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गणतंत्र दिवस पर निबंध : स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ की रियासतों की भूमिका

26 जनवरी 2019 (26 Januray 2019) को भारत अपना 70वां गणतंत्र दिवस 2019 (Republic Day 2019) मनाएगा। ऐसे में हरिभूमि आपको बता रहा है स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ की रियासतों की भूमिका के बारे में। छत्तीसगढ़ राजतंत्र और सामंतशाही का गढ़ रहा है।

गणतंत्र दिवस पर निबंध : स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ की रियासतों की भूमिका

Republic Day Essay

26 जनवरी 2019 (26 Januray 2019) को भारत अपना 70वां गणतंत्र दिवस 2019 (Republic Day 2019) मनाएगा। ऐसे में हरिभूमि आपको बता रहा है स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ की रियासतों की भूमिका के बारे में। छत्तीसगढ़ राजतंत्र और सामंतशाही का गढ़ रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय छत्तीसगढ़ अनेक रियासतों में बंटा हुआ था। प्राय: सभी रियासतों के देशभक्त गांधीजी तथा देश के अग्रणी नेताओं की अगुवाई और निर्देशों का पालन करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दे रहे थे। दमनकारी नीतियों का विरोध करते स्वंतत्र भारत के लिए लडा़ई लड़ने में इन रियासतों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। देश की अन्य रियासतों के साथ छत्तीसगढ़ प्रांत की भी रियासतों में कांग्रेस द्वारा उत्प्रेरित और द्वितीय महासमर भारत की आजादी के लिए देशी रियासतों में फैल गई थी। इस समय छत्तीसगढ़ की अनेक रियासतों में महत्वपूर्ण जन आंदोलन हुए थे। अंत में अंग्रेजों ने अनुभव किया कि यदि यहां राजनेताओं ने अपने शासन में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किए तो बहुत शीघ्र ही जन आंदोलन के सामने झुकना पड़ेगा।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: ब्रिटिश नियंत्रण की स्थापना

ब्रिटिश नियंत्रण काल (सन 1818 से 1830) में अंग्रेजों ने नागपुर राज्य के साथ ही उसके अधीनस्थ छत्तीसगढ़ अंचल के प्रशासन एवं जनजीवन को प्रभावित किया। ब्रिटिश रेसीडेन्ट के रूप में मि. जेनकिन्स और छत्तीसगढ़ के अधीक्षक के रूप में मि. एग्न्यू अनेक वर्षो तक यहां की शासन नीति के नियामक बने रहे। नागपुर राज्य के ब्रिटिशकालीन शासनान्तर्गत सम्मिलित होने पर सन 1854 में छत्तीसगढ़ के प्रशासन के लिए एक अलग से डिप्टी कमिश्नर की नियुक्ति की गई जिसका मुख्यालय रायपुर था। छत्तीसगढ़ के प्रशासन का कार्यभार ग्रहण करने वाला व्यक्ति केप्टन इलियट था। उसके कार्यक्षेत्र में बंटा-रायपुर धमतरी और बिलासपुर। कुछ दिनों पश्चात सन 1861 में बिलासपुर जिले की स्थापना हुई।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: भोंसला शासन

छत्तीसगढ़ में भोंसला शासन के एजेन्ट के रूप में ब्रिटिश शासन एक अल्पकालीन व्यवस्था थी और उसका हस्तांतरण रघुजी तृतीय के वयस्क होने के बाद होना था। यही कारण था कि ब्रिटिश नियंत्रण काल में मराठाकालीन शासन व्यवस्था को परिवर्तन कर न्यायपूर्ण तथा जनहितकारी बनाया गया। अंग्रेज और भोंसला शासक के बीच एक नवीन संधि हुई जिसके अनुसार छत्तीसगढ़ में भोंसला शासन की पुर्नस्थापना 1830 ई. में हुई और विधिवत शासन का हस्तांतरण किया गया। तत्कालीन रेसीडेन्ट ने छत्तीसगढ़ अधीक्षक केप्टन क्राफर्ड को शासन के हस्तांतरण हेतु एक स्पष्ट निर्देश भेजने के बाद छत्तीसगढ़ का शासन नागपुर के राजा को हस्तांतरित कर दिया गया। इसी समय से अधीक्षक ने प्रशासकीय मामले में हस्तक्षेप करना छोड़ दिया। छत्तीसगढ़ में अपना प्रत्यक्ष शासन स्थापित करने के पश्चात बिम्बाजी भोंसले (1758-1787) ने अपने राजकुमार व्यंकोजी को यहां का शासक नियुक्त किया। बिम्बाजी ने रतनपुर के प्राचीन महल में प्रवेश कर छत्तीसगढ़ के शासन की बागडोर संभाल ली। छत्तीसगढ़ के शासन के संबंध में उसने सर्वथा एक नवीन नीति अपनाई। यद्यपि वह नागपुर राजा के सहायक के रूप में यहां शासन के लिए नियुक्त किया गया था, तथापि उसने परिस्थितियों का लाभ उठाकर अपने को यहां का स्वतंत्र शासक बना लिया। छत्तीसगढ़ की राजधानी रतनपुर में रहकर पहले की तरह अपना प्रत्यक्ष शासन करने के बजाए उसने नागपुर से ही यहां का शासन चलाने का निर्णय किया। इसका परिणाम यह हुआ कि नागपुर ही छत्तीसगढ़ की राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया और रतनपुर का राजनैतिक वैभव धूमिल होने लगा। दिसंबर 1787 ई. में बिम्बाजी की मृत्यु हुई तब रतनपुर की जनता काफी दुखी हुई। यह बात उनकी लोकप्रियता को प्रमाणित करती है लेकिन मराठा शासन के आगमन के साथ ही रतनपुर राज्य के प्राचीन वैभव का हास होने लगा। उसका अस्तित्व लुप्त होने लगा, परंतु लोगों को इस तथ्य का ज्ञान न हो सका।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: सूबेदारी प्रथा

