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राम मंदिर का इतिहासः जानें 1528 से अब तक क्या-क्या हुआ

राम मंदिर (Ram Temple) का विवाद सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक विवाद है जो 90 के दशक से इस देश में बढ़ गया। जब 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे को एक गुस्साई भीड़ ने जमींदोज कर दिया। ऐसा इस लिए क्योंकि विवादित स्थल पर बाबरी ढांचा था।

राम मंदिर का इतिहासः जानें 1528 से अब तक क्या-क्या हुआ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने मंगलवार को न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) को दिए अपने इंटरव्यू में कहा कि राम मंदिर (Ram Temple) का मामला सुप्रीम कोर्ट में है। इस मामले में कोर्ट के फैसले के बाद ही अध्यादेश (Ordinance) पर विचार किया जाएगा। राम मंदिर (Ram Temple) का विवाद सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक विवाद है जो 90 के दशक से इस देश में बढ़ गया। जब 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे को एक गुस्साई भीड़ ने जमींदोज कर दिया। ऐसा इस लिए क्योंकि विवादित स्थल पर बाबरी ढांचा था। जिसे मुस्लिम सुमदाय के लोग मस्जिद मानते थे। वहीं हिंदुओं का मानना था कि इसी जगह भगवान राम का जन्म हुआ था (Ram Janm Bhumi)। यहां उनका मंदिर था जिसे तोड़ कर बाबरी (Babri) को बनाया गया था। बाबरी ढांचा गिरते ही देश में दंगे भड़क गए। हजारों की संख्या में लोगों की जान गई। इस विवाद के बाद मुंबई में बम धमाके (Mumbai Bomb Blast) भी हुए। जिसने देश में हिंदू और मुस्लिमों के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस मुद्दे ने अचानक सिर उठा लिया। राम मंदिर का विवाद अंग्रेजों के समय से भी पहले चला आ रहा है। आइए जानते हैं क्या है राम मंदिर (Ram Temple) और इस विवाद की जड़।

मुगल बादशाह बाबर (Babar) ने 1527 में फतेहपुर के राजा राणा संग्राम सिंह (Rana Sangram Singh) को हराया था। राणा संग्राम सिंह को हराने के बाद उसने जनरल मीर बांकी (Meer Banki) को वह इलाका सौंप दिया था।
मीर बाकी ने 1528 में अयोध्या में बाबरी का निर्माण करवाया। सारा विवाद यहीं से शुरू हुआ था। क्योंकि हिंदुओं का मानना था कि बाबरी को राम जन्म-भूमि मंदिर को तोड़कर बनाया गया है। साथ ही बाबरी जिस जगह स्थित है वह राम मंदिर (Ram Temple) की नींव पर ही है।
मुगलों के समय में मुद्दा ज्यादा नहीं गरमाया। लेकिन जब भारत में अंग्रेजों का शासन आया तब इस विवाद ने एक बार फिर से सिर उठा लिया। 1853 में अंग्रेजों के समय में पहली बार हिंदू और मुस्लिमों में इस मुद्दे को लेकर हिंसा हुई।
1859 में अंग्रेजों ने विवादित ढांचे के चारो तरफ एक दीवार बना दी साथ ही हिंदुओं को बाहर से दर्शन की इजाजत दे दी। 1885 में महंत रघुवर दास ने इस विवाद को लेकर फैजाबाद में केस दायर किया। उन्होंने कहा कि मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद बनाया गया था इसलिए वहां मंदिर बनना चाहिए।
आजादी के बाद जब अंग्रेज चले गए तब यह मुद्दा फिर गरमाया। साल 1947 में भारत सरकार ने मुसलमानों को विवादित जगह से दूर रहने के आदेश दिया और मस्जिद के मेन गेट पर ताला जड़ दिया। जबकि हिंदू श्रद्धालुओं को एक अलग जगह से प्रवेश दिया जाता रहा।
23 दिसंबर 1949 को विवादित ढांचे के अंदर भगवान राम की मूर्ति पाई गई। इसके बाद उस जगह पर हिंदूओं ने पूजा करनी शुरू कर दी। मुस्लमों वहां नमाज पढ़ना बंद कर दिया और इस पर विरोध जताया फिर दोनों ही समुदायों ने कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया। उस समय की सरकार ने बाबरी मस्जिद को विवादित घोषित करके इस पर ताले लगवा दिये।
साल 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत में अपील दायर करके रामलला की पूजा-अर्चना की इजाजत मांगी और इसी साल महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और विवादित ढांचे में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया। 18 दिसंबर 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने विवादित ढांचे पर मालिकाना हक के लिए अदालत में मुकदमा दायर।
1984 में कुछ हिन्दुओं ने विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के नेतृत्व में भगवान राम के जन्मस्थल पर राम मंदिर का बनाने के लिए एक समिति का गठन किया। बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने किया।
1 फरवरी 1986 को जिला मजिस्ट्रेट ने हिन्दुओं को प्रार्थना करने के लिए विवादित मस्जिद के दरवाजे से ताला खोलने का आदेश दे दिया। इस आदेश के बाद एक भीड़ अचानक पहुंची और ताले को तोड़ दिया। आज तक उस ताले का पता नहीं है। मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया।
1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान को तेज किया और विवादित ढांचे के नजदीक राम मंदिर (Ram Temple) की नींव रखी गई। इसी साल राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की सरकार ने विवादित ढांचे के करीब शिलान्यास की इजाजत दे दी।

90 का दशकः जब देश बदल गया

90 का दशक आते-आते राम मंदिर का मुद्दा आस्था से जुड़ गया था। भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को अपनी राजनीति से जोड़ चुकी थी। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से एक रथयात्रा निकाली।
इस रथ यात्रा के बाद देश में सांप्रदायिक दंगे हुए। नवंबर में जब रथयात्रा बिहार में पहुंची तब लाल कृष्ण आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार थी। लेकिन 2 नवंबर 1990 को मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलवा दी जिसमें सैकड़ों कारसेवकों की जान गई।
जिसके बाद मुलायम सिंह यादव को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। लाल कृष्ण आडवाणी ने फिर से एक बार रथ यात्रा शुरू की। जब रथ यात्रा 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में पहुंची तब वहां मौजूद भीड़ ने विवादित ढांचे को गिरा दिया। जिसके बाद पूरे देश में साम्प्रदायिक दंगे होने लगे।
इसी मसले पर विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल, भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी और मध्यप्रदेश की पूर्व सीएम उमा भारती सहित 13 नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाने की मांग की गई थी।
इसी साल विवादित ढांचे की तोड़ फोड़ के जिम्मेदार स्थितियों की जाँच के लिए लिब्रहन आयोग का गठन हुआ। 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में आयोध्या विभाग शुरू किया जिसे हिंदू मुस्लमानों से बातचीत करने और आयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए बनाया गया था।
अप्रैल में आयोध्या मामले को लेकर हाई कोर्ट के लिए तीन जजों ने सुनवाई शुरू की। 2009 में 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिब्रहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया और विवादित ढांचे को तीन हिस्सों में बांटा ।
जिसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को देने को कहा। लेकिन अपराधियो पर कोइ कारवाही नही की गई और किसी भी समुदाय ने फैसला मानने से इंकार कर दिया। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।
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