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राफेल पर भाजप और कांग्रेस के बीच 36 का आंकड़ा, गलत बयानबाजी से किसका होगा भला

छत्तीस राफेल जंगी जहाजों की खरीद को लेकर पिछले कुछ महीनों के भीतर देश विदेश में विरोधी दलों, खासकर राहुल गांधी ने जिस प्रकार का वातावरण निर्मित करने का प्रयास किया है, उसे किसी भी दृष्टि से देशहित में नहीं माना जा सकता।

राफेल पर भाजप और कांग्रेस के बीच 36 का आंकड़ा, गलत बयानबाजी से किसका होगा भला

छत्तीस राफेल जंगी जहाजों की खरीद को लेकर पिछले कुछ महीनों के भीतर देश विदेश में विरोधी दलों, खासकर राहुल गांधी ने जिस प्रकार का वातावरण निर्मित करने का प्रयास किया है, उसे किसी भी दृष्टि से देशहित में नहीं माना जा सकता। यह सही है कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के अनेक गंभीर आरोप लगे हैं, जिनमें से कुछ मामलों में नौकरशाहों और तत्कालीन मंत्रियों तक को जेल की हवा खानी पड़ी थी।

पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों पर भी रक्षा सौदों में दलाली और कदाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। बोफोर्स तोप मामले में तो राजीव गांधी और क्वात्रोचि तक का नाम आया था, जिसकी बरसों-बरस जांच चलती रही जिसकी चाल सरकारें बदलने के साथ-साथ मंद और तेजी होती रही।

वह जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंची परंतु जहां तक मौजूदा नरेन्द्र मोदी सरकार का प्रश्न है, उसने ऐसे बहुत सारे रक्षा सौदों को सिरे चढ़ाया है, जो बरसों से लटके पड़े थे और इसी आपराधिक देरी के चलते देश की सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरे पैदा हो रहे थे।

लंबे समय से आधुनिक जंगी जहाजों की मांग वायु सेना की तरफ से की जाती रही है क्योंकि सुखोई को छोड़ दें तो कोई विमान पिछले कई वर्षों में खरीदा नहीं जा सका है।

राफेल विमान की खरीद को लेकर भी दस-बारह साल से चर्चाएं जारी थी परंतु जिस स्वरूप में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार इसे सिरे चढ़ाना चाहती थी, वह हो नहीं पा रहा था।

इसे लेकर भी कई तरह की खबरें आ रही हैं, जिनकी पुष्टि या खंडन किसी भी पक्ष के द्वारा नहीं हुआ है। मनमोहन सरकार 126 राफेल विमानों का करार फ्रांस की कंपनी से करना चाहती थी,

परंतु वह सिरे नहीं चढ़ सका क्योंकि एचएएल और दसाल्ट के बीच कुछ बिंदुओं पर सहमति नहीं बनी। पहले प्रस्ताव था कि 18 तैयार विमान दसाल्ट भारत को देगी और 108 विमान भारत में बनेंगे।

2014 में मोदी प्रधानमंत्री बने, तब उनके सामने देश की रक्षा-सुरक्षा को लेकर गंभीर मसले थे। 2015 में उनकी सरकार ने पुराने प्रस्ताव को रद्द करते हुए 36 तैयार राफेल तुरंत खरीदने को मंजूरी दी,

ताकि किसी भी तरह की विदेशी चुनौती से निपटने के लिए वायुसेना की तैयारी को पुख्ता और चाक चौबंद किया जा सके। दसाल्ट के सीईओ से लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली तक इन अफवाहों को निराधार बता चुके हैं कि पहले के मुकाबले राफेल महंगे दर पर खरीदे जा रहे हैं,

परंतु कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में अपशब्दों का प्रयोग करते हुए उन्हें चोर तक की संज्ञा देते घूम रहे हैं, जबकि राफेल की कीमतों को लेकर उनके पास कोई अधिकृत जानकारी तक नहीं है।

राफेल सौदे में बड़े घोटाले की खबरें वह ऐसे फैला रहे हैं, जैसे यह बात साबित हो गई हो जबकि दसाल्ट कंपनी तक कह चुकी है कि पहले के प्रस्ताव के सापेक्ष इस सौदे में वह नौ प्रतिशत कम दर पर राफेल भारत को दे रहे हैं।

सवाल यह उठता है कि राहुल गांधी ऐसा प्रचार प्रधानमंत्री के खिलाफ क्यों कर रहे हैं। इसका जवाब यही है कि वह 2019 के आम चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पर कोई न कोई गंभीर किस्म का आरोप चस्पा करने की जल्दी में दिख रहे हैं,

ताकि इसका चुनाव में फायदा उठाया जा सके। यह मसला सुप्रीम कोर्ट तक भी ले जाया गया है और जो वकील इसकी सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित की गई तीन सदस्यीय बैंच के सामने बहस में शामिल हुए हैं,

वो वही हैं जो मोदी सरकार के खिलाफ आए दिन किसी न किसी मुद्दे को लेकर प्रेस कांफ्रैंस भी करते रहते हैं और पहले भी कई याचिकाएं दायर कर चुके हैं। लंबी बहस और सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है,

जो अगले कुछ दिनों में सामने आएगा परंतु सुप्रीम कोर्ट ने भी राफेल की कीमत को लेकर साफ कर दिया है कि इसे तब तक सार्वजनिक नहीं किया जा सकता,

जब तक कि वह खुद इसका खुलासा नहीं करे। अब सवाल यह उठता है कि राजनीतिक फायदे के लिए जो लोग लगातार गलत-सलत कीमतें बताते घूम रहे हैं, उनके खिलाफ कोर्ट क्या करेगी।

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