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लोकसभा चुनाव 2019 : 55 साल तक राज करने वाली कांग्रेस फिसड्डी, देखें पूरे आंकड़े

देश में लगभग 55 साल तक राज करने वाली कांग्रेस की हालत सबसे दयनीय हो गई है। इतनी तो 2014 में भी नहीं हुई थी, जब लोकसभा में उसे कुल 44 सीटें मिली थीं। अभी 2019 का चुनाव हुआ नहीं है, लेकिन जिस तरह से वह सीटों पर समझौता कर रही है, उससे लगता है कि उसका वजूद ही संकट में पड़ता जा रहा है। डॉ़ राजेन्द्र प्रसाद, श्रीकृष्ण बाबू और सत्येंद्र नारायण सिन्हा के बिहार में उसे सहयोगी दलों ने मात्र नौ सीटें दी हैं।

लोकसभा चुनाव 2019 : 55 साल तक राज करने वाली कांग्रेस फिसड्डी, देखें पूरे आंकड़े

देश में लगभग 55 साल तक राज करने वाली कांग्रेस की हालत सबसे दयनीय हो गई है। इतनी तो 2014 में भी नहीं हुई थी, जब लोकसभा में उसे कुल 44 सीटें मिली थीं। अभी 2019 का चुनाव हुआ नहीं है, लेकिन जिस तरह से वह सीटों पर समझौता कर रही है, उससे लगता है कि उसका वजूद ही संकट में पड़ता जा रहा है।

डॉ़ राजेन्द्र प्रसाद, श्रीकृष्ण बाबू और सत्येंद्र नारायण सिन्हा के बिहार में उसे सहयोगी दलों ने मात्र नौ सीटें दी हैं। यही हाल उसका लगभग सभी बड़े प्रदेशों में है। उत्तर प्रदेश, जहां 80 सीटें हैं, में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने नौ सीटों के लायक भी नहीं समझा।

हताशा में वह सभी सीटों पर लड़ने की घोषणा कर रही है। सिवाय उन सीटों के, जहां मुलायम का कुनबा या स्वयं मायावती मैदान में नहीं हों, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक कहीं भी उसे जीतने के लायक नहीं मान रहे। यहां तक कि अमेठी और रायबरेली भी जीतना आसान नहीं है। महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु एवं केरल आदि सभी जगह वह छोटे-छोटे दलों से समझौता कर रही है।

यहां तक कि दिल्ली जैसे स्टेट में भी उनकी पार्टी को उम्मीदवार ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। क्योंकि उम्मीदवारों को लगता है कि यदि आप ने सहयोग नहीं किया तो वे चुनाव जीत नहीं पाएंगे। और दूसरी तरफ दिल्ली कांग्रेस की अध्यक्ष शीला दीक्षित जानती हैं कि अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी से समझौते का मतलब है, दिल्ली विधानसभा का चुनाव आप की झोली में डाल देना। अगले वर्ष ही वहां विधानसभा चुनाव है।

शायद इसीलिए कांग्रेस अपने सारे अस्त्र-शस्त्र उत्तर प्रदेश में झोंक रही है। पंजाब में भले ही उनकी सरकार हो, लेकिन वहां मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह न तो राहुल गांधी को पसंद करते हैं, न ही पार्टी के किसी भी केंद्रीय नेता से संपर्क रखते हैं। हरियाणा में भी उसकी स्थिति पतली है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में उसकी सरकारें हैं, पर पिछले तीन महीनों में उनका कामकाज विवादों के साये में है।

सिवाय छत्तीसगढ़ के कहीं भी कांग्रेस पार्टी को बढ़त मिलती नहीं दिख रही है। ऐसी स्थिति में हर एक की जुबान पर यही एक सवाल है कि कांग्रेस कैसे तिहाई का आंकड़ा छूएगी? अगर ऐसा न हुआ तो किस मुंह से राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने का अपना ख्वाब पूरा कर पाएंगे?

