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लोकसभा चुनाव 2019: कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तीसरा माेर्चा लामबंद

लोकसभा चुनाव 2019 मोदी सरकार को रोकने के लिए कश्मीर से लेकर कन्यकुमारी तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी दिल्ली में डेरा डालकर विपक्षी दलों को एक तीसरा माेर्चा बनाने के लिए लामबंद करने में जुटी हैं।

लोकसभा चुनाव 2019: कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तीसरा माेर्चा लामबंद

देश में चुनाव दर चुनाव जैसे-जैसे भाजपा और राजग की स्वीकार्यता बढ़ रही है, उससे विपक्षी खेमे में खलबली मचना स्वाभाविक है, इसलिए कभी सोनिया गांधी कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग को मजबूत करने की कवायद करती दिखती हैं, तो कभी गैर-कांग्रेस गैर-भाजपा दलों की तीसरा मार्चा या फेडरल फ्रंट बनाने कोशिश शुरू हो जाती है।

हाल ही में संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी करीब डेढ़ दर्जन दलों के नेताओं साथ बैठक कर उनका मनटटोल चुकी हैं। अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी दिल्ली में डेरा डालकर विपक्षी दलों को एक तीसरा माेर्चा बनाने के लिए लामबंद करने में जुटी हैं। वे अभी गैर कांग्रेस गैर भाजपा दलों के नेताओं से मिल रही हैं।

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अब तक सात दलों के नेताओं से मिल चुकी हैं। तीसरे मार्चे की सुगबुगाहट तेलंगाना के मुख्यमंत्री व टीआरएस नेता चंद्रशेखर राव की कोलकाता में ममता बनर्जी से मुलाकात के बाद शुरू हुई है। उसके बाद ममता खुद इसमें तेजी ला रही हैं। वे दो दिनों में एनसीपी, राजद, टीडीपी, टीआरएस, डीएमके, शिवसेना और बीजद के नेताओं से मिली हैं।

वे सपा मुखिया अखिलेश यादव व बसपा सुप्रीमो मायावती से भी मिलने वाली हैं। उनकी कोशिश भाजपा के नाखुश नेता यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा और अरुण शौरी को भी तीसरे खेमे में लाने की है। नेशनल काॅन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने ममता की कोशिशों की सराहना की है और उनसे मिलने की इच्छा जताई है। देश के करीब 68 फीसदी भूभाग में भाजपा या राजग की सरकार होने से कांग्रेस समेत सभी क्षेत्रीय दलों को अपना राजनीतिक अस्तित्व खतरे में दिखाई देता है।

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एक तो कांग्रेस तेजी से सिमटती जा रही है, दूसरे, पिछले उपचुनाव में सपा-बसपा गठबंधन की सफलता से गैर-भाजपा गैर-कांग्रेस दल उत्साहित हैं। इसलिए उन्हें तीसरे मोर्चे की संभावना दिखाई पड़ती है। ममता की कोशिश उसी सेे प्रेरित है। लोकसभा के करीब सवा सौ सीटों पर क्षेत्रीय दलों का प्रभाव है। क्षेत्रीय दलों का मुकाबला अपने-अपने राज्यों में या तो भाजपा या कांग्रेस के साथ है।

कुछ क्षेत्रीय दलों का आपस में भी मुकाबला है, लेकिन भाजपा को रोकने के लिए वे हाथ मिलने को भी तैयार हैं। कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी पर कई विपक्षी दलों को भरोसा जम नहीं पा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल है कि गैर-भाजपा गैर-कांग्रेस मोर्चा वजूद में आ पाएगा और यदि आ भी जाएगा तो क्या वह चल पाएगा। इससे पहले 1977 में जनता पार्टी और 1989 में संयुक्त मोर्चा का प्रयोग विफल हो चुका है।

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दोनों ही बार नेताओं की महत्वाकांक्षा की वजह से थर्ड फ्रंट विकल्प नहीं बन सका है। जय प्रकाश नारायण, चरण सिंह, मोराजी देसाई, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, आईके गुजराल, एचडी देवगौड़ा जैसे दिग्गज नेता देश को तीसरा विकल्प देने में सफल नहीं रहे। अवसर सभी को मिले, लेकिन वे बुलबुला ही साबित हुए। दो साल पहले भी नीतीश कुमार, मुलायम, लालू प्रसाद यादव जैसे नेता तीसरा मोर्चा खड़ा करने की असफल कवायद कर चुके हैं।

इस बार भी ममता बनर्जी ने जो फार्मूला दिया है कि तीसरे मोर्चे में शामिल दलों में जिस राज्य में जो बड़ा दल होगा, उसी के नेतृत्व में दूसरे दल काम करेंगे, वह कितना कारगर होगा। कारण कि मायावती, अरविंद केजरीवाल और खुद ममता बनर्जी महतवाकांक्षी नेता हैं, वे दूसरे के नेतृत्व को कितना स्वीकारेंगे? दूसरी अहम बात है कि पवार के अंदर प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा विद्यमान है और सबसे बड़ी बात है कि तीसरा मोर्चा का नेतृत्व कौन करेगा और उसका राष्ट्रीय स्वरूप क्या होगा?

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शरद पवार के अलावा क्षेत्रीय दलों के किसी भी नेता की राष्ट्रीय स्वीकार्यता नहीं है। पहले तीसरे मोर्चे का जैसा हश्र होता रहा है, उसे देखकर लगता नहीं है कि ममता की कोशिश परवान चढ़ पाएगी। 2019 को बहुत दिन नहीं बचे हैं, ऐसे में तीसरे मोर्चे का भविष्य नहीं दिखाई पड़ रहा है। यह सही है कि देश में दो दशक से गठबंधन की राजनीति का दौर है,

लेकिन या तो भाजपा के नेतृत्व में राजग सफल रहा है या कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग। ममता की कोशिश से अगर देश को तीसरा विकल्प मिलता है तो वह लोकतंत्र के लिए अच्छा ही होगा, लेकिन फिलहाल यह कवायद भाजपा व राजग के भय से उत्पन्न घबराहट ही प्रतीत होती है।

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