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Exclusive Interview:कई मामलों पर खुलकर बोलीं मेनका गांधी

मेनका गांधी का कहना है कि जहां कहीं भी महिलाओं और बच्चों से जुड़ा हुआ मामला उनके सामने आएगा।

Exclusive Interview:कई मामलों पर खुलकर बोलीं मेनका गांधी

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री (डब्ल्यूसीडी) मेनका गांधी का कहना है कि जहां कहीं भी महिलाओं और बच्चों से जुड़ा हुआ मामला उनके सामने आएगा। वो हमेशा वहां मदद पहुंचाने के लिए तैयार रहेंगी। फिर चाहे वो संघ मुख्यालय में आयोजित कोई बैठक ही क्यों न हो। यह अलग बात है कि उस बैठक में वो लोग शामिल थे।

जो किसी पार्टी या संस्था के साथ जुड़े हुए थे। सवाल यह है कि मेरी नजर में यह वो लोग थे। जिनका संबंध मेरे मंत्रालय से था। इसलिए मैं वहां गई थी। मुझे जहां कहीं भी लगता है कि अगर मेरे किसी प्रयास से महिलाओं और बच्चों को थोड़ा भी फायदा हो रहा है। तो मैं वहां जाती हूं और जाऊंगी ही जाऊंगी।

संघ मुख्यालय में आयोजित बैठक में स्कूल व एडॉप्शन केंद्र चलाने वाली सैकड़ों संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। बैठक में शामिल होने के लिए संघ ने मुझ पर कोई दवाब नहीं डाला। उन्होंने केवल निवेदन किया था। मंत्रालय का लक्ष्य है कि हम 25 हजार से 40 हजार बच्चों को एडॉप्ट करवा दें।

यह बहुत मुश्किल पड़ रहा है। बच्चे कम हैं। लेकिन इस पर हम रोज काम कर रहे हैं। यह जानकारी केंद्रीय डब्ल्यूसीडी मंत्री मेनका गांधी ने हरिभूमि संवाददाता कविता जोशी को दिए विशेष साक्षात्कार में दी। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश-

रेप विक्टिम्स के लिए बनाए गए निर्भया फंड का प्रयोग क्या मंत्रालय दूसरी योजनाओं में कर रहा है?

नहीं, नहीं। सबसे ज्यादा वन स्टॉप सेंटर में किया जा रहा है। अभी हमने देश में 150 सेंटर शुरू किए हैं। इसमें हजारों औरतें रोज जा रही हैं। हमारी योजना इन्हें 600 तक करने की है। इससे इनका ज्यादा से ज्यादा सद्उपयोग हो सकेगा।

दूसरा गृह मंत्रालय ने सीसीटीवी की मांग की थी, कर्नाटक ने फीमेल बस ड्राइवर की ट्रेनिंग के लिए पैसा मांगा था। इन सभी के लिए पैसा दिया जा रहा है। हमने महिलाओं के लिए बनाई जा रही पॉलिसी में भी एक बिंदु डाला है कि हर स्कूल, कॉलेज के बस ड्राइवर औरतें होनी चाहिए। उन्हें ट्रेनिंग देने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के फर्जीवाड़े की जांच सीबीआई को सौंपी गई है। क्या इस फर्जीवाड़े से अभियान की मूलभावना को क्षति पहुंची है?

यह एक बहुत ही अजीब घटना थी। इस देश में तो लहर गिन-गिन के और टेड़ेपन से लोग पैसे बना सकते हैं। किसी फर्जी समूह ने इसे किया था। उन्होंने लोगों से कहा था कि इन फार्म्स को भर दो, तो पैसा मिलेगा। लेकिन हम बार-बार अखबार, टीवी, रेडियो के माध्यम से यह बोलते रहे कि यह गलत फॉर्म्स हैं।

लेकिन ये लोग एक जगह पकड़े जाते तो दूसरी जगह शुरू हो जाता था। हमने सीबीआई को यह इसलिए सौंपा। क्योंकि यह पूरे देश में फैल गया था। मुझे लगता है कि सीबीआई दोषियों को पकड़ेगी। जिन्होंने गरीब लोगों का पैसा लूटा है।

जम्मू-कश्मीर में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेसन के नाम पर पत्थरबाजी में शामिल हो रहे बच्चों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

संदेश तो यही है कि यही समय है। जब बच्चे पढ़-लिखकर अपना भविष्य बना सकते हैं। मैं यह कहना चाहती हूं कि अगर सचमुच मैं आपको बहुत दुख है, पीड़ा है। तो क्या पत्थर फेंकने से वो ठीक हो जाएगा? इस तरह से पत्थरबाजी कर स्कूल, कॉलेजों को बंद करने में जो समय आप लगा रहे हैं।

उससे नुकसान आपका ही हो रहा है। अपने दुख:-दर्द को अगर आप पढ़ाई-लिखायी में लगा देंगे। तो उस जगह को बदल पाएंगे। लेकिन पत्थर फेंकने से न सिर्फ आप अपनी जिंदगी खराब कर रहे हैं। बल्कि उन बच्चों की भी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं, जो पढ़ना चाहते हैं।

क्या नेशनल पॉलिसी फार विमेन महिलाओं की स्थिति में हकीकत में बदलाव ला सकती है?

