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AIADMK को बड़ी राहत, टीटीवी दिनाकरन के वफादार 18 विधायकों पर मद्रास हाई कोर्ट का खंडित फैसला

अदालत ने व्यवस्था दी कि मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी के बाद सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश उस न्यायाधीश को चुनेंगे जो इस मामले की नये सिरे से सुनवाई करेंगे।

AIADMK को बड़ी राहत, टीटीवी दिनाकरन के वफादार 18 विधायकों पर मद्रास हाई कोर्ट का खंडित फैसला
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अन्नाद्रमुक को आज उस समय बड़ी राहत मिली जब मद्रास उच्च न्यायालय ने अन्नाद्रमुक के हाशिये पर पहुंचे नेता टीटीवी दिनाकरन के वफादार 18 विधायकों को अयोग्य ठहराने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बंटा हुआ फैसला सुनाया।

इस निर्णय के चलते तमिलनाडु में सत्ता के गलियारों में स्थिति यथावत रहेगी। अदालत ने व्यवस्था दी कि मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी के बाद सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश उस न्यायाधीश को चुनेंगे जो इस मामले की नये सिरे से सुनवाई करेंगे।

मुख्य न्यायाधीश ने 200 पृष्ठों के अपने आदेश में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को सही ठहराया। उन्होंने कहा कि मेरे विचार में विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण भले ही कल्पना से परे हो किंतु यह संभव है। मैं इस बात को नहीं मान सकता कि यह निर्णय किसी भी तरह अतार्किक, असंगत या विकृत है।

न्यायमूर्ति एम सुन्दर ने अपने 135 पृष्ठों के आदेश में असहमति जताते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष पी धनपाल के आदेश को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को लागू नहीं किये जाने तथा निहित स्वार्थों एवं संवैधानिक आदेश के उल्लंघन के आधार पर खारिज किया जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जब तक तीसरे न्यायाधीश इन याचिकाओं पर अपना आदेश नहीं सुना देते, स्थिति यथावत रहेगी। आज के आदेश से पलानीस्वामी सरकार को व्यापक राहत मिलेगी। यदि अयोग्य ठहराये गये विधायकों की सदस्यता बहाल हो जाती तथा यदि वे विपक्षी द्रमुक-कांग्रेस-आईयूएमएल के साथ हाथ मिला लेते तो सरकार के समक्ष बहुमत गंवाने का खतरा उत्पन्न हो सकता था।

विपक्षी गठबंधन के पास 234 सदस्यीय विधानसभा में 96 विधायक हैं। ऐसी स्थिति में विपक्ष का संख्याबल बढ़कर 117 हो जाता जिसमें एक मात्र निर्दलीय विधायक दिनाकरन भी शामिल हैं। अन्नाद्रमुक के पास भी 117 सदस्य हैं जिनमें विधानसभा अध्यक्ष भी शामिल हैं।

विधानसभा अध्यक्ष के आदेश को सही ठहराते हुए मुख्य न्यायाधीश बनर्जी ने ध्यान दिलाया कि याचिकाकर्ताओं को शुरू में सात दिनों का समय दिया गया था और उसके बाद उनके अनुरोध पर उनका पक्ष सामने रखने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया गया।

अयोग्यता नियमों के तहत नियम 7 का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है, जैसा कि विधायक दावा कर रहे हैं। प्राकृतिक न्याय से वंचित किए जाने के याचिककार्ताओं के दावे पर बनर्जी ने कहा कि उन्हें विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रखने को कहा गया था और यह भी सूचित किया गया था कि ऐसा नहीं होने की स्थिति में वह एकतरफा निर्णय करेंगे।

किंतु विधायक उपस्थित नहीं हुए, इसलिए वह अन्य पक्ष की सुनवाई नियम के उल्लंघन की दुहाई नहीं दे सकते हैं। संवैधानिक प्रक्रिया (मुख्यमंत्री को बदलने के लिए) शुरू करने के लिए 18 विधायकों द्वारा राज्यपाल को पत्र सौंपे जाने का कृत्य क्या दल बदल के तहत आता है, इस मुद्दे पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि निर्णय के गुण दोष की कानूनी समीक्षा करना अदालत का काम नहीं है।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि बीएस येदियुरप्पा एवं अन्य के मामले में इसी प्रकार के शब्दों वाले पत्र को अयोग्यता के लिए अनुपयुक्त करार दिया गया था। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने सर्वोच्च अदालत की व्यवस्थाओं का विस्तार से उल्लेख किया और कहा कि कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन होने के आधार पर खारिज कर दिया गया था।

यदियुरप्पा मामले का हवाला देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उस मामले में विधायकों को उनका पक्ष रखने का समुचित मौका नहीं दिया गया। इस मामले में मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत करने वाले 13 विधायकों की अयोग्यता को खारिज कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति बनर्जी ने कहा कि लिहाजा विधानसभा अध्यक्ष द्वारा दिये गये आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हालांकि न्यायमूर्ति सुन्दर ने कहा कि यदि विधानसभा अध्यक्ष ने याचिकाकर्ताओं की जिरह करने और मौखिक साक्ष्य का अवसर प्रदान करने के अनुरोध को मान लिया होता तो पूरे विवाद का ही पटाक्षेप हो जाता।

उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा विभिन्न मामलों में संदर्भित मामलों से संबंधित कानूनों के कुल सिद्धान्तों की यदि सावधानी से समीक्षा की जाए तो वह इस बात से संतुष्ट है कि भले ही विचाराधीन आदेश कानूनी रूप से सही हो किंतु निहित स्वार्थ के कारण यह खारिज किए जाने योग्य है।

न्यायमूर्ति सुंदर ने कहा, ‘मैं सम्मानपूर्वक कहना चाहता हूं कि मैं मुख्य न्यायाधीश की राय से असहमत हूं तथा विधानसभा अध्यक्ष द्वारा दिये गये आदेश को खारिज करता हूं।'

इस बंटे हुए आदेश पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दिनाकरन ने कहा कि वह इससे असंतुष्ट हैं। उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि इसने तमिलनाडु की जन विरोधी सरकार को 2-3 माह का विस्तार दे दिया है। दिनाकरन ने अन्नाद्रमुक में हाशिये पर पहुंच जाने के बाद हाल में अम्मा मक्काल मुनेत्र कझगम बनायी है।

द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष एवं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष एम के स्टालिन ने कहा, ‘ऐसे समय में जब की लोकतंत्र की रक्षा के लिए लोगों की उम्मीदें न्यायपालिका पर टिकी हों, स्पष्ट, न्यायपूर्ण और त्वरित निर्णय आना चाहिए।' उन्होंने एक ट्वीट में कहा, ‘न्याय में विलंब न्याय से वंचित करना है।'

अन्नाद्रमुक के प्रवक्ता ने वेगाई चेलवान ने कहा कि पार्टी को उम्मीद है कि जब तीसरे न्यायाधीश मामले की सुनवाई करेंगे तो न्याय किया जाएगा।

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