Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

Republic Day Speech : गणतंत्र दिवस पर भाषण ''औरत आजाद भी है, पुरुष से बेहतर भी''

गणतंत्र दिवस पर भाषण के लिए अगर आपको भी तैयारी करनी है तो हरिभूमि गणतंत्र दिवस 2019 (Republic Day 2019) के अवसर पर आपके लिए लाया है हिंदी में गणतंत्र दिवस पर भाषण 2019 (Republic Day Speech in Hindi 2019)...

Republic Day Speech : गणतंत्र दिवस पर भाषण औरत आजाद भी है, पुरुष से बेहतर भी
X

Republic Day Speech: गणतंत्र दिवस पर भाषण के लिए अगर आपको भी तैयारी करनी है तो हरिभूमि गणतंत्र दिवस 2019 (Republic Day 2019) के अवसर पर आपके लिए लाया है हिंदी में गणतंत्र दिवस पर भाषण 2019 (Republic Day Speech in Hindi 2019)... अंग्रेजों के शासन काल में धार्मिक कारणों से दोनों हिन्दू और मुस्लिम फौजियों ने चर्बी युक्त कारतूस का इस्तेमाल करने से इंकार कर दिया था, जिससे क्षुब्ध होकर अंग्रेजों ने मेरठ छावनी के 86 फौजियों को सलाखों के पीछे डाल दिया था। कैद किए गए फौजियों को जिस बेइज्जती के साथ शहर में परेड किया गया था उससे जनता में बहुत रोष था। यह घटना 10 अप्रैल 1857 की है। लेकिन इसके बावजूद अन्य फौजी तुरंत बगावत के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि क्रांति की गोपनीय तिथि 30 मई निर्धारित की थी। योजना अनुसार फौजी तो संयम रखे हुए थे, लेकिन क्रांति योजना से अनभिज्ञ जनता में रोष निरंतर बढ़ता जा रहा था। हद तो यह है कि शहर की तवायफें भी फौजियों के खिलाफ किए गए दुव्र्यवहार से नाराज थीं, उन्होंने विरोध स्वरूप अपने कोठे बंद किए हुए थे। इसलिए जब 9 मई की शाम को फौजी सदर बाजार स्थित कोठों पर गाना सुनने के लिए पहुंचे तो हार्मोनियम खामोश थे व तबले उलटे पड़े हुए थे। तवायफों ने फौजियों को खरी-खरी सुनाते हुए कहा, ‘‘बड़ी बड़ी मूंछे रख रखी हैं, लेकिन जेल में बंद अपने भाइयों का कोई दर्द नहीं है। लो, यह चूड़ियां पहन लो और घर में बैठ जाओ।’’

यह लताड़ सुनकर उसी शाम फौजियों ने क्रांति की घोषणा कर दी और मेरठ छावनी पर कब्जा करने के बाद अगली सुबह यानी 10 मई को दिल्ली की ओर कूच कर गए ताकि बहादुर शाह जफर को ‘आजाद भारत’ का बादशाह घोषित किया जा सके। चूंकि क्रांति की तिथि 30 मई थी और तवायफों के कारण मेरठ में समय पूर्व ही क्रांति आरम्भ हो गई, इसलिए अंग्रेजों को भारत के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने का पर्याप्त समय मिल गया और उन्होंने ऐसा कर भी दिखाया। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि तवायफों की ‘बेवकूफी’ से वह क्रांति भी असफल हो गई जिसकी कामयाबी की संभावनाएं बहुत अधिक थीं और जिसके कारण भारत को स्वतंत्रता के लिए 1947 तक यानी 90 वर्ष और ज्यादा इंतजार करना पड़ा। लेकिन इस घटना से यह भी मालूम होता है कि गुलामी का अहसास और आजादी की चाहत 1857 में भी भारत की महिलाओं में थी, चूंकि महिलाएं भी संभवतः राजा राममोहन राय, केशव चन्द्रसेन आदि के धार्मिक और सामाजिक आंदोलनों से प्रभावित थीं, जिन्होंने सती प्रथा, कन्या वध, पर्दा प्रथा आदि कुरीतियों पर विराम लगाने की कोशिशें की गईं और विधवाओं को पुनर्विवाह के लिए प्रेरित किया गया।