यह पॉलिसी एक ऐसा दस्तावेज है। जो अगले दस-बीस साल का विजन दिखाता है। अगर पॉलिसी नहीं होती है। तो कुछ भी मंत्री की मर्जी से बन जाता है। लेकिन एक बार जब हम लिख लें कि यह होना चाहिए। तो यह एक दल के घोषणापत्र की तरह हो जाता है। जो किसी भी सूरत में लागू होगा ही। यह नीति किसी एक मंत्रालय के लिए नहीं है।

यह समूची सरकार के रवैये और विचारों को दर्शाती है कि वो महिलाओं के लिए क्या करना चाहती है? इसके लिए बहुत सारे फिल्टर्स का प्रयोग किया गया। पूरे देश से सुझाव मांगे, हजारों सुझाव आए। उन्हें हमने नीति में शामिल किया। इसके बाद मंत्रालयों को सुझाव देने के लिए इसे भेजा।

लेकिन इसके बीच में पीएम ने एक जीओएम बनाया था। जिसमें 11 मंत्री थे। उन्होंने भी देख लिया है। तीन-चार बैठकें भी हो चुकी हैं। अब अंतिम ड्राफ्ट बन गया है। यह फिर से जीओएम को भेजा जाएगा। फिर मंत्रालयों के पास जाएगा और अंत में मंजूरी के लिए कैबिनेट जाएगा। मुझे लगता है कि इस प्रक्रिया में एक महीने का समय और लगेगा।

तीन तलाक के विषय पर महिला मंत्री होने के नाते आपकी क्या राय है?

तीन तलाक पर सरकार ने राय ली है कि इसे धार्मिक आधार पर न देखा जाए। बल्कि औरतों के हितों को इसमें प्राथमिक्ता देनी चाहिए। हर धर्म उस ओर जाता है। जहां सभी एक समान हैं। हर देश में ऐसे कानून बनते हैं, जहां महिला और पुरूषों को एक समान समझा जाए व एक जैसी सुविधा, ताकत व अधिकार दिए जाएं।

तीन तलाक महिलाओं को समानता देने की दिशा में उठाया गया एक कदम मात्र है। लेकिन तीन तलाक के मामले में सरकार कोई निर्णय नहीं ले सकती है। क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और कोर्ट को ही इस पर निर्णय लेना है।

मैरटल रेप को लेकर कब तक कानून बन जाएगा?

-मैरटल रेप का नया कानून नहीं बनेगा। क्योंकि उसके लिए पुराना कानून पहले से है। इस पर किसी महिला ने कोई शिकायत नहीं की है। सवाल यह है कि मैरटल रेप होता है। लेकिन आजतक किसी भी महिला ने अपने पति के खिलाफ पुलिस को शिकायत ही नहीं की है। शिकायतें तलाक के बाद आती हैं।

तलाक के बाद तो मामला सीधा-सीधा बलात्कार का हो जाता है। मुझे लगता है कि शादी टूटने के डर से महिलाएं शिकायत नहीं करती हैं। इस पर हमने भारत के बाहर भी स्थिति जांचने के लिए सर्वे किया था। जिसमें यह तथ्य सामने आया कि दुनिया में भी महिलाओं ने इसे लेकर कोई शिकायत नहीं की है।

जेजे एक्ट के मॉडल रूल्स लागू होने के बाद जघन्य अपराध में शामिल बच्चों को 21 साल के बाद वापस जेल भेजा जाएगा या रिहा कर दिया जाएगा?

अगर वो बाल अपराधी हैं और उन्होंने कोई सामान्य अपराध किया है। तो उन्हें रिहा किया जाता है। लेकिन जघन्य अपराध करने वाले बच्चों को वयस्क होने पर जेल भेजा जाएगा। इसमें कोई अस्पष्टता नहीं है।

सेसुअल हैरसमेंट एट वर्कप्लेस से क्या कामकाजी महिलाएं देश में पूरी तरह से सुरक्षित हुई हैं?

- सेसुअल हेरसमेंट ऑन वर्कप्लेस का कभी किसी ने जिक्र नहीं किया है। हमने एक स्टडी करायी कि कितनी औरतें इससे प्रभावित हैं। इसमें यह पता चला कि 86 प्रतिशत महिलाएं बुलिंग एंड हेरसमेंट का शिकार होती हैं। 58 प्रतिशत महिलाएं जैंडर आधारित भेदभाव का शिकार होती हैं।

इसमें से 1 फीसदी महिलाएं ही शिकायत करती हैं। 67 प्रतिशत महिलाओं के साथ इस तरह का व्यवहार उनकी नौकरी के पहले पांच सालों में होता है। इसके लिए हमने नियम बनाए हैं और सभी जगहों पर इसके लिए जानकारी भी भेजी है। इस तरह के मामलों में हर ऑफिस में एक कमेटी बनाने की बात कही गई है।

अगर कोई हमें ईमेल के जरिए बता दें कि हमारे यहां कमिटी नहीं बनी है। तो हम उन्हें बनाने के लिए कहते हैं। दो साल पहले मैंने वित्त मंत्रालय को लिखा था कि आप जब हर कंपनी की ऑडिट रिपोर्ट लेते हो। तो उस दौरान आप पूछे कि आपने कमिटी बनाई है या नहीं।

सितंबर में हम इस पर बड़ी मुहिम शुरू करेंगे। इसमें देखेंगे कि किन-किन जगहों पर कमिटी बनायी गई है और कहां नहीं बनाई गई है। हम यह भी देख रहे हैं कि एम्प्यॉलर के कहने पर नहीं। बल्कि पीड़ित महिला के कहने पर एम्प्यॉलर द्वारा बैठक बुलायी जाए। यह तो होना ही है और होकर ही रहेगा।

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