ताजा तालमेल के अनुसार बिहार में राजद अड़ गई और उसने खुद 20 सीटें अपने पास रखी हैं। इसके बाद कांग्रेस का नंबर आया, उसे 9 सीटें मिलीं। जबकि भाजपा के दम पर राजनीति के मैदान में मात्र पांच साल पहले उतरे खिलाड़ी उपेंद्र कुशवाहा अपने दल- राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के खाते में 5 सीटें ले गए। पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम पार्टी को तीन सीटें मिलीं।

मुकेश कुशवाहा की वीआईपी को भी इतनी ही सीटें मिलीं। शरद यादव की लोकतान्त्रिक जनता दल को एक भी सीट नहीं मिली, अलबत्ता शरद यादव को राजद ने अपने सिंबल पर चुनाव लड़ाने की घोषणा की है। इस तरह राजद 19 सीटों पर लड़ेगी। उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी को पांच सीटें देकर लालू यादव ने कांग्रेस और उन्हें लगभग बराबरी पर ला खड़ा किया है। कांग्रेस का यह पतन शर्मनाक है।

दरअसल कांग्रेस अपनी नीतियों के कारण ही गर्त में जा रही है। हर सहयोगी दल उसकी जमीन दबा रहा है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी विरोध तक नहीं कर पा रहे। इसकी एक वजह तो यह है कि राहुल गांधी के अंदर शायद राजनीति में उतरने की न तो तीव्र इच्छा है न जज्बा। किन्तु कांग्रेस की दिक्कत यह है कि वो नेहरू-गांधी परिवार के बगैर जीवित नहीं रह सकती।

कांग्रेस अकेली ऐसी पार्टी है, जिसके पास कोई विचारधारा नहीं है। उसके पास एक तरह से सभी तरह के अवसरवादियों या सभी विचारधारा वालों का गठबंधन है। इनमें घनघोर वामपंथी और घनघोर रूप से कम्यूनल तथा दक्षिणपंथियों की घुसपैठ है।

नतीजा यह है कि कभी एक तत्त्व हावी होता है तो कभी दूसरा। नेहरू से लेकर इन्दिरा गांधी तक ये सारे तत्त्व रहे हैं, मगर उनके भारी व्यक्तित्त्व के तले दबे रहे। देश को उन्होंने जैसा चाहा, चलाया। पर इन्दिरा गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी अपनी महत्त्वाकांक्षा के चलते प्रधानमंत्री बन तो गए, लेकिन न तो उनके पास अनुभव था, और न ही कोई विचारधारा।

वे सिर्फ हवाई जहाज ही उड़ा सकते थे। नतीजा यह हुआ कि जो कांग्रेस 1984 में 414 सीटों पर जीती थी, वही कुल पांच साल बाद लगभग डेढ़ सौ पर सिमट गई। उसके बाद से कांग्रेस को कभी बहुमत नहीं मिला। 1991 में नेहरू-इन्दिरा परिवार से अलग पीवी नरसिंहराव जब प्रधानमंत्री बने तो बहुमत से दूर रहकर भी वे पूरे पांच साल तक सरकार चला ले गए।

नरसिंहराव सरकार गिरने के दो वर्ष बाद ही इन्दिरा गांधी की बहू और राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। मगर तब तक देश को गैर कांग्रेसी विकल्प मिल चुका था। इसीलिए दो बार लगातार भाजपा नीत एनडीए की अटलबिहारी वाजपेयी सरकार रही। वर्ष 2004 में कांग्रेस जीती तो सही, लेकिन भाजपा से पीछे रही।

पर येन-केन-प्रकारेण कांग्रेस ने सरकार बना तो ली किन्तु विरोध के चलते प्रधानमंत्री पद नेहरू-इन्दिरा गांधी परिवार की जगह सरदार मनमोहन सिंह को मिला। इसके बाद 2009 में भी कांग्रेस नीत यूपीए को बहुमत मिला। अब सोनिया गांधी को महसूस हुआ कि बेटे राहुल को प्रधानमंत्री बनाएं, लेकिन राजनीति की सीढ़ियों पर मनमोहन अब उतने सरल नहीं रह गए थे।

सरदार मनमोहन सिंह ने अपना कार्यकाल पूरा किया, कांग्रेस के लोगों ने ही उनकी सरकार की लानत-मलामत करने में कोई कोताही नहीं की। उस समय कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अध्यादेश फाड़ दिया था और पार्टी ने उनकी इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया था। राहुल गांधी की यह बचकाना हरकत ही कांग्रेस के लिए काल बन गई।

पार्टी में चापलूस किस्म के लोग भले उनके साथ हों, मगर जमीनी नेता उनसे दूरी बरतते हैं। इस समय लोकसभा में नेता विरोधी दल और कांग्रेस के मजबूत नेता मल्लिकार्जुन खडगे अक्सर अपनी पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी की हरकतों के कारण परेशानी में पड़ जाते हैं। पर राहुल गांधी हर मरतबे कुछ न कुछ ऐसा कर देते हैं, जिससे कांग्रेस को बार-बार पीछे होना पड़ता है। यही कारण है, कि कांग्रेस निरंतर पतनशील होती जा रही है।

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