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महाराष्ट्र मराठा आरक्षण आंदोलन: आखिर यह हिंसा क्यों..?, जानिए पूरी कहानी

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन का हिंसक होना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह शर्मनाक भी है और निंदनीय भी। इससे आंदोलनकारियों की कमजोरी उजागर होती है। उनका हिंसा पर उतारू होना आंदोलन की गरिमा को गिराता है।

महाराष्ट्र मराठा आरक्षण आंदोलन: आखिर यह हिंसा क्यों..?, जानिए पूरी कहानी

महाराष्ट्र मराठा आरक्षण आंदोलन का हिंसक होना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह शर्मनाक भी है और निंदनीय भी। इससे आंदोलनकारियों की कमजोरी उजागर होती है। उनका हिंसा पर उतारू होना आंदोलन की गरिमा को गिराता है। आंदोलन कोई भी हो, शांतिपूर्ण होना चाहिए। बड़ा सवाल है कि आखिर यह हिंसा क्यों, किस लिए व किसके लिए?

क्या कोई मांग मनवाने का रास्ता हिंसा ही बचा है? अपने ही लोगों को मार कर और अपने ही देश की संपत्ति जला कर हम कैसा आंदोलन कर रहे हैं, क्या संदेश दे रहे हैं? चिंता की बात है कि यह केवल महाराष्ट्र की स्थिति ही नहीं है, कमोबेश पूरे देश की है। हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हिंसा हुई थी और सरकारी व निजी संपत्तियों को जलाया गया था।

गुजरात में पाटीदार आरक्षण आंदोलन, आंध्र प्रदेश में कापू समुदाय का आरक्षण आंदोलन और राजस्थान में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौरान भी हिंसक प्रदर्शन देखने को मिला था। दरअसल इस वक्त देश में जाट, मराठा, गुर्जर, पाटीदार और कापू समुदाय के लोग ओबीसी कैटेगरी में सरकारी नौकरियों और शिक्षा में कोटे की मांग कर रहे हैं।

महाराष्ट्र में आंदोलनकारी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत मराठा समुदाय के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 16 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहे हैं। दूसरे राज्यों में भी ऐसी ही मांगें हैं। लेकिन संविधान व सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों के आलोक में इस मसले को देखें तो तकनीकी तौर पर ऐसा आरक्षण देना सरकार के लिए संभव नहीं है।

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में लंबित है। हरियाणा में भी जाट आरक्षण का मामला हाईकोर्ट में है। दरअसल, ओबोसी श्रेणी में नई जातियों को शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को संविधान संशोधन कर नौवीं अनुसूची में विस्तार करना होगा। वर्तमान जो जातियां ओबीसी श्रेणी में शामिल हैं, व नहीं चाहतीं कि इस श्रेणी में नई जातियां शामिल हों।

खास बात यह भी है कि अभी जो जातियां कोटे की मांग कर रही हैं, वे एक तो अपने-अपने राज्य में बहुसंख्यक समुदाय हैं और दूसरी उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर है। ऐसे में केंद्र सरकार के लिए उन्हें ओबीसी श्रेणी में शामिल करना आसान नहीं है, कारण तब उनके समकक्ष के यादव, अहिर जैसे कई अन्य समुदाय भी खुद को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने की मांग करेंगे।

दूसरी अहम बात है कि अगर दबाव में आकर सरकार ने नई जातियों को ओबीसी में शामिल किया तो ओबीसी समुदाय चुप नहीं बैठेंगे। इस तरह देश में जातिगत आंदोलन की बाढ़ आएगी। इतना ही नहीं इससे देश में जातिगत वैमनष्यता भी बढ़ेगी व सामाजिक विभाजन और गहरा होगा। आरक्षण की मांग को हवा के लिए इसको लेकर की जा रही राजनीति भी जिम्मेदार है।

वोट बैंक की राजनीति के चलते पार्टियों द्वारा अनाप-शनाप वादे करने के चलते ऐसी बेकाबू स्थितियां पैदा हो रही हैं। एक तो सभी राजनीतिक दलों को संजीदा होना चाहिए और वोट बैंक के लिए देश में सामाजिक दरार पैदा नहीं करना चाहिए। दूसरी, सरकार को आरक्षण पर अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए व जरूरी हो तो आरक्षण देने के मौजूदा प्रावधान की समीक्षा की जानी चाहिए।

आरक्षण पर लगातार बढ़ रहे विवादों के चलते देश में सामाजिक ऑडिट किया जाना चाहिए। यह वक्त आरक्षण के दायरे को घटाने और इसके पैटर्न को बदलने का है। अगर सरकार के लिए संभव हो तो आरक्षण का आधार आर्थिक करना चाहिए और एक परिवार को एक ही बार आरक्षण का लाभ लेने की सीमा निर्धारित करनी चाहिए।

राज्य सरकारों पर भी वोट बैंक के लिए जातिगत आरक्षण देने की घोषणा पर रोक लगनी चाहिए। आरक्षण का निधार्रण केवल और केवल केंद्र सरकार द्वारा ही किया जाना चाहिए। आंदोलनकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा नहीं हो और संपत्तियों को नुकसान नहीं पहुंचे। बर्बाद करके देश आबाद नहीं किया जा सकता है।

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