भोंसला राजकुमार व्यंकोजी ने शासन सूबेदार के माध्यम से चलाने का निश्चय किया। यहीं से छत्तीसगढ़ में सूबेदार को नियुक्त करने की प्रथा का आरंभ हुआ। शासन ने इस नवीन स्वरूप को सूबा सरकार की संज्ञा प्रदान की। यह शासन प्रणाली सन 1787 से 1818 तक विद्यमान रही। छत्तीसगढ़ में सूबा शासन के जनक व्यंको जी का यहां तीन बार आगमन हुआ। परंतु उन्होंने यहां के शासन में व्यक्तिगत रूचि नहीं ली। वे अपने को कभी भी नागपुर की राजनीति से अलग नहीं कर सके। मराठा लोग छत्तीसगढ़ का शासन सूबेदारों को सौंपकर निश्िंचत हो जाते थे।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: सूबा शासनकाल

सूबा शासनकाल में यहां केवल पीड़ा-आतंक और लूट-खसोट का ही बोलबाला रहा और इस क्षेत्र को सत्ता संघर्ष में लगे मराठों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। इस अवधि में छत्तीसगढ़ को जितनी पीड़ा-कठिनाई और अव्यवस्था का सामना करना पड़ा, इसके पूर्व या बाद के किसी काल में नहीं हुआ। 1818 में जब उक्त शासन का नाटकीय ढंग से अंत हुआ, तब इस क्षेत्र ने राहत की सांस ली।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम संघर्ष का अभियान अपने चरम उत्कर्ष पर था। क्रिप्स योजना की विफलता के पश्चात कांग्रेस ने मुंबई के अधिवेशन में 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे देश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे देशव्यापी जन आंदोलन आधार बना और अशांति का वातावरण व्याप्त हो गया। यहां यह भी सत्य है कि यह गिरफ्तारियां अशांति दूर करने के लिए अस्थाई तौर पर की गई थी, किन्तु इस बीच आंदोलन ने शीघ्र ही हिंसक रूप धारण कर लिया। लगभग एक वर्ष तक पूरे देश में शासन निहत्था हो गया। कानून और व्यवस्था का नामोनिशान न रहा, जंगल कानून स्थापित हो गया। यहां नियुक्त चीफ कमिश्नर असिस्टेंट राजा और जमीदारों के साथ आंग्ल नीतियों के सुदृढ़ प्रभाव को गतिशील बनाने के लिए प्रयासरत थे। ब्रिटिश पार्लियामेंट और सम्राट की छत्रछाया में यहां के अधिकारी कार्य कर रहे थे। इस तरह यह एक तरफ अंग्रेज तो दूसरी तरफ राजा-महाराजा अपने में ही उलझ गए थे।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: रियासतों का योगदान

स्वतंत्रता आंदोलन के समय छत्तीसगढ़ अनेक रियासतों में बंटा हुआ था। वे गांधीजी तथा देश के अग्रणी नेताओं की अगुवाई और निर्देशों का पालन करते हुए अपना योगदान दे रहे थे। हर रियासत का किसी न किसी रूप में इस आंदोलन में सक्रियता रही है।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: सरगुजा और जशपुर रियासत

