के प्रति खुद को ढालने का काम भी नहीं किया। चुनाव हमारे लिए भविष्य की आधारशिला नहीं रह गए हैं। यही कारण है कि भीड़ की मानसिकता हमारे चुनावों को भी दूषित कर रही है।
वर्तमान परिस्थितियों में, मैं किसी कानूनविद् या संविधान-विशेषज्ञ की तरह नहीं सोचता। मेरी सोच का आधार ‘समाज’ है। मैं समाज को ही अपने कर्म-अकर्म की कसौटी मानता हूं। आज हमारी प्रायः सभी संस्थाओं का बिखराव अपने चरम पर है। कतिपय अलोकतांत्रिक और जटिल फैसलों से हम इस बिखराव को नहीं रोक सकते। हमें, आने वाले समय में, कुछ नए लोकतांत्रिक प्रतीकों का सृजन करना होगा, जो हमारी लोकतांत्रिक अपेक्षाओं पर खरे उतरें। बिना समय गंवाए हमें इसकी शुरुआत करनी होगी। निश्चित ही, मीडिया इस काम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

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