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Exclusive Interview : NCPCR के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने बाल मजदूरी को लेकर खोले कई राज

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेसहारा बच्चों की देखभाल करने के लिए प्रसिद्ध मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी (एमओसी) में हालिया सामने आए बाल शोषण के रौंगटे खड़े कर देने वाले मामलों की वजह से देश का नाम घरेलू और वैश्विक दोनों मंचों पर दागदार हुआ है।

Exclusive Interview : NCPCR के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने बाल मजदूरी को लेकर खोले कई राज

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेसहारा बच्चों की देखभाल करने के लिए प्रसिद्ध मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी (एमओसी) में हालिया सामने आए बाल शोषण के रौंगटे खड़े कर देने वाले मामलों की वजह से देश का नाम घरेलू और वैश्विक दोनों मंचों पर दागदार हुआ है। सीधे तौर पर भारत को शर्मसार होना पड़ा है। आयोग के स्तर पर इस प्रकार की घटनाएं बिलकुल बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। धर्म कोई सा हो, वो इस बात की कतई इजाजत नहीं देता कि बच्चों के साथ किसी प्रकार का कोई दुर्व्यापार या दुर्व्यवहार किया जाए। यह जानकारी बुधवार को बाल दिवस के मौके पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने हरिभूमि को दिए विशेष साक्षात्कार में दी। पेश है बातचीत के मुख्य अंश...

प्रश्न- देवरिया, मुजफ्फरपुर की घटनाओं पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

उत्तर- जिन लोगों पर समाज को ये भरोसा था कि वो बच्चों की देखभाल करेंगे, उनकी चिंता करेंगे। अगर वो ही बच्चों का शोषण करेंगे, उन्हें बेचेंगे तो यह पूरे देश के लिए शर्मनाक बात है। घटना चाहे रांची की हो, मुजफ्फरपुर, देवरिया या फिर बंगाल की। सभी से आखिरकार शर्मिंदगी ही उठानी पड़ी है। इन घटनाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बाल गृहों का सोशल ऑडिट चल रहा है। राज्यों की ओर से आयोग के पास डेटा आ रहा है। इसे हम कोर्ट के साथ साझा कर रहे हैं। देश में बाल गृहों के पंजीकरण की बात शुरु होना ही जे.जे.एक्ट की सफलता को दर्शाता है। 2015 में कानून बनने से पहले पंजीकरण करना अनिवार्य नहीं था। केंद्र ने इसे लेकर सख्ती दिखाई, चिंता की। जिसके बाद पहली बार सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त और गैर-आर्थिक सहायता प्राप्त बाल गृहों के लिए पंजीकरण अनिवार्य बना दिया गया। मैं यह मानता हूं कि जो भी ये घटनाएं सामने आ रही हैं। वो इसी सख्ती का ही परिणाम हैं। इसी के तहत किसी ने पहली बार बाल गृहों के अंदर झांककर देखा। पहले किसी ने इसकी जहमत तक नहीं उठाई थी। जब हम वहां जाएंगे, पता करेंगे तो इस तरह के मामले भी सामने आ सकते हैं।

प्रश्न- एमओसी के बाल गृहों में सामने आई बाल शोषण की घटनाओं पर आयोग का क्या रुख है?

उत्तर- एमओसी मदर टेरेसा से जुड़ा हुआ संस्थान है। मदर का नाम सुनते ही मन में एक श्रद्धा की तस्वीर उभरती है। लेकिन उनके द्वारा स्थापित संस्थान के लोग ही अगर बच्चों की तस्करी या उसे बेचने में आरोपित होते हैं। तो यह पूरे देश के लिए शर्म की बात है। यह हमें दुनिया के सामने भी शर्मसार करता है। इस तरह के मामलों को लेकर राज्य सरकारों को गंभीरता से निपटना चाहिए। आयोग भी इन्हें लेकर बेहद सख्त रवैया अपनाए हुए है। इस तरह की घटनाएं बिलकुल बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। धर्म कोई सा हो वो इस बात की कतई इजाजत नहीं देता कि बच्चों के साथ किसी प्रकार का कोई दुर्व्यापार या दुर्व्यवहार किया जाए। खासतौर पर संस्थान विशेष के मामलों की जहां तक बात है तो हमने उनके कई बाल गृहों के बारे में जानकारी जुटाना शुरु कर दिया है और जिस भी प्रकार की जानकारी हमारे पास आ रही है। उसके कानूनी पहलुओं को जांचकर हम आगे की कार्रवाई कर रहे हैं। अभी यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है। लेकिन मैं सभी प्रकार के बाल गृहों के बारे में कहना चाहूंगा जो कि देश में चल रहे हैं। उन्हें बच्चों से दुर्व्यवहार और दुर्व्यापार करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। यह बात सबको समझनी होगी।

प्रश्न- बाल मजदूरी की समस्या को जड़ से कैसे समाप्त किया जा सकता है?

उत्तर- बाल मजदूरी की समस्या एक कानूनी समस्या है। यह इसमें शामिल बच्चों पर दया करने से नहीं बल्कि समस्या के खिलाफ सख्ती से निपटने यानि कानून के अक्षरक्ष पालन के बाद ही पूरी तरह से खत्म होगी। बाल मजदूरी की समस्या की जो जड़ है। उसे जानने के लिए संगठित और असंगठित क्षेत्र की ओर देखना होगा। संगठित क्षेत्र कुछ चीजें कई बार असंगठित क्षेत्र में इसलिए छोड़ देता है। क्योंकि वहां बाल मजदूरी जैसी बीमारी फले-फूले। यह मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं। हमको जरुरत है कि इंडस्ट्री को साथ लेकर ये जो समस्या है उसे वास्तव में साफ किया जाना चाहिए।

प्रश्न- जम्मू-कश्मीर में संचालित बाल गृहों का डेटा भी आयोग एकत्रित करेगा?