मध्य प्रांत की पूर्वोतर सीमा पर स्थित जशपुर-सरगुजा रियासतों में ईसाई मिश्नरियां इस समय अत्यंत संगठित और सक्रिय थी। इनका संबंध बिहार स्थित रांची मुख्यालय से था। उनकी योजना थी कि बिहार के रांची क्षेत्र, मध्य प्रांत के जशपुर-सरगुजा क्षेत्र तथा उड़ीसा के कुछ भाग को मिलाकर ईसाइ बहुल स्वतंत्र झारखंड राज्य की स्थापना की जाए। इस बीच आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस से संबद्ध जयपाल सिंग को नियुक्त किया गया। इनके प्रयासों से बिहार के कुछ प्रमुख कांग्रेसी नेता और देशप्रेमी जुड़ते गए।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: कवर्धा रियासत

कवर्धा रियासत में गनपत सिंह चंद्रवंशी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन का सूत्रपात किया गया। आपने 1922 को अपनी प्रथम सभा कवर्धा रियासत के ग्राम झिरना में ली। यहां पोड़ी में सभा के दौरान आपको गिरफ्तार कर कवर्धा लाया गया, परंतु उग्र समर्थकों की भीड़ देखकर उन्हें छोड़ दिया गया। मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने के बाद गनपतजी कभी हताश नहीं हुए। इसके साथ ही कवर्धा रियासत की सीमा के पास ग्राम चेपानमेटा में जाकर बस गए और वहां अपना आंदोलन जारी रखा। यहां टेकसिंह (नेवारी), बृजभूषण श्रीवास्तव, चुन्नीभाई देसाई, श्रीमती तारादेवी द्विेदी के साथ आंदोलन को गति प्रदान करते रहे।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: खैरागढ़ रियासत

1938 को खैरागढ़ में भारत की स्वंतत्रता में योगदान देने के उद्देश्य से सेवादल का गठन किया गया, जिसमें वाजिद अली, सुखराम जी तथा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी प्रमुख कार्यकताओं में थे। इसी समय कश्मीर में दमन के विरोध में हड़ताल करने वाले छात्रों में सुरेन्द्रलाल दहनगुरिया और अमीरचंद जैन को सजा हुई। इसके बाद कपूर अग्रवाल, मानिकलाल गुप्ता और गुलाबचंद डाकलिया भी नेतृत्व संभालने लगे। इसके बावजूद खैरागढ़ नरेश तथा उनकी प्रजा अंग्रेजी शासन के प्रति स्वामी भक्त बनी रही।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: छुईखदान रियासत

छुईखदान रियासत में भी उत्तरदायी सरकार की स्थापना तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा का आंदोलन मुखरित हुआ था। 1919 में इस रियासत में राष्ट्रीय जागरण शुरू हुआ, जिसमें सियाराम वर्मा, गोवर्धन राम वर्मा, नंदलाल पोद्दार, झुमुकराम बरई और सुखराम पोददार प्रमुख थे। यहां 1938 में आंदोलन के नेतृत्व के उग्र रूप को देखते हुए 300 लोगों को जेल में डाल दिया गया। ऐसी परिस्थितियों में सत्याग्रहियों का आंदोलन छुईखदान रियासत में अनवरत रूप से तब तक चलता रहा जब तक कि स्वयं महात्मा गांधी ने आंदोलन रद्द करने की सलाह न दी।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: राजनांदगांव रियासत

छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव प्रारंभ से ही जन आंदोलन का केन्द्र रहा है। राष्ट्रीय आंदोलन का असर यहां भी जोरशोर से देखने को मिला। विद्यार्थियों ने पूरे उत्साह के साथ आंदोलन में भाग लिया। कई स्थानों पर अंग्रेजों के खिलाफ पोस्टर चिपकाए गए। सैकड़ों वयोवृद्ध भी जेल गए। नागरिकों ने जुलूस निकालकर जनजागृति फैलाई तथा देश के लिए शरीर में अंतिम खून की बूंद तक लड़ने का अटल निश्चय किया। 1920 में असहयोग आंदोलन के साथ ही देशव्यापी हड़ताल होने पर राजनांदगांव में ठाकुर प्यारे लाल सिंह, डा बल्देव मिश्र, ठाकुर पन्नालाल सिंह व बंशीलाल के सहयोग से राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना हुई। 1946 में ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नेतृत्व में कौसिल आफ एक्शन आफ छत्तीसगढ़ की स्थापना की गई थी। इस संस्था के अध्यक्ष के रूप में ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने छत्तीसगढ़ के समस्त रियासती राज्यों को बैठाकर जनमानस के लिए प्रजातांत्रिक शासन की मांग के लिए प्रेरित किया। इसके परिणामस्वरूप विभिन्न रियासतों में स्टेट कांग्रेस की स्थापना की गई। 1909 में सस्स्वती पुस्तकालय की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य जनजागरण था।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: बस्तर रियासत

