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Gandhi Jayanti 2018: एक आदर्श पिता नहीं थे राष्ट्रपिता, जानिए विद्वानों की राय

गांधीजी काफी हद तक रौबदार पिता थे। परिवार से बाहर के लोगों के लिए जहां उनके मन में इतनी संवेदना और चिंता थी, वहीं खुद के पुत्रों की पीड़ा नहीं देखते थे।

Gandhi Jayanti 2018: एक आदर्श पिता नहीं थे राष्ट्रपिता, जानिए विद्वानों की राय

महात्मा गांधी पर लिखने वाले विद्वानों के मुताबिक राष्ट्रपिता एक अभिभावक के रूप में लियो टॉलस्टॉय और मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसे वैश्विक नेताओं की तरह ही थे जिन्होंने देश के लिए अपने परिवार को पीछे छोड़ दिया।

आज गांधीजी की 150वीं जयंती हैं और देश में उन्हें लेकर चर्चा भी चल रही है। इतिहासकार रामचंद्र गुहा और ईरानी-कनाडाई दार्शनिक रामिन जहानबेगलू का मानना है कि गांधीजी आदर्श पिता नहीं थे, वहीं लेखिका संध्या मेहता ने अलग रुख अख्तियार करते हुए उन्हें प्रिय पिता की संज्ञा दी है।

इन तीनों ने ही गांधी पर हाल में किताबें लिखी हैं। मेहता की पुस्तक पिछले साल आई थी वहीं गुहा और जहानबेगलू की पुस्तकें इस साल आई हैं।

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गुहा ने बताया कि गांधीजी काफी हद तक रौबदार हिंदू पिता थे। परिवार से बाहर के लोगों के लिए जहां उनके मन में इतनी संवेदना और चिंता थी, वहीं खुद के पुत्रों की पीड़ा नहीं देखते थे।

गुहा ‘इंडिया आफ्टर गांधी' के बाद उनके जीवन पर अपनी नयी किताब ‘गांधी: द ईयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड, 1914-1948' हाल ही में लेकर आए हैं। तेरह साल की उम्र में कस्तूरबा से शादी करने वाले मोहन दास करम चंद गांधी के चार बेटे हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास थे। गुहा के मुताबिक गांधी के उनके दो सबसे बड़े बेटों खासकर हरिलाल से रिश्ते तनावपूर्ण थे।

इतिहासकार ने अपनी किताब में लिखा है कि ब्रिटेन जाकर बैरिस्टर बनने के हरिलाल के विचार को गांधी द्वारा खारिज किये जाने के बाद दोनों के रिश्ते बिगड़ गये।

उसके बाद तनाव और बढ़ गया जब गांधी ने हरिलाल की उनकी पसंद से शादी नामंजूर करके अपने हिसाब से उनका विवाह कराना चाहा। गुहा ने अपनी किताब में हरिलाल और गांधीजी के रिश्तों में तनाव बढ़ने के और भी वाकये लिखे हैं।

जहानबेगलू की नयी किताब ‘द ग्लोबल गांधी ऐसेज इन कंपेरेटिव पॉलिटिकल फिलॉसफी' में गांधी को ‘जिद्दी' लिखा गया है जो महान नेता हैं लेकिन जरूरी नहीं कि अच्छे पिता भी हों। इससे पहले भी उन्होंने गांधी दर्शन पर किताब लिखी थी।

उन्होंने लिखा है कि गांधीजी के साथ रहना आसान नहीं था। उन्होंने खुद को कभी उस व्यक्ति की तरह नहीं देखा जो केवल पिता या पति हो। उनके जीवन में हमेशा बड़ा उद्देश्य रहा।

लेखक के अनुसार इसलिए उनकी आत्मकथा का शीर्षक ‘मेरे सत्य के प्रयोग' था, ना कि मेरी पत्नी या मेरे बच्चों के साथ मेरे प्रयोग। उनके लिए सत्य अधिक महत्वपूर्ण था। भारत की आजादी उनके लिए किसी भी अन्य चीज से अधिक मायने रखती थी।

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उन्होंने हालांकि तर्क पेश किया है कि इस संदर्भ में गांधी को अलग शख्सियत मानना सही नहीं होगा। लियो टॉलस्टॉय या मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसे महान नेताओं, राजनेताओं या अन्य कलाकारों ने भी इसी तरह अपने राष्ट्र या अपने काम के लिए अपने बच्चों, पत्नी की कीमत पर खुद को कुर्बान कर दिया था।

‘गांधी इन बांबे: टूवर्ड्स स्वराज' लिखने वाली संध्या मेहता ने अलग राय व्यक्त की है और गांधी की छवि प्रिय पिता के रूप में पेश की है। उन्होंने लिखा है कि गांधी और हरिलाल के रिश्ते इसलिए उलझन भरे थे क्योंकि बेटे ने अपने पिता से अलग रास्ता चुना। लेकिन दोनों का प्रेम अंत तक बना रहा।

अपनी बात के समर्थन में मेहता ने गांधीजी द्वारा 18 जून, 1925 को ‘यंग इंडिया' में लिखे एक पत्र को उद्धृत किया है जिसके मुताबिक, 'मैं उसकी (हरिलाल की) गलतियों के बावजूद उसे प्यार करता हूं। जब वह आना चाहेगा, पिता के हाथ उसे गले लगाने के लिए खुल जाएंगे।'

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