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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश...मिर्जा गालिब के दस बेहतरीन शेर

गालिब का आज 221वां जन्मदिन है। उर्दू का अदब बिना मिर्जा गालिब की शायरी (mirza ghalib shayari) के पूरा नहीं होता। गालिब की शायरी ने उर्दू साहित्य की ओर लोगों का ध्यान खींचा था। लेकिन गालिब ने अधिकतम उर्दू में नहीं बल्कि फारसी में लिखा है।

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश...मिर्जा गालिब के दस बेहतरीन शेर
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गालिब का आज 221वां जन्मदिन है। उर्दू का अदब बिना मिर्जा गालिब की शायरी (mirza ghalib shayari) के पूरा नहीं होता। गालिब की शायरी ने उर्दू साहित्य की ओर लोगों का ध्यान खींचा था। लेकिन गालिब ने अधिकतम उर्दू में नहीं बल्कि फारसी में लिखा है।
गालिब जो लिख कर चले गए आज भी लोग उसकी गहराई सोचने को मजबूर होते हैं। गालिब के शेर की खास बात यह है कि वह किसी एक अहसास से नहीं बंधे हुए हैं। हर माहौल में उनका शेर इस्तेमाल किया जा सकता है। आज हम मिर्जा गालिब के जन्मदिन पर आपको कुछ ऐसे ही शेर सुना रहे हैं जो आपका दिन बना देंगे।
1. आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
2. बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
3. बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
4. दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ
5. दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
6. हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
7. हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
8. इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
9. काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' शर्म तुम को मगर नहीं आती
10. कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़ पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

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