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की ध्वनि तथा उसके कारण उत्पन्न संघर्षो से बस्तर भी प्रभावित रहा। सन 1921 में आंदोलन आरंभ होने पर बस्तर के पढ़े लिखे लोगों ने सरकारी नौकरियों में होने पर भी एकांत स्थानों में जाकर कांग्रेस का झंडा गाड़ा और वंदे मातरम गीत गाए। इन्हें लगातार प्रताडि़त किया जाता रहा, ऐसे व्यक्तियों में मुन्ना लाल तिवारी, पूरन सिंह और कृष्ण दुबे थे।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: अन्य रियासतों में

रायपुर में पं. माधवराव सप्रे, मूलचंद बागड़ी और लक्ष्मण राव उद्गीर के प्रयत्नों से होमरूल लीग की स्थापना हुई। 1918 में रतनपुर, दुर्ग, धमतरी, मुंगेली, पाटन, राजिम, बिलासपुर, भाटापारा, बलौदाबाजार के अलावा अनेक छोटे-बड़े स्थानों पर सभा-सम्मेलनों के माध्यम से लोग अपनी सहभागिता देने में लगे रहे। प्राय: हर रियासत में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने में कोई कमी नहीं की।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: रियासतों का संविलियन

भारत में स्वतंत्रता आंदोलन की तीव्रता के कारण अंग्रेजों को यह आभास हो गया था कि अब उनका यहां पर शासन करना कठिन है। सन 1947 में भारतीय स्वतंत्रता विधेयक प्रस्तुत करते हुए ब्रिटिश संसद ने स्पष्ट कर दिया था, कि भारत को स्वतंत्रता देने के साथ भारतीय स्वतंत्र हो जाएंगे। इस दौरान समय की गति को पहचानने वाले नरेशों ने बहुत पहले ही यह समझ लिया था कि रियासतों का अस्तित्व अब अधिक दिनों तक नहीं रह सकता।

इस दौरान सरदार वल्लभ भाई पटेल रायपुर आए थे तो उन्होंने देशी नरेशों को व्यवहारिकता और वास्तविकता के मार्ग का अनुसरण करने का परामर्श दिया था। सरदार पटेल ने अपने वक्तव्य में कहा था-मैंने अपनी चर्चा के समय इस बात की सावधानी बरती और जोर दिया कि जो हल हमने सुझाया है वह उन कठिन समस्याओं के लिए हैं जो राजाओं और हमारे सामने हैं यह उनके ऊपर है कि वे स्वेच्छा से उसे स्वीकार करें या अस्वीकार कर दें। सरदार पटेल ने छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के नरेशों के संदर्भ में जब कटक की यात्रा की थी तब ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने देशी रियासतों की समस्या के संदर्भ में पत्र सरदार पटेल को लिखा, जिसके अनुसार-ऐसा कहा जा रहा है कि आप उड़ीसा तथा छत्तीसगढ़ राज्यों के संबध में कटक जा रहे हैं आप इस बात पर विचार करेंगे कि राज्य अपना संघ बनाएंगे या फिर भाषा के आधार पर उड़ीसा और सीपी प्रांत में मिल जाएंगे।

गणतंत्र दिवस पर निबंध: छत्तीसगढ़ राजतंत्र और सामंतशाही

इस तरह छत्तीसगढ़ राजतंत्र और सामंतशाही का गढ़ रहा है। यहां अंग्रेज कमिश्नरों का राज्यों से पारस्परिक संबंध बहुत कुछ भारत सरकार की नीति के अनुरूप रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद मध्य प्रांत के बस्तर रियासत को हैदराबाद रियासत में विलीन करने के लिए अंग्रेज अधिकारियों और नवाब के सम्मिलित षड़यंत्र को प्रभावहीन बनाना चुनौती बनकर सामने आया। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की सहायता से इस समस्या का हल किया गया। अंत में 1857 की क्रांति के समय बेहतर नेतृत्व से अंग्रेजों के दमनकारी नीतियों और शासन को यहां के लोगों की मदद से कुचला गया। परिणामत: ईस्ट इंडिया कंपनी का अंत हो गया और हिन्दुस्तान का शासन पूर्ण रूप से पार्लियामेंट के हाथों में आ गया।

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