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मथुरा की होली, आनंद-राग का पर्व और ये है रंगोत्सव में निहित संदेश

वसंत का अनुसरण करता फाग हमारे द्वार पर आ पहुंचा है।

मथुरा की होली, आनंद-राग का पर्व और ये है रंगोत्सव में निहित संदेश
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वसंत का अनुसरण करता फाग हमारे द्वार पर आ पहुंचा है। इसके आते ही वातावरण में एक मस्ती का आलम छा जाता है। हर किसी का तन-मन, प्रेम-उल्लास और उमंग के रंगों की फुहार से सराबोर होने को मचलने लगता है। यह पर्व जीवन में व्याप्त नीरसता, रिश्तों में संक्रमित होती कृत्रिमता को दूर कर उसे नवऊर्जा से संचारित करने का अवसर भी देता है।

खेतों में पीली चूनर ओढ़ नाचती अनगिनत स्वप्न सुंदरियां, हाथों में गुलाब ले क्यारियों में खड़े प्रेमदूत, चमकते पत्तों के बीच से झांकती मंजरियों के लिए स्वागत गीत गाती कोयल और सतरंगी फूलों का गजरा अपने बालों में सजाती धरती। ऐसी अनुपम छटा देखकर किसके मन में सुगबुगाहट नहीं होगी। कौन नवसृजन के शोर में विभोर प्रकृति के स्पर्श से स्पंदित नहीं होगा, मौसमी फूलों की सुगंध से किसके मन की खिड़कियों के पल्ले ढप्प से नहीं खुल जाएंगे और कैसे दर्द और उजास की उदासी पर उल्लास और उत्सव की रंगीनियत हावी नहीं होगी। ये फगुनाहट की आहट है। वही अल्हड़ फगुनाहट, जिसे वसंत अपने संग खींच लाया है।

हमारे देश में वसंत को मदनोत्सव के रूप में मनाने की परंपरा पुरानी है। इस दिन पत्नी अपने पति को कामदेव का प्रतिरूप मानकर उसकी पूजा करती है। ऐसा माना जाता है कि प्रीति पूर्वक सहसंबंध स्थापित करने के लिए यह सबसे उपयुक्त समय होता है इसलिए गीत गाकर इस उत्सव को मनाया जाता है। इसके पीछे तर्क यह है कि कड़ाके की ठंड के बाद जैसे ही मौसम अपने गर्माहट की बेफिकरी आबोहवा में घोलता है, धरती के साथ मानव मन भी हरियाने लगता है। कामनाओं को आंदोलित करने वाली मदमस्त बयार सबको अपनी आगोश में ले लेती है और प्रेम-प्रणय के किस्सों की फुसफुसाहट वातावरण में तैरने लगती है। तभी तो गोपाल दास ‘नीरज’ ने कहा है- आज वसंत की रात/गमन की बात न करना

आनंद-राग का पर्व

वसंत के साथ ही चला आता है फगुआ। उत्सवों में फगुआ का वही महत्व है, जो नृत्यों में रास का और प्रेम में मिलन का है। फगुआ यानी आनंद का पर्व, राग का पर्व। ये वैर भुलाने और भेद मिटाने का, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सबको एक ही रंग में रंगने का, चेतना में जमी अजनबियत और मायूसी की बर्फ को पिघलाने और उत्सव की मादकता में विलीन हो जाने का पर्व है। ये शिशिर की जकड़न को तोड़ आनंद की उष्णता में समाने का पर्व है। महान साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेणु की पंक्तियां हैं- साजन होली आई है/ सुख से हंसना/जी भर गाना/मस्ती से मन को बहलाना/पर्व हो गया आज/साजन होली आई है!

