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लोकसभा चुनाव 2019: कश्मीर की सियासत में कितने अहम हैं कश्मीरी पंडित, आसान नहीं वोट करना, जानें पूरा गणित

जम्मू कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का मुद्दा आज का नहीं है बल्कि दशकों से चला आ रहा है। साल 1990 के बाद से घाटी में पाक आतंकियों के आतंक से परेशान होकर घाटी से इनका पलायन शुरू हुआ। लेकिन अब जो बचे हैं वो राज्य की सियासत में अहम भूमिका निभा रहे हैं और विस्थापित कश्मीरी भी। इसका प्रभाव देश की सियासत में हमेशा देखा जा सकता है।

लोकसभा चुनाव 2019: कश्मीर की सियासत में कितने अहम हैं कश्मीरी पंडित, आसान नहीं वोट करना, जानें पूरा गणित
जम्मू कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का मुद्दा आज का नहीं है बल्कि दशकों से चला आ रहा है। राज्य हो या देश के चुनाव दोनों में ही कश्मीरी पंडितों का जिक्र ना हो ऐसा हो नहीं सकता। लोकसभा चुनाव 2019 में एक बार फिर विस्थापित कश्मीरी पंडितों का मुद्दा छिड़ गया है। कश्मीर घाटी में रहने वाले हिंदुओं को कश्मीरी पंडित या कश्मीरी ब्राह्मण कहा जाता है। लेकिन साल 1990 के बाद से घाटी में पाक आतंकियों के आतंक से परेशान होकर घाटी से इनका पलायन शुरू हुआ। लेकिन अब जो बचे हैं वो राज्य की सियासत में अहम भूमिका निभा रहे हैं और विस्थापित कश्मीरी भी। इसका प्रभाव देश की सियासत में हमेशा देखा जा सकता है।

आईए समझते हैं कश्मीरी पंडितों की सियासत का गणित

कश्मीरी पंडितों का मुद्दा

कश्मीर घाटी में पाकिस्तान आतकंवादियों की एंट्री के बाद से आज तक कश्मीरी पंडित वहां हो रहे खूनी खेल का दंश हजारों लोग झेल रहे हैं। यहां मचे आतंकवाद के बाद से 4 लाख लोगों को घर और अपनी संपत्ति छोड़कर भागना पड़ा। जिसके बाद कश्मीर ही नहीं देश की राजनीति में कश्मीरी पंडितों का जिक्र होता है। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों में कश्मीरी पंडितों का मुद्दा हमेशा रहा है। वहीं विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने हमेशा वापसी का मुद्दा उठाया तो वहां भी सियासत दिखी।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर घाटी में लोकसभा की तीन सीटे हैं जिनपर 10 हजार से ज्यादा विस्थापित कश्मीरी पंडित हैं। जो अपने मतदान का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन हमेशा पाकिस्तान समर्थक बयानों के चलते वो अपने वोट का इस्तेमाल विरोध में कर सियासी गणित को घुमा दिया करते हैं। वैसे त्रीनगर-अनंननाग सीट पर कश्मीरी पंडितों का दबदबा है और घाटी में कम वोटिंग होने की स्थिति में यह वोट काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। क्योंकि इस सीट पर 80 हजार विस्थापित कश्मीरी पंडित हैं तो वहीं बारामुला-कुपवाड़ा लोकसभा सीट पर 24 हजार मतदाता हैं।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार आसिफ कुरैशी कश्मीर पंड़ितों को लेकर बताया कि 1989 में कश्मीर के हालात अलग थे। उस वक्त इनकी सख्या ज्यादा नहीं थी तो ज्यादा वोट प्रतिशत पर असर नहीं था। लेकिन आतंकी हिंसाओं के बाद से विस्थापित कश्मीरी पंडित हर उम्मीदवार के लिए काफी अहम हो जाते हैं। हर उम्मीदवार इनके दरवाजे पर आकर वोट मांगता है।

वोटर लिस्ट से गायब होते कश्मीरी पंडित

राज्य में विस्थापित कश्मीरी पंडितों की बात करें तो वो वोटर लिस्ट से धीरे धीरे गायब हो रहे हैं। इसका कारण पहला ये है कि वहां पर मतदाताओं के लिए किसी विशेष तरह का अभियान नहीं चलाया गया है। दूसरा, अगर मतदाता सूची में कोई गलती होती हैं तो उसे ठीक करवाने में ही एक लंबा वक्त बीत जाता है। किसी के वोटर कार्ड में नाम गलत है तो किसी के नाम की स्पेलिंग गलती है, वहीं किसी के मां बाप का नाम सही नहीं है। किसी ने दूसरी शादी कर ली तो उसकी पत्नी का नाम वोटर लिस्ट में चढ़ा ही नहीं है। कह सकते हैं कि मतदाता सूची से विस्थापित कश्मीरियों को सुनियोति तरीके से बाहर निकाला जा रहा है। जिससे कश्मीर के विस्थापितों को राज्य से दूर किया जा रहा है। जिससे कश्मीरी पंडितों का वोट प्रतिशत कम हो रहा है। जिसका वोट इस्लाम और अलगाववाद के नाम पर दिया जा रहा है।

राजनीतिक दलों ने कश्मीरी पंडितों को रखा दूर

कश्मीरी पंडितों के वोट को राज्य के राजनीतिक दल बखूबी जानते हैं। ऐसे में में सवाल उठता है कि यहां किसी भी राजनीतिक दलों ने बीते 30 सालों में यहां से कोई भी कश्मीरी पंडित उम्मीदवार नहीं उतारा है। लेकिन हमेशा चुनाव के दौरान पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस, कांग्रेस, कश्मीरी पंडितों के साथ भाईचारे का नारा देती हैं। लेकिन उनको अपने से दूर भी रखती है।

कश्मीरी पंडितों के लिए दो फार्म का नियम

कश्मीर में पंडितों को वोट डालना इतना आसान हीं है जितना की भारत के अन्य राज्यों में हैं। यहां पर एम फॉर्म और 12सी फार्म हर बार भरा जाता है। इन दो फार्म के नहीं भरने पर आप मतदान से दूर रहेंगे। या दोनों में से एक भी भरते हैं तो भी आप मतदान करने से दूर रहेंगे। एम-फार्म का मतलब है कि मैं मतदान में हिस्सा लेने की इच्छा जताता हूं। तो वहीं दूसरी तरफ 12सी- फार्म इसलिए कि मैं मतदान केंद्र में मतदान करुंगा या पोस्टल बैलेट से मतदान करूंगा। आप कह सकते हैं कि यह दोनों फार्म कश्मीरी पंडितों को मतदान का अधिकार देने के लिए नहीं बल्कि उन्हें वोट करने से रोकने का काम करते हैं।

कैसे कर सकते हैं वोट

जम्मू कश्मीर में वोट डालने से पहले आपको यह दोनों फार्म भरने जरूरी हैं तो वहीं मतदान पर्ची में कुछ गलती ना हो इसका भी आपको पहले से ही ध्यान रखना होगा। इसके अलावा जम्मू, उधमपुर और दिल्ली में कई रिलीफ कैंप हैं जहां पर जाकर विस्थापित मतदाता अपने मत का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए भी आपको यह एम और 12सी फॉर्म भरना होगा और वहां पर स्वंय आपको निर्वाचन अधिकारी के सामने उपस्थित होना होगा। इसके बाद मतदाता सूची में आपके नाम की जांच की जाएगी उसके बाद ही आप मतदान कर सकते हैं।
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