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इन्दिरा गांधी के इस फैसले से बदल गई थी दो भाइयों की जिन्दगी, इमरजेंसी के दौरान सही थी यातनाएं

25-26 जून के दरमियान आधी रात काे आपातकाल की घोषणा कर दी गई। 25 जून 1975 की रात से लेकर 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था।

इन्दिरा गांधी के इस फैसले से बदल गई थी दो भाइयों की जिन्दगी, इमरजेंसी के दौरान सही थी यातनाएं
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25-26 जून के दरमियान आधी रात काे आपातकाल की घोषणा कर दी गई। 25 जून 1975 की रात से लेकर 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था।

तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था।

आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया।

इस दौरान विपक्ष, पत्रकार वो हर कोई जो इस आपातकाल का विरोध करते पाया जाता उसे जेल जाना पड़ाा। यह घटना पूरे भारत में हुई थी। इस दौरान छत्तीसगढ़ से भी लोग जेल गए। जिन्होंने अपने अनुभव आपातकाल की 43 वीं वर्षगांठ पर साझा किए।

एमजी रोड में किराए की दुकान में छापते थे साहित्य

आपातकाल के विरोध में हम साप्ताहिक पत्र व साहित्य बनाकर बांटने का कार्य करते रहे हैं। जिसके चलते 21 महीने की आपातकाल अवधि में 19 महीने जेल की यात्नाएं झेली हैं। इस आपातकाल में घर से तीनों भाई जेल में रहे। उस समय मेरी उम्र महज 18 साल की रही थी।

एमजी रोड में एक मकान किराए पर लेकर सायक्लोस्टाइल मशीन से दिन में आपातकाल विरोधी साहित्य छापते। रात में घर-घर जाकर उसे बांटते। इसी कालखंड में जब घर से बड़े भैया पत्रकार जगदीश उपासने व घर में भोजन के लिए आए जनसंघ के संगठन मंत्री केशव दवे जो भूमिगत थे, दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया।

फिर मैंने अपने कुछ साथियों के साथ आपातकाल विरोधी नारों के साथ सत्याग्रह करके अपनी गिरफ्तारी दी थी। हम सभी भाई जेल में थे। घर परिवार वाले सभी अस्त-व्यस्त हो गए थे। 21 मार्च को आपातकाल हटा और लोकसभा चुनाव हुआ। इसके बाद हम जेल से छूटे।

मैट्रीक की परीक्षा जेल से पूरी की

जब देश में आपातकाल की घोषणा हुई, चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। इसके विरोध में खड़े होने के लिए मेरा मन हुआ। सत्याग्रह करते हुए मैंने अपनी गिरफ्तारी दी थी। उस वक्त मेरी उम्र 15 साल 7 महीने थी।

25 दिसंबर 1975 को मेरी गिरफ्तारी हुई। जेल में लगभग मैंने 6 महीने गुजारे। प्रहरी कई बार मार देते, गालियां भी देते। कई बार तो मेरे साथ बिना किसी बात के दुर्व्यवहार हुआ, जिसका सभी कैदी साथियों ने जेल में ही जमकर विरोध किया। इन सबके बीच अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। मैंने अपनी मैट्रीक की परीक्षा भी जेल से पूरी की।

जोश में लोग देते रहे गिरफ्तारी, जगह हो गई थी कम

विश्रामपुर जिला सुरजपुर के कुलवंत सिंह कोल इंडिया में काम करते थे। उन्होंने 21 महीने के आपातकाल के दौरान 20 माह 13 दिन जेल में बिताए। वे अपने जेल के अनुभवों के बारे में बताते हैं, मैं हमेशा से ही जनसंघ में सक्रीय रहा हूं, जिसके चलते गिरफ्तार किया गया था।

इस दौरान मेरा एक ढाई माह का बेटा व पत्नी घर पर थी। मेरी नौकरी चली गई थी। समाज के लोग इनकी मदद को भी डरते थे कि कहीं इनसे मिलने व बात करने से हमारी गिरफ्तारी भी न हो जाए।

हालांकि वो पंजाब में अपने परिजनों के यहां रहती रहीं, लेकिन पंजाब में भी आपातकाल लगा था। उस समय में परिवारिक, आर्थिक, राजनतिक सभी प्रकार की यातनाएं एक साथ मिल गई थी। अंबिकापुर जेल में जब मैं था, तब लोग और जोश से अपनी गिरफ्तारी देते रहे। वहां जगहों की भी कमी हो गई थी।