उत्तर- हमने सभी राज्यों और केंद्रशसित प्रदेशों से उनके वहां मौजूद बाल गृहों का डेटा एकत्रित करने की प्रक्रिया शुरु की है। लेकिन जम्मू-कश्मीर सीपीसीआर एक्ट के दायरे में नहीं आता है। इसलिए मैं इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता हूं। इस संबंध में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास और एनसीपीसीआर के हालिया सामने आए आंकड़ों में भिन्नता के लिए कई प्रकार के तकनीकी कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। जिसमें पहले राज्यों में कुछ बाल गृह पंजीकृत थे। कुछ समय बाद वो पंजीकृत नहीं रहे। इससे आंकड़ा अलग-अलग हो सकता है, अन्यथा सरकार के किसी भी मंत्रालय के साथ काम करने में आयोग को कोई परेशानी नहीं है।

प्रश्न- बच्चों के बढ़े हुए स्कूली बस्ते का बोझ कम करने में आयोग क्या भूमिका निभाएगा?

उत्तर- एनसीईआरटी का काम है देश के सभी स्कूलों के लिए पाठ्यक्रम बनाना। सेलेबस और इवेल्यूवेशन की प्रक्रिया इसका हिस्सा होती है। इसमें हमने काफी हद तक कानूनी जीत हासिल की है। सीबीएसई ने अपनी गलत इवेल्यूवेशन प्रक्रिया को वापस लिया है। रही बात सेलेबस की तो उसे लागू करवाने के लिए हमें जिस हद तक जाना पड़ेगा, हम जाएंगे। लेकिन बच्चों के बस्तों पर पड़ने वाला किताबों का अतिरिक्त बोझ कम होना चाहिए। इसे लेकर कमीशन कटीबद्ध है। फीस को लेकर आयोग ने यूनीफॉर्म मॉडल फी फ्रेमवर्क बनाया है। इसे सभी राज्यों को भेजा जा चुका है। हमारी राज्यों से अपील है कि अगर वह इसके बिंदुओं को ध्यान में रखकर फीस निर्धारण करेंगे, तो यह बच्चों के लिए फायदेमंद होगा। राज्यों में एससीईआरटी के सेलेबस के बाद भी स्कूल निजी प्रकाशकों की पुस्तकें स्कूलों में लगा रहे हैं। इससे बच्चों के बस्ते का बोझ बढ़ रहा है। यह उनके लिए शारिरिक, मानसिक और आर्थिक रुप से नुकसानदेह है। इसे कमीशन बेहद गंभीरता से ले रहा है।

प्रश्न- देह व्यापार के लिए लड़कियों की तस्करी के मामले से कमीशन कैसे निपटेगा?

उत्तर- तस्करी को लेकर हमने पिछले महीने एक रेस्क्यु किया है। ऐसे मामलों से जुड़ी हुई दो महत्वपूर्ण कड़ियों यानि डेस्टीनेशन और सोर्स को आयोग चयनित करने का काम कर रहा है। इससे कमीशन की तस्करी की समस्या पर कागजों के इतर जमीनी स्तर पर काम करने की राह खुलेगी। हमारी मंशा है कि ज्यादा से ज्यादा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाए जाएं, ज्यादा से ज्यादा दोषियों को जेल भेजा जाए। इसमें तकनीक के इस्तेमाल के तथ्य पर भी एनसीपीसीआर विचार करेगा।

प्रश्न- आउट ऑफ स्कूल बच्चे कैसे वापस स्कूलों में लौटेंगे?

उत्तर- यह एक कानूनी विषय है। इसके लिए काफी पहले से ही हमने काम शुरु किया हुआ है। आयोग ने सरकार से बार-बार भी अपील की है कि धारा 21 (ए), धारा 30 के बीच के अंतर के बीच में जो बच्चे आउट ऑफ स्कूल हैं। उनके लिए तुरंत काम शुरु किया जाना चाहिए। हमें उम्मीद है कि सरकार शीध्र अति शीध्र इस पर निर्णय लेगी। दूसरी ओर बच्चों की तस्करी और उनसे भीख मंगवाने के मामलों को लेकर आयोग जीरो टालरेंस की नीति अपनाता है। जल्द ही जमीनी स्तर पर कमीशन द्वारा इस विषय पर उठाए गए कदमों की झलक देखने को मिलेगी।

प्रश्न- क्विक रिस्पांस सेल एनजीओ के साथ कैसे बेहतर ढंग से काम करेगा?

उत्तर- एनजीओ हमारे महत्वपूर्ण स्टेकहोल्डर्स हैं। बच्चों के क्षेत्र में इन संगठनों ने जमीनी स्तर पर काफी काम किया है। बाल गृहों का मामला एनजीओ के प्रभाव या दबदबे वाला सैक्टर ही है। हां जहां चाइल्ड लेबर या ट्रैफिकिंग से बच्चों को बाहर करने की बात आती है। तो मैं इस बात का भरोसा दिलाना चाहूंगा कि आयोग फील्ड पर काम कर रहे एनजीओ के साथ है। हम लोग इसके लिए एक क्विक रिस्पांस सेल जल्द ही गठित करने जा रहे हैं। जो जमीनी स्तर पर हर वक्त जब भी कोई एनजीओ बच्चों का रेस्क्यू कर रहा होगा। उसे बैकअप सपोर्ट देने के लिए काम करेगा।

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