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लोकसभा चुनाव 2019 : एक युग का विदाई काल, देखें पूरी लिस्ट

यह आम चुनाव 75 या उससे अधिक उम्र पार कर चुके नेता के लिए राजनीति से विदाई काल जैसे है। 75 पार नेताओं में कई ऐसे हैं जो लंबे समय तक भारतीय राजनीति की धुरी बने रहे, उनमें से अधिकांश अब उम्र के उस मुकाम पर पहुंच गए हैं कि अगला चुनाव लड़ना तो दूर, उसमें कोई भूमिका भी शायद ही निभा पाएं। इनमें से कई तो ऐसे हैं, जो मौजूदा राजनीति में अप्रासंगिक हो चले हैं। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि एक पीढ़ी जा रही है और दूसरी पीढ़ी उसका स्थान ले रही है।

लोकसभा चुनाव 2019 : एक युग का विदाई काल, देखें पूरी लिस्ट

पचहत्तर पार के बहुत से नेताओं की इस लोकसभा चुनाव में सक्रिय राजनीति से विदाई होती दिखाई दे रही है। भाजपा के पितृ पुरुष 91 वर्षीय लाल कृष्ण आडवाणी के स्थान पर गांधी नगर से अमित शाह को टिकट दिया गया। पिछली बार बनारस के बजाय कानपुर से लड़ने और जीतने वाले 85 वर्षीय डा. मुरली मनोहर जोशी ने भी चुनाव लड़ने की अनिच्छा व्यक्त कर दी है। कांगड़ा हिमाचल से पिछली बार चुने गए 85 वर्षीय पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के बारे में भी ऐसी ही सूचना है। उन्होंने भी चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है। अटल सरकार में सड़क एवं परिवहन मंत्री रहे 84 वर्षीय बीसी खंडूरी को भी अबकी बार टिकट नहीं दिया गया है। बिहार से आने वाले बुजुर्ग नेता 79 वर्षीय हुकुम देव नारायण यादव के स्थान पर उनके सुपुत्र अशोक यादव को टिकट दिया गया है।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री 76 वर्षीय भगत सिंह कोशियारी को भी इस बार टिकट नहीं मिला है। झारखंड के बुजुर्ग भाजपा नेता और पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष 82 वर्षीय करिया मुंडा को भी सत्रहवीं लोकसभा के लिए टिकट नहीं मिला है। पूर्व वित्त मंत्री 81 वर्षीय यशवंत सिन्हा मोदी-शाह की लगातार आलोचनाएं करके पहले ही भाजपा की राजनीति में अलग थलग हो चुके हैं। 72 वर्षीय शत्रुघ्न सिन्हा को भी पार्टी ने इस बार पटना साहिब सीट से टिकट न देकर बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया है।

वहां से 64 वर्षीय केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद भाजपा के प्रत्याशी होंगे। शत्रुघ्न सिन्हा मोदी सरकार में मंत्री नहीं बनाए जाने से इस कदर चिढ़ गए थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री की खुली आलोचना शुरू कर दी थी। वह कभी लालू के साथ, कभी केजरीवाल के साथ, कभी ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आते थे। अब सुनते हैं कि कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने जा रहे हैं। सोलहवीं लोकसभा की स्पीकर सुमित्रा महाजन भी 75 की आयु पार कर चुकी हैं। उनके बारे में भी इसी तरह की खबरें आ रही हैं। वह इंदौर से चुनकर आती रही हैं।

पता चला है कि संघ की उस नीति पर कड़ाई से अमल किया जा रहा है, जिसमें पचहत्तर पार नेताओं के स्थान पर नए नेतृत्व को तरजीह देने को कहा गया है। यही नियम कलराज मिश्र पर भी लागू होता है, जो अब सत्ततर के हो चले हैं। राजस्थान के गर्वनर कल्याण सिंह 87 साल के हैं और अब सक्रिय राजनीति से अलग हैं। लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर चमकते रहे छोटे-बड़े दलों के कई दूसरे नेताओं के लिए भी यह लोकसभा चुनाव अंतिम साबित हो सकते हैं।

इनमें से कई ऐसे हैं, जो अपनी राजनीतिक विरासत आने वाली पीढ़ी को सौंप चुके हैं। कुछ सौंपने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। अखिलेश यादव जैसों ने जबरन अपने बड़ों को किनारे लगा दिया है। 79 वर्षीय मुलायम सिंह यादव हो सकता है, ये चुनाव लड़ लें लेकिन सब जानते हैं कि अब समाजवादी पार्टी में उनकी मर्जी से फैसले नहीं हो रहे। महाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार भी 78 को पार कर चुके हैं। वह चुनावी राजनीति से हटने का ऐलान पहले ही कर चुके हैं। उनकी राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने वाली उनकी बेटी सुप्रिया सुले और पोते पार्थ पवार चुनाव मैदान में होंगे।

