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विश्लेषण / घर को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाना जरूरी: यूएन रिपोर्ट

महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति विश्व के सभी देशों में कमोबेश चिंतनीय है। फिनलैंड, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ गिने-चुने देश को छोड़ कर विश्व के अधिकांश देशों में महिलाएं पूर्ण सुरक्षित नहीं हैं।

विश्लेषण / घर को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाना जरूरी: यूएन रिपोर्ट
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महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति विश्व के सभी देशों में कमोबेश चिंतनीय है। फिनलैंड, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ गिने-चुने देश को छोड़ कर विश्व के अधिकांश देशों में महिलाएं पूर्ण सुरक्षित नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि दुनिया भर में महिलाएं असुरक्षित हैं और सबसे अधिक अपने घरों में उन्हें जान का अधिक खतरा रहता है।

यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक अक्सर किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक जगह उनका अपना घर है। महिलाओं की हत्या की वजहों की पड़ताल करने वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर देखा जा रहा है कि अधिकांश मामले में महिला के सबसे करीबी परिवार वाले या उसका पार्टनर ही उसकी हत्या कर देते हैं।

मौत के घाट उतारी गई 87 हजार महिलाओं में से करीब 50 हजार यानी 58 फीसदी महिलाओं की या तो उनके परिवार के सदस्य या उनके पार्टनर ने हत्या की। हर दिन 137 महिलाओं की हत्या उनके परिवार के सदस्य कर देते हैं।

इस रिपोर्ट के मुताबिक हर घंटे अमूमन छह महिलाओं की हत्या उनके अपने ही कर देते हैं। इन हत्यों के पीछे वजहें- घरेलू हिंसा, ऑनर किलिंग, दहेज, ड्रग्स-मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति, डायन, चरित्र पर शक, एलजीबीटीक्यू समुदाय से जुड़ी यौन संबंध की प्राथमिकता आदि हैं।

यूं तो यह रिपोर्ट महिलाओं के खिलाफ हिंसा खत्म करने के लिए 25 नवंबर को मनाए जाने वाले दिवस के मौके पर जारी की गई है, लेकिन यह भारत के लिए आंख खोलने वाली है।

इसी साल जून में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन ने अपने सर्वेक्षण के आधार पर कहा था कि भारत महिलाओं के लिए विश्व में सबसे अधिक असुरक्षित है। हालांकि यह भारत सर्वेक्षण पूर्णतया सही नहीं है, बीबीसी समेत अन्य रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के किसी भी देश में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं,

लेकिन ब्राजील, मैक्सिको, अन्य लातिन अमेरिकी देश, अधिकांश इस्लामिक मुल्क, अधिकांश अफ्रीकी देश में महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति भारत से भी दयनीय है। इसके बावजूद यूएन की ताजा रिपोर्ट के बाद भारत में सरकार व पुलिस प्रशासन के सामने महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनौती है।

चिंता की बात है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए तमाम कानूनों के बावजूद हिंसा में कमी नहीं आ पा रही है। हाल के दशक में महिलाओं ने हर क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़े हैं, इसके बावजूद समाज में, परिवार में महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे वाली सोच में कमी नहीं आ पा रही है।

परिवार से लेकर कार्यस्थल तक शारीरिक व मानसिक हिंसा का सबसे अधिक शिकार महिलाओं को होना पड़ता है। महिलाओं को कमजोर आंकने व उन्हें आर्थिक बोझ मानने की सोच के चलते अपने परिवार में ही अक्सर उनको हिंसा का शिकार होना पड़ता है।

जरूरत सोच में बदलाव लाने की है, महिलाओं के प्रति संवेदनशील होने की है। अगर घर-परिवार ही असुरक्षित रहेगा, तो महिलाएं कहां सुरक्षित महसूस करेंगी।

परिवार की मर्यादा का भार अकेले महिला पर डालना प्रगतिशील समाज का द्योतक नहीं है। ऑनर किलिंग, दहेज व घरेलू हिंसा के चलते महिलाओं की हत्या समाज के लिए दहलाने वाली घटना है।

सरकार, कानून व पुलिस प्रशासन की संवेदनशीलता के साथ-साथ समाज की मुस्तैदी के दम पर ही महिलाओं के लिए घर-परिवार व कार्यस्थल समेत सार्वजनिक जगहों को सुरक्षित बनाया जा सकेगा। घर में महिलाएं सुरक्षित रहेंगी, तभी विकास में अपना योगदान दे सकेंगी, तभी ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता' का भाव चरितार्थ होगा।

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