मथुरा की होली

बात होली की हो रही हो तो सबसे पहले ब्रज की होली याद आती है। नंदगांव, बरसाना, मथुरा, वृंदावन और कृष्ण से जुड़े सभी स्थान, एक सप्ताह पहले ही होली के रंग में रंगने लगते हैं। जगह-जगह फाग और स्वांग खेले जाते हैं। ब्रज की गली-गली रास, नृत्य और उत्सव में सराबोर हो उठती है। बरसाने में अलग तरह की होली खेली जाती है, जिसे लट्ठमार होली कहा जाता है। माना जाता है कि कृष्ण और उनके सखा गोपियों के साथ होली खेलने बरसाने आए थे। होली खेलते-खेलते उन्होंने गोपियों के साथ ठिठोली शुरू कर दी तो राधा अपनी सखियों के साथ उन पर लाठी डंडे बरसाने लगीं। नंदगांव से जो ग्वाले बरसाने में होली खेलने आते हैं, उन्हें हुरियारे कहा जाता है। कृष्ण की इसी लीला को जनमानस की स्मृतियों में जीवित रखने के लिए आज भी ये हुरियारे उसी परंपरा का निर्वहन करने हर साल बरसाने पहुंच जाते हैं और बरसाने की महिलाएं उन पर लाठियां मारकर रस्म पूरी करती हैं। कुछ स्थानों पर फूलों की होली खेलने का भी प्रचलन है। इसमें कलाकार राधा-कृष्ण का रूप धर एक-दूसरे पर फूलों की वर्षा करते हैं। कहीं-कहीं मंदिरों में सभी एकत्र हो भजन कीर्तन और लोकगीतों के साथ फूलों की होली खेलते हैं।

साहित्य में रंगोत्सव

हिंदी साहित्य में राधा-कृष्ण के बीच खेली गई होली का अद्भुत वर्णन किया गया है। जहां कृष्ण केंद्र में हैं और उनके चारों ओर संपूर्ण ब्रज सम्मोहित भाव से रहता है। होली खेलने की इस क्रिया में प्रेम और भक्ति दोनों रसों का आस्वादन है। असंख्य गोपियां, असंख्य कृष्ण के साथ होली पर महारास रचाती हैं। महारास यानी प्रेमाभिव्यक्ति का चरमोत्कर्ष। कृष्ण से एकाकार होने का उत्सव। तभी तो मीरा बाई गाती हैं-श्याम सखा मेरी रंग दे चुनरियां/ऐसी वो रंग दे कि रंग नाहिं छूटे/धोबिया धोए चाहे सारी उमरिया।

यह रंग हल्दी, पुष्प या कृत्रिम पदार्थों से निर्मित रंग नहीं। यह है प्रेम, भक्ति और समर्पण की नाद में बूंद-बूंद एकत्र हुआ रंग। मीरा के इन पदों में गुहार है, मनुहार है, राग की चाह है और एकसार होने की तड़प भी। समाज जब तब उनके प्रेम के मध्य दीवार बनने की कोशिश करता रहा, इसलिए तो वो अपने श्याम सखा से ऐसे रंग की याचना करती हैं, जिसे कोई समाज रूपी धोबी उन पर से न हटा सके।

भारतीय साहित्य में होली की परंपरा में सिर्फ पर्व की मस्ती भर नहीं, जीवन से सरोकार भी हैं। होली का उत्सव जीवन की उदासी मिटाने के साथ रिश्तों की कड़वाहट दूर करने का भी अवसर है। सामाजिक द्वेष मिटाने और बंधुत्व के लहलहाते खेतों में जाने की पगडंडी है। एक दूसरे को सिर्फ रंगों से सराबोर नहीं करना है बल्कि उस पर अपनत्व, प्रेम और आत्मीयता का गुलाल भी मलना है। आखिर यह पर्व त्योहार सब मन की गांठें खोलने का ही तो सुअवसर होती हैं, तभी तो कितनी आत्मीयता से हरिवंश राय बच्चन जी ने अपनी काव्य पंक्तियों में इस अवसर की कल्पना की है-विश्व मनाएगा कल होली/घूमेगा जग राह-राह में/आलिंगन की मधुर चाह में/स्नेह सरसता से घट भरकर/ले अनुराग राग की झोली!