पंजाब हरियाणा की बात करें तो पंजाब के 91 वर्षीय बुजुर्ग अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल केन्द्रीय राजनीति से हमेशा ही दूर रहे हैं। वह भी उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जब लोकसभा चुनाव लड़ने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। पहले की अपेक्षा राज्य की राजनीति में भी वह अब बहुत सक्रिय नहीं हैं। अपने सुपुत्र सुखबीर सिंह बादल को अपनी सरकार में उप मुख्यमंत्री बनाकर काफी समय पहले उन्हें अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने के संकेत दे चुके हैं।

जहां तक हरियाणा का सवाल है, कभी इस प्रदेश की राजनीति देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल के इर्द-गिर्द घूमती थी। अब वह तीनों नहीं रहे। देवीलाल के सुपुत्र ओमप्रकाश चौटाला भी 84 साल के हो चुके हैं। इस समय जेबीटी भर्ती घोटाला मामले में दस साल की सजा भुगत रहे हैं। भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की उम्र भी 71 साल की हो चुकी है। काफी जद्दोदहद के बाद उन्हें चुनाव अभियान समिति क का संयोजक जरूर बनाया गया है परंतु वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। उनके तीन बार के सांसद सुपुत्र दीपेन्द्र सिंह हुड्डा ही इस बार फिर रोहतक से कांग्रेस के प्रत्याशी होंगे।

तमिलनाड़ु में जे जयललिता और एम करुणानिधि के नहीं रहने के बाद यह पहला आम चुनाव है, जो उनकी गैर-मौजूदगी में होने जा रहा है। जे जयललिता की राजनीतिक विरासत को लेकर झगड़ा और खींचातानी चल रही है, जबकि करूणानिधि स्टालिन को उत्तराधिकारी घोषित करके गए हैं। कर्नाटक में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री 76 साल के बीएस येदियुरप्पा शायद ही लोकसभा चुनाव लड़ें। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवैगोड़ा 85 साल के हैं । इस उम्र में चुनाव लड़ना और जनता के बीच सक्रिय रहना आसान नहीं है परंतु उन्होंने चुनाव न लड़ने के संकेत अभी तक नहीं दिए हैं।

कांग्रेस की बात करें तो यहां बुजुर्ग नेताओं की लंबी फेहरिश्त है। जिनमें 86 साल के डा. मनमोहन सिंह से लेकर 90 साल के मोतीलाल वोरा और 76 साल की अंबिका सोनी से लेकर 78 वर्ष के ए के एंटनी तक शामिल हैं। लेकिन लगता नहीं कि 72 साल की सोनिया गांधी के अलावा सत्तर पार के कोई और नेता लोकसभा चुनाव के मैदान में दिखाई देंगे। सोनिया भी स्वास्थ्य कारणों से पिछले कई साल से चुनाव प्रचार कार्य से दूरी बनाए हुए हैं। सत्तर साल के लालू यादव चारा घोटाले में सजा भुगत रहे हैं और इस समय जेल में हैं।

लिहाजा उनके चुनाव लड़ने और लोकसभा पहुंचने का सवाल ही नहीं उठता है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला की उम्र भी कम नहीं है। वह 81 साल के हैं परंतु उनके फिर मैदान में उतरने की संभावना है। वहां चार सीटों पर नेशनल कांफ्रैंस लड़ रही है और दो पर कांग्रेस। राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे या नहीं, अभी कांग्रेस को तय करना है। 1949 में जन्में आजाद भी सत्तर साल की उम्र को पार कर रहे हैं।

जो लंबे समय तक भारतीय राजनीति की धुरी बने रहे, उनमें से अधिकांश अब उम्र के उस मुकाम पर पहुंच गए हैं कि अगला चुनाव लड़ना तो दूर, उसमें कोई भूमिका भी शायद ही निभा पाएं। उनके लिए यह आम चुनाव अंतिम भी हो सकता है। इनमें से कई तो ऐसे हैं, जो मौजूदा राजनीति में अप्रासंगिक हो चले हैं। स्वास्थ्य कारणों से कुछ परदे के पीछे से ही अपनी भूमिका अदा करने को विवश हैं। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि राजनीति से एक पीढ़ी जा रही है और दूसरी पीढ़ी उसका स्थान ले रही है।

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