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गांधी जयंती स्पेशल: महात्मा गांधी जी के बारे में क्या सोचती हैं पोती इला गांधी ?

गांधी जयंती 2018 महात्मा गांधी समस्त भारतवासियों के लिए पितातुल्य और पूज्यनीय हैं। लेकिन स्वयं उनके वंशज उन्हें कैसे याद करते हैं, उनके विचारों से कितने प्रभावित हैं, उनकी विचारधारा और दर्शन को आज के संदर्भ में कैसे देखते हैं? प्रस्तुत है, उनकी पौत्री इला गांधी के विचार।

गांधी जयंती स्पेशल: महात्मा गांधी जी के बारे में क्या सोचती हैं पोती इला गांधी ?

2 अक्टूबर 2018 के के दिन महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती है। इला गांधी का मानना है कि गांधीजी का जन्म महात्मा के रूप में नहीं हुआ था। आज लोग उन्हें देवता मानते हैं, लेकिन वह भी इंसान थे, हम सबकी तरह। उनके विचारों और सत्यनिष्ठ कर्म ने उन्हें महान बनाया। वह दक्षिण अफ्रीका में अनेक पूर्वाग्रहों के साथ आए थे। उनमें यह परिवर्तन आना यहीं से शुरू हुआ।

वह सूट-टाई पहनकर आए थे, लेकिन साधारण कपड़ों में लौटे। मैं 7 वर्ष की थी, जब उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी। मैं अपने पैरेंट्स के साथ 1946-47 में भारत आई थी। मैंने तीन माह सेवाग्राम आश्रम में गुजारे थे। उस दौरान वे हमारे साथ प्रतिदिन एक घंटा गुजारते और हमें बहुत-सी कहानियां सुनाते। वह उस समय बहुत व्यस्त थे और उदास भी क्योंकि हिंदू मुस्लिम दंगे हो रहे थे।

उस समय तक विभाजन का फैसला हो चुका था और संविधान गठन पर चर्चा चल रही थी। अपने व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने हमारे लिए समय निकाला और जब दिसंबर 1947 में हम वापस लौटे तो जनवरी तक उन्होंने मुझे दो खत लिखे थे। एक सात साल की बच्ची को खत लिखने का यह अर्थ है कि उन्हें अपने पोती-पोतियों में दिलचस्पी थी।

जब वह हमसे बात करते थे तो हम पर पूरा ध्यान देते थे। वे बेकार की बातें नहीं करते थे, हमेशा अर्थपूर्ण चर्चा करते थे। उस उम्र में भी उनकी दो शिक्षाओं से मैं प्रेरित हुई थी- सत्य और पश्चाताप। 1948 में जब हम डरबन में फीनिक्स सेटलमेंट में रहते थे, वो गन्ने के खेतों से घिरा हुआ था। जब हम भारत से लौटे तो एक दिन मैं घर पर अकेली थी, पैरेंट्स बाहर गए हुए थे।

तभी लोगों की एक भीड़ मेरे पास आई। हमारे घर के सामने वाले पेड़ पर एक जंगली बिल्ली थी और एक किसान को डर था कि वह उसकी मुर्गियों को खा लेगी। वह बिल्ली को मारना चाहता था, लेकिन सेटलमेंट में बंदूक चलाने की अनुमति नहीं थी। उसने मुझसे इजाजत मांगी और मैंने भी हामी भर दी क्योंकि उन्होंने मुझसे कहा था कि जंगली बिल्ली मुझे भी काट लेगी, इसलिए मैं भी डरी हुई थी।

उन्होंने जंगली बिल्ली को मार दिया। जब मेरे पैरेंट्स लौटे तो मैंने उन्हें पूरा किस्सा बताया। मेरी मां ने बापू के कहे अनुसार मुझसे कहा कि मैंने बिल्ली को मारने की अनुमति गलत दी। मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ और मैं रोने लगी। मां ने मुझसे कहा कि मैं रोने की बजाय ईश्वर से क्षमा मांगू और फिर कभी ऐसी गलती न करूं। इस तरह उस छोटी उम्र में भी मैंने बापू की प्रेरणा से अपने तौर पर कई दिन का व्रत रखना तय किया।

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