लोकगीतों में फाग के रंग

हमारे पर्व-त्योहार की झलक जितनी खूबसूरती, मादकता, उल्लास और वैभव के साथ हमारे लोकगीतों में सुनने को मिलती है, वैसी कहीं और दुर्लभ है। लोकगीत यानी जन के मानस में बसने वाले गीत। ये गीत सदियों से बिना किसी पत्र, बिना किसी रिकॉर्ड के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चले आ रहे हैं। अवधी और ब्रज के लोकगीतों में कृष्ण-राधा, राम-सीता और शिव-पार्वती के बीच होली का सुंदर वर्णन है तो अन्य लोकगीतों जैसे राजस्थानी, बिहारी, पहाड़ी, बंगाली सभी में अलग बोलियों के साथ फागुन का वही उल्लास सुनने को मिलता है। बुंदेलखंड में तो वसंत से होली तक पूरा माहौल फगुआ में सराबोर रहता है। जगह-जगह महफिलें सजती हैं। ढोल और मंजीरों के साथ होली गीत गाए जाते हैं। होली की लोकगीत परंपरा में हमारे पारिवारिक रिश्तों की चुहल, ग्राम्य संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य का भी मनोहारी विवरण मिलता है-हरे-हरे खेतवा में पीली-पीली सरसों/टेसू का रंग नहीं छूटेगा बरसों/आज धरती का नूतन सिंगार/महिनवा फागुन का।

रंगोत्सव में निहित संदेश

हालांकि आज के मशीनी जीवन के बीहड़ जंगल में पलाश के फूल नहीं खिलते। जीवन का लालित्य, रस, आनंद और उत्साह को आधुनिकता नाम का रोग लीलता जा रहा है। ऐसे में कहां किसी के पास समय रहा त्योहार मनाने का। अब उससे भी ज्यादा खतरनाक आभासी युग आ चुका है। अब सारे पर्व त्योहार स्टेटस पर प्रोफाइल बदलकर और फोटो डालकर और एक-दूसरे को भेजकर मना लिया जाता है। सोशल मीडिया का एक समंदर है और वहीं कृत्रिम भावनाएं उफनती दिखती हैं। उल्लास के बादल मन के आंगन तक पहुंच ही नहीं पाते तो हम पर बरसेंगे कैसे? शुभकामनाएं थोक में बंटती हैं, रंग एक साथ सबके व्हाट्सएप पर उड़ता है और गुझिया की फोटो वाली एक थाली से अपने हजारों आभासी मित्रों के साथ होली मना ली जाती है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि हम होली जैसे पर्वों की महत्ता समझें। यह कभी न भूलें कि सदियों से उत्सव, वसंत की तरह हमारे जीवन में आते हैं और ढेर सारे फूल बिखेर कर फिर साल भर के वनवास पर चले जाते हैं। ये उत्सव हमारे तन-मन में ऊर्जा-उत्साह के संवाहक होते हैं। इन्हीं से ऊर्जा प्राप्त कर हम अपनी सामान्य दिनचर्या र्में अगले उत्सव के आने तक उमंग के साथ व्यस्त रहते हैं। जब हमारा मानसिक वितान दिनचर्या की धूल में धूमिल नजर आने लगता है, ये उत्सव आकर इनमें नई ताजगी भर देते हैं। होली जैसे पर्व हमारे अंदर सोई हुई चंचलता, खिलंदड़ेपन को जगाते हैं। ये हमें बताने आते हैं कि इस गंभीर-बोझिल होते जा रहे जीवन में थोड़ी-सी हंसी और शरारत का अवसर आना भी आवश्यक है। तो आइए, रंगों के इस अनोखे पर्व का सब मिलकर आनंद लें।

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