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नहीं रहे जनता के कवि नवारुण भट्टाचार्य, साहित्‍य जगत में रहा है महत्‍वपूर्ण योगदान

साहित्‍य जगत नवारुण भट्टाचार्य को विद्रोही और जनता के कवि के रूप में भी जानता है।

नहीं रहे जनता के कवि नवारुण भट्टाचार्य, साहित्‍य जगत में रहा है महत्‍वपूर्ण योगदान

कोलकाता. आम जनता को अपने साहित्‍य के केंद्र में रखकर उनकी आवाज उठाने वाले साहित्यकार नवारुण भट्टाचार्य का गुरुवार को निधन हो गया। वह 66 वर्ष के थे। गुरुवार को दिन के लगभग साढ़े चार बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। भट्टाचार्य काफी दिनों से कैंसर से ग्रस्त थे। स्थिति बिगड़ने पर उन्हें कुछ दिन पहले ठाकुरपुकुर कैंसर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। गुरुवार को वहां उनका देहांत हो गया। उनका जन्म बहरमपुर में हुआ था। वह अभिनेता बिजन भट्टाचार्य एवं मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी के इकलौते बेटे थे।

नवारुण भट्टाचार्य ने यूं तो साहित्य के क्षेत्र में काफी काम किया है, पर उन्हें उनके नॉवेल हर्बर्ट के लिए जाना जाता है। जिस पर उन्हें साहित्य एकेडमी अवॉर्ड मिला था। उनके इस नॉवेल पर इसी नाम से 2005 में सुमन मुखोपाध्याय ने एक फिल्म भी बनायी थी। भट्टाचार्य की मौत पर बांग्ला सहित देश के साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है। साहित्‍याकारों ने कहा कि नवारुण भट्टाचार्य जनका के कवि थे। उन्‍होंने ताउम्र आम जन की लड़ाई लड़ी। हिंदुस्‍तान की जनता और साहित्‍य जगत उनके योगदान को कभी नहीं भूलेगा।

गौरैया- नवारुण भट्टाचार्य की कविता

यूं तो किसी तात्कालिक घटना पर कविता लिखना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। इस चुनौती को बांग्ला के विशिष्ट कवि नवारुण भट्टाचार्य ने स्वीकार कर हाल में शीर्ष माओवादी नेता किशन जी की मौत पर यह कविता लिखी थी। गौरैया शीर्षक से। माओवादी नेता एम. कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी की मौत पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आईं, नवारुण की काव्यात्मक प्रतिक्रियाकविता के रूप में आई।

नीचे की स्लाइड्स में पढिए, नवारुण की प्रसिद्ध कविता 'गौरैया'-
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