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जिंदगी का आईना है रेडियो, जब मन हो तब चेहरा देख लीजिए..

हरिभूमि ने राजधानी के रेडियो जॉकी और श्रोताओं से बातचीत कर जाना कि तेजी से बदलते दौर में आज रेडियो का क्या महत्व है और आगे उसमें क्या नवाचार देखने को मिल सकता है...

जिंदगी का आईना है रेडियो, जब मन हो तब चेहरा देख लीजिए..

विश्व रेडियो दिवस... यानी वह दिन, जब हम सबसे पहले मास कम्यूनिकेशन से जुड़े। आज सूचना और प्रसारण के क्षेत्र में नित नए प्रयोग हो रहे हैं, डिजीटिलाइजेशन का दौर अपने चरम पर है, डिजीटल इंडिया से इसे हम अपने देश में भी देख-समझ सकते हैं। लेकिन इन सबके बीच रेडियो की लोकप्रियता न केवल जस के तस है, बल्कि इसके श्रोताओं की संख्या भी बढ़ी है।

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यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जनता से सीधा संवाद रेडियो पर ‘मन की बात’ से ही करते हैं और विश्व रेडियो दिवस की बधाई देते हुए कहते हैं कि- यह माध्यम हमेशा सीखने, खोजने, मनोरंजन और एक साथ मिलकर बढ़ने का केन्द्र बिन्दु बना रहेगा।

प्रधानमंत्री का कहना है कि रेडियो हमें नजदीक लाता है और मैं मन की बात कार्यक्रम के माध्यम से इस का अनुभव कर रहा हूं। पीएम की इसी बात को लेकर हरिभूमि ने राजधानी के रेडियो जॉकी और श्रोताओं से बातचीत कर जाना कि तेजी से बदलते दौर में आज रेडियो का क्या महत्व है और आगे उसमें क्या नवाचार देखने को मिल सकता है... एक खास खबर....

आज भी जस के तस अपनी जगह खड़ा है रेडियो

राजधानी के जाने माने रेडियो जॉकी और 11 साल से अपनी सेवाएं दे रहे अमित वाधवा कहते हैं कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी रेडियो की पहुंच सबसे ज्यादा है, और ये बात रेडियो की उपयोगिता की कहानी खुद बयां करता है।
रेडियो में नवाचार पर अमित का कहना है कि जिस क्षेत्र में कामर्शियल संभावनाएं बढ़ती जाती हैं, उसमें नवाचार होना लाजिमी है। हां, एक बड़े परिवर्तन की बात करें तो पहले रेडियो जॉकी की पहचान केवल उसकी आवाज होती थी, लेकिन आज फेसबुक, ट्िवटर और अन्य माध्यमों पर आप आरजे को देख और सुन सकते हैं, जबकि सूचना-प्रसारण के क्षेत्र में एक व्यापक क्रांति आने के बाद आज भी रेडियो विजुअल नहीं हुआ। यानी आज भी रेडियो अपनी जगह जस के तस खड़ा है। रेडियो जिंदगी का आइना है, जिसे आप जब चाहें तब देख सकते हैं।

भाषा, शैली और विषय में आया बदलाव

आरजे रूपक ने बताया कि देश में तमाम रेडियो चैनल हैं, लेकिन आज भी आकाशवाणी जैसा रेडियो स्ट्रक्टर किसी चैनल के पास नहीं है। आज भी अन्य चैनलों के मुताबिक आकाशवाणी की रीच ज्यादा है। वहीं प्राइवेट रेडियो की बात करें तो देश में इंदौर से शुरू हुआ रेडियो मिर्ची सन्ा 2000 में पहला प्राइवेट रेडियो चैनल था।
उन्होने आगे कहा, आज रेडियो की भाषा, शैली और विषयों में बहुत बदलाव आ गया है। रेडियो शुरू से ही म्यूजिक के लिए ही बना है, जिसमें न्यूज और कॉमेंट्ररी को अनोखा स्थान मिला। रेडियो की अहमियत को जानते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रेडियो पर अपने विचार रखते हैं। आने वाले समय में रेडियो प्रोफेशन के आधार पर लोगों में बंट जाएगा।

आज भी रेडियो कल जैसा

आज से 10 साल पहले रेडियो में चार्म बहुत ज्यादा था, लोग आरजे को देख नहीं पाते थे, क्योंकि पहले लुक्स मैटर नहीं था। लेकिन आज एक आरजे को गुड लुकिंग होना भी जरुरी है, क्योंकि उन्हें अब कई विजुअल प्रोग्रामों में भी हिस्सा लेना पड़ता है। ये कहना है राजधानी की जानी पहचानी आरजे पीहू का।
पीहू कहती हैं कि पैडमैन तो आज सेनेटरी नैपकिन की बात रख रही है, लेकिन रेडियो ने इस बात आज से लगभग 10 साल पहले ही रखा था। जहां तक मैं महसूस करती हूं उस हिसाब से रेडियो कल भी केवल सुना जा सकता था, आज भी सुना जा सकता है और आगे इसका स्वरूप ऐसा ही रहेगा, क्योंकि रेडियो का मतलब ही श्रव्य होना है।
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