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दुनिया भर के लोगों के लिए आज भी जिंदा हैं मदर टेरेसा, जाने उनके बारे में खास बातें

आज दुनिया में खास तौर से भारतीय उपमहाद्वीप में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो मदर टेरेसा को भूल चुका होगा।

दुनिया भर के लोगों के लिए आज भी जिंदा हैं मदर टेरेसा, जाने उनके बारे में खास बातें

भारत रत्न और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा को दुनिया भर में शांति दूत के रूप जाना जाता है। मदर टेरेसा ने दुनिया के लोगों को शांति पहुंचाने के लिए अपने जीवन के एक-एक पल को दान कर दिया था। आज दुनिया में खास तौर से भारतीय उपमहाद्वीप में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो मदर टेरेसा को भूल चुका होगा।

26 अगस्त 1910 को मैसिडोनिया की राजधानी स्कोप्जे शहर में जन्मी मदर टेरेसा आज भी अपनी ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ संस्था के रूप में लोगों के बीच जीवंत हैं। आज भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के देश मदर टेरेसा की 108वीं जयंती मनाकर उन्हें याद कर रहे हैं।

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मदर टेरेसा के चेहरे पर एक ख़ास आभा उमड़ जाती थी। मदर टेरेसा एक ऐसी महान आत्मा थी। जिनका ह्रदय संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए धड़कता था और इसी कारण उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन उनके सेवा और भलाई में लगा दिया।

मदर टेरेसा असली नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’ (Agnes Gonxha Bojaxhiu ) था। अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मदर टेरेसा एक ऐसी कली थीं जिन्होंने छोटी सी उम्र में ही गरीबों, दरिद्रों और असहायों की जिन्दगी में प्यार की खुशबू भर दी थी।

मदर टेरेसा एक रोमन कैथोलिक सन्यासिनी और ईसाई धर्म प्रचारक थी। उन्होंने असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व मजबूर गरीबों को अपनी ममता व प्रेम लुटाकर अपना जीवन सेवा भाव में समर्पित कर दिया। मदर टेरेसा द्वारा स्थापित संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी आज 123 मुल्कों में सक्रिय कहते लोगों की भलाई के लिए काम कर रही है, इसमें कुल 4,500 सिस्टर्स हैं।

7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य भूखों, निर्वस्त्र, बेघर, लंगड़े-लूले, अंधों, चर्म रोग से ग्रसित और ऐसे लोगों की सहायता करना था जिनके लिए समाज में कोई जगह नहीं थी।

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मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी का आरम्भ मात्र 13 लोगों के साथ हुआ था पर मदर टेरेसा की मृत्यु के समय 1997 में 4 हजार से भी ज्यादा सिस्टर्स दुनियाभर में असहाय, बेसहारा, शरणार्थी, अंधे, बूढ़े, गरीब, बेघर, शराबी, एड्स के मरीज और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों की सेवा कर रही हैं।

बढ़ती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। वर्ष 1983 में 73 वर्ष की आयु में उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। उस समय मदर टेरेसा रोम में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के लिए गई थी। इसके पश्चात वर्ष 1989 में उन्हें दूसरा हृदयाघात आया और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया। साल 1991 में मैक्सिको में न्यूमोनिया के बाद उनके ह्रदय की परेशानी और बढ़ गयी। इसके बाद उनकी सेहत लगातार गिरती रही। 5 सितम्बर 1997 को उनकी मौत हो गई।

उनकी मौत के समय तक ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ में 4000 सिस्टर और 300 अन्य सहयोगी संस्थाएं काम कर रही थीं जो विश्व के 123 देशों में समाज सेवा में कार्यरत थीं। मानव सेवा और ग़रीबों की देखभाल करने वाली मदर टेरेसा को पोप जॉन पाल द्वितीय ने 19 अक्टूबर 2003 को रोम में धन्य घोषित किया।

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