कहने का अर्थ यह है कि 19वीं शताब्दी के समाज सुधार आंदोलन और 20वीं शताब्दी के स्वतंत्रता आंदोलन के फोकस में न केवल महिला मुद्दे थे बल्कि महिलाओं की भूमिका भी उनमें उल्लेखनीय व प्रेरणादायक थी, भले ही इतिहासकारों ने उन्हें उचित महत्व व स्थान न दिया हो। दरअसल, आज आजाद भारत में महिलाएं जो सभी क्षेत्रों में बराबरी का हक पाए हुए हैं या पाने का प्रयास कर रही हैं तो उसकी जड़ें स्वाधीनता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका से ही जुड़ी हुई हैं। रानी लक्ष्मीबाई के साहस और मेरठ व लखनऊ की तवायफों के आजादी के आंदोलन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौरपर भाग लेने से ही यह जाहिर होता है।

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जहां राजनीतिक स्तर पर महिलाएं गांधी जी के नेतृत्व में अंग्रेजों का विरोध करते हुए जेल जा रही थीं। आजादी के आंदोलन में अरूणा आसिफ अली भी इसी फेहरिस्त में शामिल हैं। महिलाओं की सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए वह कलम का सहारा भी लिए हुए थीं। इस्मत चुगताई की 1930 की कहानी ‘लिहाफ’ को इस पृष्ठभूमि में देखना बेहतर होगा, जिसमें उन्होंने यह बताने का सफल प्रयास किया है कि महिलाओं को अपने तन व मन पर पूर्ण नियंत्रण व स्वतंत्रता होनी चाहिए। गौरतलब है कि प्राचीन वैदिक युग में महिलाओं को पूर्ण अधिकार व स्वतंत्रता प्राप्त थी, जिसे मध्य युग में वह विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक कारणों से खो बैठीं थीं। अपनी इसी खो हुई आजादी को पाने के लिए महिलाओं ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान एक बीज बोया जो अब आजादी के 67 वर्ष बाद एक विशाल वृक्ष बन गया है। स्वाधीनता के समय महिलाओं के समक्ष मुख्य तौरपर तीन चुनौतियां थीं। एक अंग्रेजों की गुलामी से आजादी पाना, दूसरा पुरुष प्रधान समाज में फैली कुरीतियों से मुक्ति पाना और यह साबित करना कि किसी भी क्षेत्र में वह पुरुषों से कम नहीं हैं बल्कि उनसे बेहतर ही हैं।

अब सवाल यह है कि क्या इन तीनों चुनौतियों में भारतीय महिलाओं को सफलता प्राप्त हुई है। जहां तक अंग्रेजी शासन से आजादी पाने की बात है तो वह 15 अगस्त 1947 को हासिल हो गई। जहां तक हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी करने की बात है, तो महिलाओं ने लगभग हर क्षेत्र मंे साबित कर दिया है कि वह किसी भी दृष्टि से पुरुषों से कम नहीं हैं, बल्कि उनसे बेहतर ही हैं। अगर राजनीति को देखें तो अमरीका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकी है, लेकिन भारत में महिलाएं राष्ट्रपति (प्रतिभा पाटिल), प्रधानमंत्री (इंदिरा गांधी), मुख्यमंत्री (नंदनी सत्थपति, जय ललिता, मायावती, ममता बनर्जी आदि) और अन्य अनेक महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों को सफलतापूर्वक सुशोभित कर चुकी हैं व कर रही हैं। अगर अंतरिक्ष में राकेश शर्मा जाकर ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ का गान करते हैं तो कल्पना चावला व सुनीता विलियम्स भी आसमानों की हदों को छू चुकी हैं। भले ही कल्पना चावला को अपनी इस सफलता को हासिल करने में अपने प्राण ही क्यों न गवाने पड़े लेकिन उनकी सफलता की बुलंदियों को हम कभी भुला नहीं सकते। अगर भारतीय मूल के सलमान रुश्दी को लेखन के लिए बुकर प्राइज से सम्मानित किया जाता है तो यह सम्मान अरुणधति राय व अनीता देसाई भी हासिल कर चुकी हैं। अगर रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह कांस्य पदक से चूक गए थे तो मोंटरियल ओलंपिक में पीटी ऊषा भी इस कारनामें को दोहराते हुए रह र्गईं। महिला पुरुष बराबरी की इस किस्म की तुलनाओं की एक लंबी सूची है, जो प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित है और गौर से देखने पर मालूम होता है कि महिलाएं ही इक्कीस हैं। अब तो शोध भी यह साबित कर रहा है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में हर लिहाज से बेहतर हैं ।

