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जानिए अभी तक क्यों नहीं मिला महात्मा गांधी को नोबल पुरस्कार

गांधी को नोबेल के शांति पुरस्कार के लिए 5 बार नामित किया गया।

जानिए अभी तक क्यों नहीं मिला महात्मा गांधी को नोबल पुरस्कार
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नई दिल्ली. देश और दुनिया में सत्य और अहिंसा के पुजारी के नाम जाने जाने वाले मोहनदास करम चंद गांधी कौन हीं जानता है। दुनिया का हर पुरस्कार गांधी जी को मिला। लेकिन अभी तक बापू को नोबल शांति पुरस्कार से नहीं नवाजा गया है। पुरी दुनिया में सत्य और अहिंसा का प्रसार किया और शांति का संदेश दिया। बता दें कि अगले दो हफ्तों में नोबेल पुरस्कारों की घोषणा होने वाली है। नोबेल पुरस्कारों के जनक अल्फ्रेड नोबेल चाहते थे कि इस पुरस्कार से ऐसे लोगों का सम्मान किया जाए जिनके आविष्कार और काम की वजह से समाज में महान परिवर्तन आया हो।
मीडिया की खबरों के मुताबिक, गांधी को नोबेल के शांति पुरस्कार के लिए 5 बार नामित किया गया। लेकिन उन्हें कभी यह पुरस्कार नहीं दिया गया। शांति पुरस्कार समिति भी यह बात स्वीकार कर चुकी है कि महात्मा गांधी को शांति पुरस्कार नहीं देना एक चूक थी। साल 1989 में महात्मा गांधी की मौत के 41 साल बाद बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा को शांति पुरस्कार देते हुए नोबेल समिति के चेयरमैन ने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी थी।
लोगों के दिमाग को समझना और उसे सही दिशा देना उस समय एक अच्छा आविष्कार माना गया और साल 1949 का मेडिसिन पुरस्कार पुर्तगाल के वैज्ञानिक एनटोनियो एगा मोनिज़ को लोबोटॉमी के आविष्कार के लिए दिया गया। लोबोटॉमी में दिमागी बीमारी के इलाज के लिए बनाया गया था। 40 के दशक में इलाज का यह तरीका काफी प्रचलित हुआ, अवॉर्ड सेरेमनी में लोबोटॉम को 'मनोचिकित्सा के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण आविष्कारों में से एक' कहा गया। हालांकि, बाद में इसके गंभीर परिणाम देखे गए। कुछ मरीजों की मौत हो गई, कईयों का दिमाग बुरी तरह से डैमेज हो गया। यहां तक कि जिन ऑपरेशनों को सफल कहा गया, उनमें भी मरीज़ मानसिक रूप से निष्क्रिय हो गए। 50 के दशक में लोबोटॉमी का उपयोग बहुत कम हो गया।
साल 1918 में फ्रिट्ज़ हर्बर को अमोनिया से नाइट्रोजन और हाइड्रोजन गैस बनाने के लिए कैमिस्ट्री पुरस्कार दिया गया। इस तरीके को उर्वरक तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, जिससे कृषि के क्षेत्र में काफी बदलाव भी आया। लेकिन चयन समिति ने इस बात को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हर्बर ने कैमिकल हमलों में जर्मनी की मदद की थी। उन्होंने बेल्जिम पर 1915 में हुए क्लोरिन गैस अटैक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसमें हजारों लोगों की मौत हो गई थी।
पहली बार नॉर्वे के एक सांसद ने उनका नाम सुझाया था लेकिन पुरस्कार देते समय उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया. उस समय के उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि नोबेल कमेटी के एक सलाहकार जैकब वारमुलर ने इस बारे में अपनी टिप्पणी लिखी है। उन्होंने लिखा है कि वह अहिंसा की अपनी नीति पर हमेशा क़ायम नहीं रहे और उन्हें इन बातों की कभी परवाह नहीं रही कि अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ उनका अहिंसक प्रदर्शन कभी भी हिंसक रूप ले सकता है।
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