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राजपक्षे की जीत: मालदीव के बाद अब श्रीलंका में चीन ने बढ़ाई भारत की चिंता

स्थानीय काउंसिल में महिंदा राजपक्षे की जीत से श्रीलंका में ड्रैगन की दखलअंदाजी बढेगी।

राजपक्षे की जीत: मालदीव के बाद अब श्रीलंका में चीन ने बढ़ाई भारत की चिंता

पड़ोसी देश मालदीव में विपरीत हालात को लेकर भारत में चिंता अभी कम नहीं हुई कि एक अन्य पड़ोसी देश श्रीलंका में उस राजनीतिक शक्ति को बड़ी जीत मिलने जा रही है, जो चीन समर्थक माना जाता है।

श्रीलंका के स्थानीय काउंसिल चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की जीत से वहां चीन की दखल बढ़ने के आसार हैं। चीन के महत्वाकांक्षी समुद्री सिल्क रूट प्रॉजेक्ट में श्रीलंका अहम पड़ाव है।

श्रीलंका में राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की गठबंधन सरकार को भारत समर्थक माना जाता है। सिरिसेना की पार्टी श्रीलंका फ्रीडम पार्टी और विक्रमसिंघे की यूनाइडेट नेशनल पार्टी जनवरी 2015 में सत्ता में आई थी।

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उसके बाद पहली बार लोकल काउंसिल चुनाव हुए हैं, जिन्हें सरकार का पहला टेस्ट माना जा रहा था। इन चुनावों में पूर्व राष्ट्रपति और विपक्षी नेता महिंदा राजपक्षे ने अपनी नई पार्टी एसएलपीपी के साथ वापसी की है।

जिन 139 काउंसिल के नतीजे सामने आए हैं, उनमें एसएलपीपी को 97 स्थानीय निकायों में जीत मिली है। 201 काउंसिल के नतीजे आने बाकी हैं। यूएनपी को महज 18 और श्रीलंका फ्रीडम पार्टी को महज 6 निकाय मिले हैं। बढ़ती महंगाई के बीच सरकार के सुधारों का नतीजा जमीन पर देखने को नहीं मिल सका है।

श्रीलंका में वापस लौटेगी चीन की भूमिका

चुनाव नतीजों से संकेत मिल रहे हैं कि अब श्रीलंका में चीन की बड़ी भूमिका वापस लौटेगी। स्थानीय निकायों में बहुमत मिलने से लोकल काउंसिल के वित्तीय मामलों में राजपक्षे की पार्टी का दखल बढ़ेगा।

इन काउंसिल के इलाकों में विकास के नाम पर चीन से लोन लेने का खेल तेज होगा। राजपक्षे के शासनकाल में श्रीलंका में चीन के सहयोग से कई इन्फ्रास्ट्र्क्चर प्रॉजेक्ट सामने आए, लेकिन इनमें जमकर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे।

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विपक्ष का आरोप है कि राजपक्षे और उनके करीबियों को भारी कमिशन मिला। 2005 में राष्ट्रपति बनने के बाद राजपक्षे 7 बार चीन गए थे,लेकिन 2015 में राजपक्षे की सत्ता जाने के बाद चीन और श्रीलंका के संबंधों में वैसी करीबी नहीं देखी गई।

इसी के बाद चीन ने मालदीव पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी थी और वहां की सरकार को अब चीन के साथ देखा जाता है।

हार के बाद राष्ट्रपति का दल बिखरेगा

माना जा रहा है कि ताजा चुनाव नतीजों के बाद राष्ट्रपति सिरिसेना के इस्तीफे की मांग भी तेज होगी। सिरिसेना 2020 से पहले संसद भंग नहीं कर सकते हैं और राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। लेकिन अनुमान है कि ताजा हार के बाद राष्ट्रपति का दल बिखरेगा।

इस पार्टी में बड़ी संख्या में एेसे लोग हैं, जो दूसरे दलों से आए हैं। श्रीलंका की संसद में 225 की सदस्य संख्या में पीएम की पार्टी के 106 और राष्ट्रपति की पार्टी के 41 सांसद हैं। दोनों के दलों में आपस में भी सिरफुटौव्वल चल रही है। विपक्षी राजपक्षे को 54 सांसदों का समर्थन हासिल है।

संविधान संशोधन के नियम के मुताबिक राजपक्षे फिर से राष्ट्रपति नहीं बन सकते हैं, लेकिन माना जा रहा है कि उनके भाई जी. राजपक्षे राष्ट्रपति पद के लिए दावेदारी पेश कर सकते हैं।

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