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नामवर सिंह की कविताएँ : होली और जन्मदिन वाली सबसे बेस्ट है...

पकते गुड़ की गरम गन्ध से सहसा आया मीठा झोंका। आह, हो गई कैसी दुनिया। "सिकमी पर दस गुना।" सुना फिर था वही गला सबने गुपचुप सुना, किसी ने कुछ नहीं कहा। कविता के लेखक और हिंदी के प्रख्यात कवि नामवर सिंह (Namvar Singh) का मंगलवार रात निधन हो गया। डॉक्टरों के मुताबिक उनका निधन ब्रेन हैमरेज से हुआ है। हलांकि इलाज के कारण उनकी हालत में सुधार था लेकिन वो पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हुए थे। नामवर सिंह सीधे बात कहने वाले हिंदी के लेखकों में से थे। 1971 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया था। हिंदी साहित्य में उन्हें कविताएं, कहांनियां, आलोचनाएं समेत कई सारी चीजें लिखी हैं। आज हम आपको बता रहे हैं नामवर सिंह जी की 5 सबसे मशहूर कविताएं।

नामवर सिंह की कविताएँ : होली और जन्मदिन वाली सबसे बेस्ट है...
पकते गुड़ की गरम गन्ध से सहसा आया मीठा झोंका। आह, हो गई कैसी दुनिया। "सिकमी पर दस गुना।" सुना फिर था वही गला सबने गुपचुप सुना, किसी ने कुछ नहीं कहा। कविता के लेखक और हिंदी के प्रख्यात कवि नामवर सिंह (Namvar Singh) का मंगलवार रात निधन हो गया। डॉक्टरों के मुताबिक उनका निधन ब्रेन हैमरेज से हुआ है। हलांकि इलाज के कारण उनकी हालत में सुधार था लेकिन वो पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हुए थे। नामवर सिंह सीधे बात कहने वाले हिंदी के लेखकों में से थे। 1971 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया था। हिंदी साहित्य में उन्हें कविताएं, कहांनियां, आलोचनाएं समेत कई सारी चीजें लिखी हैं। आज हम आपको बता रहे हैं नामवर सिंह जी की 5 सबसे मशहूर कविताएं।

फागुनी शाम

फागुनी शाम
अंगूरी उजास
बतास में जंगली गंध का डूबना
ऐंठती पीर में
दूर, बराह-से
जंगलों के सुनसान का कूंथना।
बेघर बेपरवाह
दो राहियों का
नत शीश
न देखना, न पूछनाष
शाल की पंक्तियों वाली
निचाट-सी राह में
घूमना घूमना घूमना।

उनये उनये भादरे

उनये उनये भादरे
बरखा की जल चादरें
फूल दीप से जले
कि झुरती पुरवैया की याद रे
मन कुएं के कोहरे-सा रवि डूबे के बाद इरे।
भादरे।
उठे बगूले घास में
चढ़ता रंग बतास में
हरी हो रही धूप
नशे-सी चढ़ती झुके अकास में
तिरती हैं परछाइयाँ सीने के भींगे चास में
घास में।

कभी जब याद आ जाते

नयन को घेर लेते घन,
स्वयं में रह न पाता मन
लहर से मूक अधरों पर
व्यथा बनती मधुर सिहरन
न दुःख मिलता न सुख मिलता
न जाने प्राण क्या पाते!
तुम्हारा प्यार बन सावन,
बरसता याद के रसकन
कि पाकर मोतियों का धन
उमड़ पड़ते नयन निर्धन
विरह की घाटियों में भी
मिलन के मेघ मंड़राते।
झुका-सा प्राण का अंबर,
स्वयं ही सिंधु बन-बनकर
ह्रदय की रिक्तता भरता
उठा शत कल्पना जलधर।
ह्रदय-सर रिक्त रह जाता
नयन-घट किंतु भर आते
कभी जब याद आ जाते।

पकते गुड़ की गरम गंध से

पकते गुड़ की गरम गन्ध से सहसा आया मीठा झोंका।
आह, हो गई कैसी दुनिया।
"सिकमी पर दस गुना।"
सुना फिर था वही गला
सबने गुपचुप सुना, किसी ने कुछ नहीं कहा।
चूँ - चूँ बस कोल्हू की, लोहे से नहीं सहा
गया। चिलम फिर चढ़ी, "खैर, यह पूस तो चला... "
पूरा वाक्य न हुआ कि आया खरतर झोंका
धधक उठा कौड़ा, पुआल में कुत्ता भौंका।

आज तुम्हारा जन्मदिवस

आज तुम्हारा जन्मदिवस, यूँ ही यह संध्या
भी चली गई, किंतु अभागा मैं न जा सका
समुख तुम्हारे और नदी तट भटका-भटका
कभी देखता हाथ कभी लेखनी अबन्ध्या ।
पार हाट, शायद मेल; रंग-रंग गुब्बारे ।
उठते लघु-लघु हाथ,सीटियाँ; शिशु सजे-धजे
मचल रहे... सोचूँ कि अचानक दूर छ: बजे ।
पथ, इमली में भरा व्योम,आ बैठे तारे
'सेवा उपवन', पुष्पमित्र गंधवह आ लगा
मस्तक कंकड़ भरा किसी ने ज्यों हिला दिया ।
हर सुंदर को देख सोचता क्यों मिला हिया
यदि उससे वंचित रह जाता तुम्हीं-सा सगा।
क्षमा मत करो वत्स, आ गया दिन ही ऐसा
आँख खोलती कलियाँ भी कहती हैं पैसा।
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