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मौसम की जानकारी : वैज्ञानिक हैरान, सर्दी ने तोड़ा 118 साल का रिकॉर्ड

मौसम की जानकारी के अनुसार इस साल सर्दी में बार-बार बदल रहे मौसम से दिल्लीवासी ही हैरान-परेशान नहीं हैं, बल्कि मौसम विशेषज्ञ भी इसे सामान्य नहीं मान रहे हैं। उनकी नजर में इस बार दिल्ली की सर्दी असामान्य है। इस बार जितने रिकॉर्ड टूटे हैं, उतने पहले कभी नहीं टूटे।

मौसम की जानकारी : वैज्ञानिक हैरान, सर्दी ने तोड़ा 118 साल का रिकॉर्ड

मौसम की जानकारी के अनुसार इस साल सर्दी में बार-बार बदल रहे मौसम से दिल्लीवासी ही हैरान-परेशान नहीं हैं, बल्कि मौसम विशेषज्ञ भी इसे सामान्य नहीं मान रहे हैं। उनकी नजर में इस बार दिल्ली की सर्दी असामान्य है। इस बार जितने रिकॉर्ड टूटे हैं, उतने पहले कभी नहीं टूटे। इसके पीछे जलवायु परिवर्तन का असर भी बताया जा रहा है। सर्दी के बाद गर्मी के मौसम में भी ऐसी ही हालत रह सकती है। आमतौर पर सर्दी का मौसम नवंबर से फरवरी तक माना जाता है, लेकिन इस बार सर्दी मार्च के तीसरे सप्ताह में भी प्रभावी है।

एक मार्च रहा 118 सालों में सबसे ठंडा

इस बार तो कई बार ऐसी स्थिति आई जब दिल्ली को शिमला से भी ठंडा बताया गया। सात फरवरी को बड़े स्तर पर हुई ओलावृष्टि ने तो सभी को हैरत में डाल दिया था। एक मार्च को 118 वर्षों में सबसे अधिक ठंड पड़ने वाली तिथि के रूप में दर्ज किया गया। इस बार पश्चिमी विक्षोभ भी एक के बाद एक आते रहे तो बारिश ने भी पिछले तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए। कोहरा भी इस बार नहीं के बराबर ही नजर आया।

पश्चिमी विक्षोभ ने बिगाड़ा मौसम

भारतीय मौसम विभाग के विशेषज्ञ बताते हैं कि सामान्यतया फरवरी से पश्चिमी विक्षोभ धीरे-धीरे ऊपरी अक्षांश की ओर जाना शुरू हो जाते हैं। इससे भारतीय क्षेत्र प्रभावित नहीं होता। इस बार पश्चिमी विक्षोभ दक्षिण की तरफ ज्यादा रहे हैं यानी भारतीय क्षेत्र पर ही प्रभावी हो रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन भी है बड़ी वजह

एक तथ्य यह भी सामने आ रहा है कि जनवरी में पश्चिमी विक्षोभ की अधिकता के पीछे भी यही कारण था लेकिन वर्तमान में यह स्थिति न होने के बावजूद पश्चिमी विक्षोभ प्रभावी साबित हो रहे हैं। निश्चय ही यह जलवायु परिवर्तन का असर है। महेश पलावत (मुख्य मौसम विज्ञानी, स्काईमेट वेदर) के मुताबिक, निसंदेह इस बार की सर्दी असामान्य रही है। बारिश और पश्चिमी विक्षोभ का दौर लगातार बन रहा है। जनवरी में सात, फरवरी में पांच और मार्च में भी अभी दो-तीन विक्षोभ आ चुके हैं। कोहरा अधिक न पड़ने के कारण इस बार कंपकंपी वाले दिनों का गायब रहना भी हैरान करता है। इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा जा सकता है।

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