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फिल्म के नाम का केवल रजिस्ट्रेशन उस पर अधिकार की गारंटी नहीं: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी फिल्म के नाम का केवल पंजीकरण उस पर अधिकार की गारंटी नहीं देगा यदि पंजीकरण के डेढ़ वर्ष के भीतर फिल्म के प्रोडक्शन का काम शुरू नहीं होता है।

फिल्म के नाम का केवल रजिस्ट्रेशन उस पर अधिकार की गारंटी नहीं: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी फिल्म के नाम का केवल पंजीकरण उस पर अधिकार की गारंटी नहीं देगा, यदि पंजीकरण के डेढ़ वर्ष के भीतर फिल्म के प्रोडक्शन का काम शुरू नहीं होता है।

अदालत ने यह बात फिल्म ‘कारू' के नाम पर लाइका प्रोडक्शंस की ओर से दायर एक दावा याचिका स्वीकार करते हुए कही। मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति अब्दुल कुदहोस की एक पीठ ने यह भी कहा कि ‘‘नाम का कॉपीराइट नहीं है' बल्कि पूरा काम है जो कि कॉपीराइट से संरक्षित है।

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जे एस स्क्रींस के जे मणिमारन ने नाम ‘कारू' के स्वामित्व का दावा करते हुए उच्च न्यायालय में अर्जी दायर की और अदालत से अनुरोध किया कि वह लाइका प्रोडक्शंस को उनके नाम ‘कारू' के कॉपीराइट का उल्लंघन करने से रोके जिसे उन्होंने नवम्बर 2011 में पंजीकृत कराया था।

20 फरवरी को एकल न्यायाधीश ने आदेश पारित करके लाइका प्रोडक्शन कंपनी को नाम का इस्तेमाल करने से रोक दिया। बाद में लाइका ने वर्तमान अपील दायर की।

गुरूवार को मामला सुनवायी के लिए आने पर प्रथम पीठ ने कहा कि उसके समक्ष पेश की गई सामग्री यह दिखाती है कि मणिमारन ने ‘कारू' नाम के लिए पूजा नौ सितम्बर 2013 को की थी जिसे उन्होंने 2011 में पंजीकृत कराया था।
पीठ ने कहा कि आमतौर पर प्रोडक्शन काउंसिल के साथ पंजीकरण केवल एक वर्ष के लिए अधिकार प्रदान करता है और उसके बाद छह महीने की छूट अवधि मिलती है।
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