यह सही है कि आज जब हम अखबार खोलते हैं तो महिलाओं के खिलाफ निरंतर बढ़ते अत्याचार, यौन हिंसा की खबरें ही पढ़ने को मिलती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े भी बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा व अन्य अपराधांे में निरंतर वृद्धि हो रही है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस संदर्भ में शीघ्र सुधार की आवश्यकता है। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आज जो महिला सम्बंधी ये मुद्दे फोकस में बने हुए हैं और जिनके समाधान के गंभीर प्रयास हो भी रहे हैं, तो इन कोशिशों का श्रेय भी विभिन्न महिला संगठनों व उनके आंदोलनों को ही दिया जाना चाहिए, साथ ही स्वीकार कर लेना चाहिए कि महिलाओं ने अपना हक मांगना नहीं बल्कि हासिल करना सीख लिया है और जल्द ही उन्हें आशानुरूप सफलता भी हासिल हो जाएगी। गौरतलब है कि एक नए सामाजिक आंदोलन के रूप में महिला आंदोलन ने 1970 के दशक में गति पकड़ी जिसमें धीरे धीरे नारीवादी दृष्टिकोण के सभी रंग समाते चले गए। पहले चरण में इन महिला आंदोलन का जोर अपने अधिकारों पर था, दूसरे में आजादी व स्वायत्तता पर और अब तीसरे चरण में वह अन्य मुद्दे उठा रही हैं जैसे घरेलू कामकाज को भी काम समझा जाए, घर व बाहर उन्हें हिंसा से सुरक्षित रखा जाए (देखें बाॅक्स-1) आदि और इसमें शक नहीं है कि उन्हें जल्द कामयाबी भी मिल जाएगी।

‘महिलाओं के लिए कोई देश नहीं’

करण जौहर की चर्चित फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ आपको अवश्य याद होगी। इसमें राहुल खन्ना (शाहरूख खान) को अपनी अच्छी दोस्त अंजलि शर्मा (काजोल) से शुरूआत में प्रेम नहीं होता है क्योंकि वह टाॅमब्वाय होने के नाते लड़कों की तरह व्यवहार करती है। लेकिन जब बाद में अंजलि में परिवर्तन आता है और वह साड़ी पहनने वाली शर्मीली लड़की बन जाती है तो राहुल खन्ना को उससे प्रेम हो जाता है। सवाल यह है कि राहुल खन्ना को टाॅमब्वाय अंजलि शर्मा से प्रेम क्यों नहीं होता? फिर जब वह साड़ी पहनने वाली शर्मीली महिला बन जाती है तो प्रेम क्यों होता है? इस किस्म के सवाल 19 वर्ष की दो लड़कियां रिया वैद्या व शिरीना ठाकोर उठा रही हैं, जो ब्राउन विश्वविद्यालय की छात्रा हैं और फिलहाल अपनी संगठन ‘नो कंट्री फाॅर वीमेन’ (महिलाओं के लिए कोई देश नहीं) द्वारा भारत के विभिन्न स्कूलों में वर्कशाॅप का आयोजन कर रही हैं।

