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बिहार: नए शराबबंदी कानून से दहशत में लोग

जहरीली शराब से हुई मौतों को सामान्य मौत बताने के लिये पूरे परिवार की गिरफ्तारी का दिखाया गया भय

बिहार: नए शराबबंदी कानून से दहशत में लोग
पटना. बिहार में नए शराबबंदी बिल पर राज्यपाल का हस्ताक्षर नहीं हुआ है, इसलिए यह कानून अभी लागू नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने लगातार कहा है कि इस कानून का गलत इस्तेमाल नहीं होगा। लेकिन 16 अगस्त को गोपालगंज में अवैध शराब से मारे गए लोगों के परिजनों का आरोप है कि उन्हें नए कानून के नाम पर डराया जा रहा है। पड़ोसियों की मदद और समय के साथ उनका डर कम हो रहा है। पेशे से दर्जी रहे मृतक रहमान मियां के पांच बच्चे हैं। उनकी पत्नी कहती हैं कि अब उनके बच्चों की पढ़ाई का सवाल अधर में है।

अवैध शराब से मारे गए लोगों की सूची में उनके पति का नाम दर्ज नहीं है। बिहार सरकार ने इस हादसे में मारे गए लोगों के परिवार वालों को 4 लाख रुपए का मुआवजा देने का ऐलान किया था, लेकिन यह मुआवजा रहमान मियां के परिवार को नहीं मिलेगा। रहमान के भाई अली बताते हैं, रहमान को गोरखपुर के हॉस्पिटल में रेफर कर दिया गया, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई। उसके पहले कुछ देर के लिए हम गोपालगंज जिला अस्पताल में थे। मैंने देखा कि ठीक उसी हालत में और 3-4 लोगों को अस्पताल लाया गया था। उस दौरान एक आदमी ने तो मेरे सामने ही दम तोड़ दिया। अली कहते हैं, मेरा मानना है कि इस हादसे में ऐसे कई और लोगों की भी मौत हुई होगी, लेकिन हमें नए कानून के नाम पर डराकर कहा जा रहा है कि वो मौत अवैध शराब से नहीं हुई है।

गोपलगंज के डीएम ने बताया कि अवैध शराब से 16 लोगों की मौत हुई है। जबकि कुछ अखबारों के मुताबिक यह संख्या ज्यादा है। फिलहाल हर कोई इस आंकड़े का अनुमान ही लगा रहा है, क्योंकि कई परिवार अब भी कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं। गोपालगंज के इस्लामिया मोहल्ले में जहीरूद्दीन के परिजनों का कहना है कि उनकी मौत मिर्गी की वजह से हुई। उनका दावा है कि जहीरूद्दीन ने कभी शराब नहीं पी। उनकी प}ी का कहना है, पुलिस यहां क्यों आएगी, जहीरूद्दीन को तो शुरू से मिर्गी की बीमारी थी। जब पूछा गया कि डॉक्टर के पास गए थे तो जवाब आया कि डॉक्टर के पास जाने से पहले ही जहीरुद्दीन मर गए। लेकिन ज्यादातर पड़ोसी कहते हैं कि उन्हें तो पता ही नहीं कि जहिरूद्दीन की मौत कैसे हुई है।

कुछ लोग दबी जबान में बताते हैं, जाहिर तौर पर उनकी मौत शराब पीने से हुई है। उन्हें मिर्गी की बीमारी थी? कभी नहीं..। गोपालगंज में बत्तीस महतो, झंझट मांझी, और सुबराती मियां के घरों में भी यही आलम था। सबकी एक ही कहानी। घरवालों का कहना कि मरने के पहले मरीज ने सर दर्द, अंधापन, आंखों में खून आने की बात कही और अस्पताल और वहां से गोरखपुर या कुशीनगर भेजे गए और फिर लाश के साथ वापस गोपालगंज लौटे। परिजनों का आरोप है कि पोर्टमॉर्टम के लिए कहने या किसी को शराब की वजह से मौत की बात बताने पर, प्रशासन ने उन्हें जेल में डाल देने की धमकी दी। सुबराती मियां की प}ी दिहाड़ी मजदूर हैं। वो बताती हैं, हम लाश के साथ 1 बजे रात को घर पहुंचे और दो बजे रात पुलिस की दो गाड़ियां आईं।

उन्होंने हमसे कहा कि एक घंटे के अंदर इन्हें दफना लें वर्ना हमें जेल में डाल दिया जाएगा और हमारे घर को जब्त कर लिया जाएगा। एक अखबार के मुताबिक एक केस में तो प्रशासन ने लाश को बाइक की पिछली सीट पर बैठा दिया, ताकि मीडिया को लगे कि वो जीवित है। जब मीडिया को पता चला कि उन्हें बेवकूफ बनाया गया और प्रशासन की पोल खुल गई तो उन्होंने पोस्टमार्टम के लिए लाश को फिर से मंगवा लिया। बिहार सरकार का कहना है कि मौत का कारण केवल पोस्टमार्टम से पता लगेगा। दूसरी तरफ सरकार पर पोस्टमार्टम ना होने देने का आरोप लग रहा है। यह साफ है कि नीतीश कुमार की सरकार के लिए 16 के बदले 60 मौत की खबर देखना बहुत मुश्किल था। इससे उनके शराबबंदी अभियान की और ज्यादा आलोचना होती। एक दिन तो नीतीश ने यहां तक कह दिया था कि ये मौतें अवैध शराब की वजह से नहीं हुई हैं। ज्यादातर परिजनों का कहना है कि मारे गए लोग सरकारी दुकानों से खरीदकर देशी शराब पीते थे, लेकिन शराबबंदी के बाद वो इसे खरीदने खजुरबानी गांव जाते हैं।

खजुरबानी गांव में पासी समुदाय के नौ घर हैं जो ताड़ी बनाते और बेचते थे। शराबबंदी के बाद उन्होंने यह काम बंद कर दिया। पड़ोसियों का कहना है कि वो कई दशकों से यह काम कर रहे थे पर कभी किसी की मौत नहीं हुई। लेकिन शराबबंदी के बाद शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाली स्पिरिट मिलना मुश्किल हो गया। इसलिए स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि इसके लिए हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल होने लगा है, जिससे शराब जहरीली हो गई है।
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