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राष्ट्रीय सुरक्षा : जानें क्या कहती है आईटी कानून की ''धारा 69''

राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भी विपक्ष विवाद करेगा, इसकी उम्मीद कतई नहीं की जा सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा सबके लिए अहम मुद्दा है

राष्ट्रीय सुरक्षा : जानें क्या कहती है आईटी कानून की

राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भी विपक्ष विवाद करेगा, इसकी उम्मीद कतई नहीं की जा सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा सबके लिए अहम मुद्दा है। डाटा पर निगरानी के लिए सरकार के दस एजेंसियों को अधिकार देने के बाद से कांग्रेस समेत तमाम विपक्ष जिस प्रकार से सरकार पर हमलवार हुए हैं, वह चिंतनीय है। अंध विरोध की धुन में कांग्रेस ने तो यह भी नहीं देखा कि राष्ट्रीय स्तर पर डेटा की निगरानी का फैसला 2009 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार का ही था। यूपीए सरकार ने ही आईटी एक्ट 2000 की धारा 69 का प्रावधान किया था। राजग सरकार ने केवल आईटी कानून की धारा 69 के तहत सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को किसी कंप्यूटर सिस्टम में तैयार, पारेषित, प्राप्त या भंडारित किसी भी प्रकार की सूचना के इंटरसेप्शन, निगरानी और डीक्रिप्शन का अधिकार दिया है।

इसमें यह भी कहा गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और एकता को लेकर किसी चिंताजनक स्थिति में ही सक्षम एजेंसियां यह जांच कर सकती हैं। सरकार का आदेश आम निगरानी के लिए नहीं है, इससे आम लोगों के जीवन पर कोई असर नहीं होगा। कांग्रेस को शायद याद नहीं कि नीरा राडिया फोन टैपिंग विवाद यूपीए सरकार के वक्त ही उठा था।

वित्त मंत्री रहते हुए प्रणब मुखर्जी के फोन टैप कराने का विवाद भी उठा था। प्रणब मामले की उंगली भी तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम पर उठी थी। सच में देखा जाय तो डेटा पर निगरानी का आइडिया तो कांग्रेस सरकार का ही था, अब जब राजग सरकार ने उसी फैसले को आगे बढ़ाने का काम कर रही है तो आखिर कांग्रेस हायतौबा क्यों मचा रही है? खैर, मुद्दे की बात तो यह है कि डेटा की निगरानी में राजनीति नहीं होनी चाहिए।

किसी भी दल की सरकार के वक्त डेटा को सिक्योर व सेफ बनाने के लिए किए गए फैसले का स्वागत होना चाहिए। डाटा को लेकर अक्सर संविधान के निजता के अधिकार का हवाला दिया जाता है, लेकिन इस अधिकार का मतलब यह तो नहीं कि इसकी आड़ में किसी को राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ का हक है? यही बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर भी है। लोग इस अधिकार के नाम पर अनुशासन की हद लांघते हैं।

हर अधिकार में अनुशासन व राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य बांध समाहित होते हैं। यह तो सभी को मालूम है कि भारत पर पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई व इसलामिक स्टेट समेत अनेक देशों व कुख्यात गुटों की नजर है। आईएसआई व आईएस द्वारा भारत में कंप्यूटर के जरिये आतंकी एजेंट भर्ती करने की खबरें आती रहती हैं। इसके अलावा अमेरिका, रूस, चीन में बैठे हैंकरों की बुरी नजर भी भारत पर रहती है।

क्या कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष भूल गया है कि 2018 के छह माह में ही दुनिया में सबसे अधिक साइबर हमले भारत पर हुए। एफ-सिक्योर की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान केवल पांच देश- रूस, अमेरिका, चीन, नीदरलैंड व जर्मनी ने भारत पर 4.36 लाख साइबर हमले किए। ये हमले सबसे अधिक वित्तीय क्षेत्र व रक्षा क्षेत्र के डाटा पर हुए।

पीडब्ल्यूसी और एसोचैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक साइबर हमलों और फ्रॉड की वजह से बड़े बैंकों को सालाना 20 अरब डॉलर यानी 1.50 लाख करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है। दुनिया के फाइनेंस सेक्टर में बीते पांच साल में साइबर हमले 3 गुना तक बढ़े हैं। भारतीय बैंक भी साइबर अटैक के रडार पर हैं। इस वक्त भारत जिस तेजी से डिजिटल युग में पैठ बढ़ा रहा है, उसमें डेटा की सुरक्षा जरूरी है।

राष्ट्रीय व वित्तीय सुरक्षा से संबंधित डेटा की सेफ्टी-सिक्योरिटी के लिए फैसलों का स्वागत होना चाहिए। विपक्ष को सरकार के हर फैसले को शक की दृष्टि से देखने व उस सवाल उठाने की राजनीतिक प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए। वह अगर सरकार को सुझाव देता तो ज्यादा अच्छा होता। आखिर सबके सहयोग से ही हमारी सुरक्षा पुख्ता हो पाएगी।

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