रिया या शिरीना का कहना है लिंग संबंधी भेदभावों व धारणाओं (स्टीरियोटाइप्स) की जड़ें बहुत गहरी हैं, इन्हीं की वजह से महिलाओं के खिलाफ यौन अत्याचार होते हैं। इनका समाधान यही है कि भेदभावों व गलत धारणाओं पर बचपन में ही विराम लगा दिया जाए। रिया व शिरीना की परवरिश भारत में हुई थी। अपने बचपन को याद करते हुए वह बताती हैं कि उन्हें निरंतर यह आदेश दिए जाते थे कि वह किस तरह से बातचीत करें, कैसे कपड़े पहनें और किस तरह का व्यवहार करें। जबकि दूसरी ओर लड़कों से ‘लड़कों की तरह’ व्यवहार करने को कहा जाता था और यह भी कि लड़के तो लड़के होते हैं उनसे छोटी मोटी भूलें तो हो जाती हैं। इस किस्म के जुमलों से लड़कों को अपने आक्रामक या हिंसक व्यवहार का बहाना मिल जाता है। समाज एक तरह से लड़कों को गलत हरकतों के लिए मूक सहमति प्रदान करने का प्रयास करता है।

दिसम्बर 2012 की दिल्ली सामूहिक बलात्कार घटना का रिया व शिरीना पर गहरा प्रभाव पड़ा है और वह महिलाओं के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा के कारणों को गहराई से समझने के लिए प्रयासरत हैं। इस सिलसिले में रिया का कहना है, ‘‘बलात्कार वास्तव में जटिल मुद्दा है। हम इसके संदर्भों को समझना चाहती हैं। गहरी खोजबीन के बाद हमें अहसास हुआ कि बाल अवस्था में जो जेंडर पुलिसिंग (लिंग आधारित टोका टाकी) आरम्भ होती है वह बाद में अनेक घटनाओं का उत्पे्ररक बन जाती है। इसलिए हमने फैसला किया कि बच्चों को इन विचारों से परिचित कराया जाए ताकि वह सामाजिक स्थितियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कर सकें। हम अपनी वर्कशाॅप के जरिए बच्चों में ऐसे गुण भी विकसित करना चाहती हैं जो उन्हें हर किस्म के विजुअल मीडिया को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने के योग्य बना दें।’’

अपनी एक घंटे की वर्कशाॅप में रिया व शिरीना जेंडर स्टीरियोटाइपिंग (लिंग सम्बंधी गलत धारणाएं) के ऐसे पांच उदाहरण प्रस्तुत करती हैं जिनसे छात्र तुरंत जुड़ जाते हैं। शिरीना का कहना है, ‘‘हमारी योजना सामाजिक कला अभियान छेड़ने की है जहां छात्र जेंडर पुलिसिंग व स्टीरियोटाइपिंग की रोजमर्रा की घटनाआंे के बारे में लघु कथाएं, कोट्स व पोस्टर पोस्ट कर सकते हैं।’’ इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारेे समाज मंे बचपन से ही लड़कियों से भेदभाव किया जाता है व लड़कों को वरीयता दी जाती है, इसलिए रिया व शिरीना का जो नींव को सुधारने का प्रयास है वह निश्चित तौरपर सराहनीय है।

महिलाएं मैराथन बेहतर दौड़ती हैं

महिलाओं को आज भी पुरुषों की तुलना में कमजोर समझा जाता है, लेकिन निरंतर ऐसे वैज्ञानिक सच सामने आ रहे हैं, जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि वह पुरुषों से किसी सूरत में भी कमतर नहीं हैं बल्कि बेहतर ही हैं। लंबे समय तक यह समझा जाता रहा कि 26.2 मील लंबी मैराथन दौड़, जो लगभग 2.5 घंटे में पूरी होती है, महिलाओं के लायक नहीं है, लेकिन अब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं बेहतर योजना से मैराथन दौड़ती हैं।

