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पुणे हिंसा: राज्यसभा में गूंजा कोरेगांव-भीमा का मुद्दा, शरद पवार ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई पर राज्यसभा में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने महाराष्ट्र हिंसा के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि पुणे हिंसा के पीछे साम्प्रदयिक ताकतें काम कर रही हैं।

पुणे हिंसा: राज्यसभा में गूंजा कोरेगांव-भीमा का मुद्दा, शरद पवार ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना

महाराष्ट्र के कोरेगांव में चार दिन से जारी जातीय हिंसा के बाद आज महाराष्ट्र पुलिस ने दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और छात्र नेता उमर खालिद पर सेक्शन 153(A), 505, 117 के तहत FIR दर्ज कर 300 लोगों को हिरासत में ले लिया है।

वहीं इस बीच राज्यसभा में भी कोरेगांव-भीमा हिंसा पर चर्चा हुई। कांग्रेस सांसद रजनी पाटिल ने ये मुद्दा उठाते हुए कहा कि पुणे हिंसा रोकी जा सकती थी, लेकिन महाराष्ट्र सरकार और पुलिस प्रशासन की ओर से लापरवाही बरती गई।

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पुलिस को मालूम था कि दलित अपना शौर्य दिवस मनाने जा रहे हैं, तो पहले से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए गए? इसके बाद शरद पवार ने पुणे हिंसा के पीछे सांप्रदायिक ताकतें जिम्मेदार ठहराया।

वहीं गृह मंत्रालय को महाराष्ट्र में जातीय हिंसा के मद्देनजर मौजूदा स्थिति पर राज्य सरकार की ओर से तथ्यात्मक रिपोर्ट मिल गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय और महाराष्ट्र सरकार स्थिति को लेकर लगातार एक-दूसरे के संपर्क में हैं।

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मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने आज बताया कि मौजूदा स्थिति पर राज्य सरकार की ओर से एक तथ्यात्मक रिपोर्ट मिली है। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि केंद्र ने राज्य सरकार को आश्वस्त किया है कि हिंसा और प्रदर्शनों से निपटने तथा राज्य में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए हरसंभव मदद दी जाएगी।

कल प्रदर्शनकारियों ने बसों पर हमला किया, उपनगरीय ट्रेनों को रोक दिया और मुंबई में विभिन्न हिस्सों पर सड़कों को जाम कर दिया। एक जनवरी को हुई हिंसा के विरोध में दलित समूहों द्वारा आहूत किए गए बंद की वजह से राज्य में जगह-जगह जनजीवन प्रभावित हुआ।

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पुणे में एक जनवरी को उस समय हिंसा भड़क उठी थी जब दलित समूह भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं सालगिरह मना रहा था जिसमें ब्रिटिश सेना ने महाराष्ट्र के पेशवाओं को हराया था।

दलित नेता ब्रिटिशों की जीत का जश्न इसलिए मनाते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में महार समुदाय के सैनिक थे। पेशवा ब्राह्मण थे और इस जीत को दलितों की विजय का प्रतीक माना जाता है।

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