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यूपी मिशन: मुनाफे की सियासत के मोड़ पर भाजपा!

सपा, कांग्रेस व बसपा की कमजोरियों पर होगा दांव

यूपी मिशन: मुनाफे की सियासत के मोड़ पर भाजपा!
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नई दिल्ली. भारतीय जनता पार्टी देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए हर उस दांव को मजबूत कर रही है, जिसमें सपा, कांग्रेस या बसपा की कमजोरियां छिपी है। मसलन युवाओं, महिलाओं और जातीय यानि सामाजिक समीकरणों को साधने के साथ राज्य में विकास के मुद्दे को सामने लाकर फिलहाल चुनावी सियासत में भाजपा अन्य दलों में सेंधमारी करने के मामले में भारी पड़ती नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की बढ़ती तपिश में भाजपा, कांग्रेस, बसपा जैसे प्रमुख दल सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को बेदखल करने के इरादे से अपनी चुनावी रणनीति का ताना-बाना बुनने में जी-जान से जुटे हुए हैं। केंद्र की सत्ता में होने के कारण भाजपा प्रदेश में ताबड़तोड़ बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की मुहिम में सड़क और पुल निर्माण की परियोजनाओं को भी पटरी पर उतारने में पीछे नहीं है।
श्रीराम मंदिर निर्माण या जातीय समीकरण
राज्य में सत्तारूढ़ सपा की अखिलेश सरकार भी चुनावी सियासत के मद्देनजर हरेक कैबिनेट बैठकों में सरकारी कर्मचारियों से लेकर अंतिम छोर पर बैठे आम आदमी को लुभाने के लिए योजनाओं को बाहर निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हों, चाहे वह स्मार्ट फोन देने का ही निर्णय क्यों न हो। लेकिन सत्तारूढ़ सपा के अंदरूनी विवाद पहली बार मुलायम परिवार में सिर चढ़कर बोल रहा है, जिसका फायदा लेने में भाजपा की रणनीति कांग्रेस या बसपा से ज्यादा धारधार साबित हो रही है। भाजपा ने हरहाल में यूपी की सत्ता कब्जाने की सियासत में विकास के एजेंडे को लांखते हुए श्रीराम मंदिर निर्माण या जातीय समीकरणों को साधने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी और कांग्रेस, सपा, बसपा में सेंधमारी करके उनके दिग्गज और बागी चेहरों को कमल थामने के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया है। हाल में कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष और कई महत्वपूर्ण पदो पर रही दिग्गज रीता बहुगुणा जोशी को ब्राह्मण चेहरे के रूप में अपने खेमे में शामिल कर भाजपा ने कांग्रेस की रणनीति पर बड़ी चोट कर हैरान कर दिया। इससे पहले ऐसे ही बसपा के स्वामी प्रसाद मौर्या, बसपा के ब्रजेश पाठक जैसे कई बडे चेहरों को अपनी चुनावी रणनीति से प्रभावित किया है।
उम्मीदवारों का ऐसे होगा चयन
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने जिस प्रकार की चुनावी रणनीति तय की है, उसमें प्रत्याशी बनाने के लिए भाजपा ने पांच मानक तय करके उन्हीं पर फोकस करने का फैसला किया है। इन मानको में प्रत्याशी के जीतने की संभावना, सामाजिक व निजी पृष्ठभूमि, पार्टी के प्रति निष्ठा खासकर दूसरे दलों से आए नेता, युवा व प्रभावी नेतृत्व व सामाजिक व जातीय समीकरणों की अनुकूलता शामिल हैं। भाजपा ने संभावित उम्मीदवार के विभिन्न सोशल साइट पर पार्टी व राजनीतिक मुद्दों की सक्रियता का भी आकलन करना भी शुरू करा दिया हैै। यही कारण है कि इस बार ज्यादातर नए चेहरों में युवाओं, महिलाओं और चुनावी क्षेत्र में सामाजिक छवि तथा जनाधार वाली पृष्ठभूमि वालों को भाजपा का टिकट मिलने की ज्यादा संभावना है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत से बड़ा आंकड़ा हासिल करने के लक्ष्य पर चल रही भाजपा ने टिकट वितरण में फूंक फूंककर कदम आगे बढ़ा रही है। जाहिर है कि भाजपा मेें इस बार किसी सिफारिश के बजाय तय किये गये मानदंडो पर खरा उतरने वाला ही भाजपा का उम्मीदवार होगा। सूत्रों के अनुसार भाजपा ने पार्टी के किसी भी बड़े या प्रमुख नेताओं के बेटे या बेटियों या पत्नी या पति को टिकट न देने की रणनीति साफ कर दी है।

तो इन पर गाज गिरना तय
भाजपा के सूत्रों की माने तो पार्टी के इन तय मानदंड व नियम के आधार पर उन दावेदारों पर गाज गिरना तय है, जो वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में जमानत जब्त करा चुके हैं। जमानत गंवाने के दायरे में ऐसे भाजपा के 229 उम्मीदवार शामिल हैं। हालांकि मौजूदा 47 विधायकों पर दांव अजमाया जा सकेगा, लेकिन कुछ को बदलने की भी अटकले हैं। सूत्रों के अनुसार भाजपा यूपी चुनाव में युवा और सामाजिक समीकरणों के लिहाज से ज्यादातर नए चेहरे सामने लाने की रणनीति बना रही है। भाजपा की इस रणनीति में आरएसएस की टीमें भी बूथ स्तर पर सक्रिय हैं, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर टिकट तय किया जाना है।
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