जिस भी व्यक्ति ने मैराथन में हिस्सा लिया है या उसे देखा है, वह जानता है कि पूरे 26.2 मील के फासले के दौरान समान गति बनाए रखना आवश्यक है। कुछ अध्ययन व अनेक किस्से कहानियों में यह सुझाव दिया गया था कि मैराथन को एक सामान्य गति से दौड़ने में महिलाओं की तुलना में पुरुष अधिक सक्षम हैं, लेकिन किसी बड़े अध्ययन में इस बात की पुष्टि नहीं हुई थी।

इसलिए पिछले माह ‘मेडिसन ऑफ साइंस इन स्पोटर््स एंड एक्सरसाइज’ में जो नया अध्ययन प्रकाशित हुआ है, वह महत्वपूर्ण हो जाता है। इस अध्ययन के लिए मिलवाॅकी स्थित मार्केटे विश्वविद्यालय, रोस्टर स्थित मायोक्लीनिक व एलनडेल स्थित ग्रेंड वैली स्टेट यूनीवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 14 पूर्ण मैराथन से डाटा एकत्र किया, जिनमें शिकागो व डिज़नी की प्रमुख मैराथन भी शामिल हैं। इनमें से कुछ मैराथन गर्म मौसम में और कुछ कड़कती ठंड में आयोजित हुई थीं।

इस तरह शोधकर्ताओं को 91929 मैराथन धावकों के बारे में जानकारी मिली, जिसमें से लगभग 42 प्रतिशत महिलाएं थीं। डाटा में सभी वयस्क आयु वर्ग और बड़े पैमाने पर फिनिशिंग समय को कवर किया गया। साथ ही प्रत्येक धावक के समय को दौड़ के बीच में व दौड़ समाप्त करने पर भी तुलना की गई, जो कि एक साधारण तरीका है गति को तय करने का। अगर कोई धावक दौड़ के पहले हिस्से को भी दौड़ के दूसरे हिस्से के समय में ही पूरा करता है तो उसकी गति सामान्य मानी जाती है, खासकर इसलिए कि दौड़ के दूसरे हिस्से में बहुत कम धावक ही ज्यादा तेज दौड़ पाते हैं।

शोध में यह चैंका देने वाला सत्य सामने आया कि महिलाओं की तुलना में पुरुष दौड़ के दूसरे हिस्से में अधिक धीमे हो जाते हैं। पुरुष दौड़ का दूसरा हिस्सा पहले हिस्से की तुलना मंे औसतन 16 प्रतिशत धीमा दौड़ते हैं, जबकि महिलाओं के लिए यह प्रतिशत 12 है। डाटा का विश्लेषण अधिक गहराई से करते हुए शोधकर्ताओं ने उन धावकों को अलग श्रेणी में रखा जो दौड़ के दूसरे हिस्से में पहले हिस्से की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक धीमा पूरा करते हैं। दूसरे शब्दों में अगर धावक पहला हिस्सा दो घंटे मंे और दूसरा 2 घंटे 36 मिनट में पूरा करता है तो वह ज्यादा धीमा हो गया है।

शोध में सामने आया कि अति धीमी श्रेणी में भी पुरुषों की संख्या महिलाओं की संख्या की तुलना में अधिक थी। जहां अति धीमी श्रेणी में पुरुष 14 प्रतिशत थे तो महिलाएं मात्र 5 प्रतिशत थीं। दौड़ की यह गति सभी आयु वर्गों या फिनिशिंग समय में देखने को मिली, हद तो यह है कि सबसे तेज दौड़ने वाले धावकों में भी दौड़ के अंतिम चरण में भी महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक सामान्य गति से दौड़ती हैं। शोधकर्ताओं ने इस तथ्य पर भी विचार किया कि धावकों का अनुभव दौड़ की गति को किस तरह प्रभावित करता है। इसके लिए भी उन्होंने 2929 धावकों का दौड़ इतिहास निकाला और इससे भी यही मालूम हुआ कि पुरुष चाहे कितने ही अनुभवी क्यों न हों व अनुभवी महिलाओं की तुलना में दौड़ के दूसरे हिस्से में उनसे धीमे हो जाते हैं।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story