दोनों भाई थे जेल में, इस दौरान पिताजी का हुआ देहांत

बिलासपुर निवासी अर्जुन तीर्थानी आपातकाल के अपने अनुभव को बताते हुए कहते हैं, मेरे घर से मेरे बड़े भाई व मैं दोनों जेल में बंद हो गए थे। मैं उस समय 28 साल का था और व्यवसाय करता था। जो पहले से जेल में बंद थे, उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी तो उनको मैं छोटी-छोटी आर्थिक सहायता देता था।

कमाने वाले बड़े भाई ही थे, जो अपनी चिकित्सकीय सेवा से घर चलाते रहे हैं। फिर मैं भी जेल गया, इस बात को लेकर पिताजी बहुत दुखी हो गए और हमारे जेल के दौरान ही उनका देहांत हो गया।

इस समय घर परिवार की हालत बहुत ही खराब थी, लेकिन गिरफ्तारी देने के लिए भी लोग बहुत संख्या में आते रहे हैं। मैं करीब 11 महीने 13 दिन जेल में रहा, जिसके बाद मुझे बेल मिली। बड़े भैया को तो आपातकाल खत्म होने के बाद रिहाई मिली।

घरवालों की सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थिति हो गई

शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त दिवाकर तिवारी जांजगीर जिले के अमोरा गांव से महज 17 वर्ष की उम्र में जेल गए। वे बताते हैं, शुरु से ही संघ में सक्रीय रहा हूं। जिसके कारण मुझे गिरफ्तार किया गया। इस दौरान घर परिवार की हालत बहुत ही खराब थी।

घर का एकलौता बेटा जेल में था, तो एक सामाजिक बहिस्कार जैसा हो गया था। मैंने आपातकाल के दौरान बिलासपुर जेल में लगभग 11 महीने रहा। जहां जेल की भी हालत बहुत खराब थी।

जगह बहुत कम लोग बहुत ज्यादा, प्रहरियों का अमानवीय व्यवहार रहा। यह कालखंड बहुत यात्नाओं से भरा रहा। वर्तमान में दिवाकर तिवारी रायपुर में निवासरत हैं।

दोस्तों के साथ बांटे विरोध में पर्चे, नारे लगाते हुए गिरफ्तार

बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व कर्मचारी व दुर्ग निवासी किशोर ताटीबंदवाले बताते हैं, जब वह पढ़ाई के लिए बिलासपुर में थे, तब देश में हाहाकार मचाने वाला आपातकाल लगा था। जिसके विरोध में मैंने अपने दोस्तों के साथ बहुत दिनों तक पर्चे बांटे।

फिर एक दिन कुछ दोस्तों ने मिलकर आपातकाल विरोधी नारे लगाते हुए अपनी गिरफ्तारी दी थी। इस सब के बारे में मैने अपने घर में नहीं बताया था, लेकिन पिताजी ने इसके लिए अपनी खुशी जाहिर की थी। जेल में मैंने करीब पौने पांच महीने बिताए।

इस दौरान मेरी तबियत भी खराब रही। घर में भी इसकी जानकारी नहीं दी गई थी। बाद में जब दूसरे माध्यम से उनको पता चला तो मुझे बहुत डांट पड़ी थी।

कोरे कागज में लिखते थे आपातकाल विरोधी नारे

बिलासपुर के दत्तात्रेय त्रिपुरवार आपातकाल में अपने जेल के अनुभव के बारे में बताते हैं, आपातकाल के विरोध में 19 साल की उम्र में जेल गया। आपातकाल के दौरान हम अपने दोस्तों के साथ घर में कोरे कागज लाकर आपातकाल विरोधी नारे लिखते व रात में शासकीय स्थानों पर उसे चिपकाते थे।

इस काम में कई बार पुलिस भी पीछे पड़ी, लेकिन पकड़ में नहीं आए थे। एक दिन मित्रों के साथ हमने सत्याग्रह करते हुए अपनी गिरफ्तारी दी। गिरफ्तारी के बाद तो जेल में दुर्व्यवहार हुआ।

यहां तक कोर्ट परिसर में भी कई बार पिटाई हुई है। इस दौरान करीब 5 महीने जेल में रहे। हम पर अनेक झूठी धाराएं लगाई गई थी। हम कोर्ट से केस जीते व रिहा हुए।

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