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2019 का आम चुनाव भी इन्हीं बिन्दुओं पर तय होगा!

भक्ति और धर्म व्यक्तिगत आस्था के मुद्दे हैं। यह मौलिक अधिकार संविधान ने सभी भारतीय नागरिकों को दिया है। किसी खास धर्म, भाषा, जाति, संप्रदाय, लिंग आदि के आधार पर चुनाव भी नहीं लड़े जा सकते। हालांकि यह हमारी विडंबना है कि चुनाव इन्हीं आधारों पर लड़े जाते रहे हैं।

2019 का आम चुनाव भी इन्हीं बिन्दुओं पर तय होगा!

भक्ति और धर्म व्यक्तिगत आस्था के मुद्दे हैं। यह मौलिक अधिकार संविधान ने सभी भारतीय नागरिकों को दिया है। किसी खास धर्म, भाषा, जाति, संप्रदाय, लिंग आदि के आधार पर चुनाव भी नहीं लड़े जा सकते। हालांकि यह हमारी विडंबना है कि चुनाव इन्हीं आधारों पर लड़े जाते रहे हैं। क्या 2019 का आम चुनाव भी इन्हीं बिन्दुओं पर तय होगा? कोई मंदिर जाए, मस्जिद जाए, चर्च में मोमबत्ती जलाए या कोई और धार्मिक नियम का पालन करे, वे राष्ट्रीय चुनाव के सरोकार कैसे हो सकते हैं? बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बार सभी दुर्गा पूजा पंडालों को 10–10 हजार रुपये देने का ऐलान किया है। बंगाल में करीब 28,000 पूजा–पंडाल सजते हैं। उन्हें बिजली कनेक्शन में भी विशेष छूट दी जा रही है। बेशक ममता जन्म से हिन्दू हैं, लेकिन ये ऐलान हिन्दू सरोकार के नहीं हैं। ममता कितनी मुस्लिमवादी और मौकापरस्त हैं, यह दुनिया जानती है। कभी ममता ने मुहर्रम के लिए हिन्दुओं को दुर्गा पूजा विसर्जन को स्थगित करने का फैसला सुनाया था। राम नवमी और हनुमान जयंती सरीखे अवसरों पर जुलूस और शोभा–यात्राएं आयोजित करने पर पाबंदियां थोपी थी। आरएसएस या भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रैली करने पर भी प्रतिबंध लगाया था। तब कोलकाता हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री को फटकार लगाई थी, लेकिन वैमनस्य तो बीज दिया गया था। सवाल है कि इस बार हिन्दुओं के लिए ममता का ‘मोह’ क्यों उमड़ रहा है? इस संदर्भ में ममता की घोषणाएं और कोिशशें पूर्णत: राजनीतिक और चुनावी हैं। बंगाल की हिन्दू जनता को ही निर्णय लेना होगा कि इस भक्ति में कितना यथार्थ है? कैलाश मानसरोवर की यात्रा के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी िशवभक्त कहे गए। पार्टी प्रवक्ताओं ने भी खूब प्रचार किया कि महादेव ने बुलाया था। अब विभिन्न देवी-देवता राहुल को बुला रहे हैं। आगामी 15 अक्तूबर को वह दतिया (मध्यप्रदेश) जाकर तांत्रिक देवी बगलामुखी के मंदिर में पूजा–पाठ करेंगे। उसके बाद 17 अक्तूबर को वह कोलकाता में दुर्गा पूजा पंडाल में मां दुर्गा की स्तुति करेंगे। अब भगवान राम कांग्रेस और राहुल गांधी को भी प्रिय और स्वीकार्य हैं। गुजरात और कर्नाटक चुनावों के दौरान मंदिर-मठों में राहुल का जाना अब अतीत का मुद्दा हो गया है। अब सवाल यह है कि 47 साल की उम्र में अचानक हिन्दू प्रेम कैसे उमड़ आया है? अब ज्यादातर दैवीय हस्तियां राहुल गांधी को ही बुला रही हैं! दरअसल यह राहुल गांधी का विवेक और विश्वास है कि उनकी श्रद्धा और आस्था किस दैवीय शक्ति में है? उस पर कोई सवाल नहीं है। धर्म और आस्था किसी की बपौती नहीं हैं। खासकर भाजपा और प्रधानमंत्री की, लेकिन भक्ति दिखावटी और चुनावी नहीं होनी चाहिए। राहुल गांधी बीते 14 सालों से सांसद हैं। वह जन्म से हिन्दू हैं या सिर्फ अवसरी जनेऊधारी हैं, इस पर भी कोई सवाल नहीं है। लेकिन महादेव िशव, भगवान राम, मां नर्मदा, बगलामुखी और मां दुर्गा की पूजा के मायने पहली बार उन्हें क्यों समझ आ रहे हैं? ये गतिविधियां तो अभी तक सांप्रदायिक हुआ करती थीं। धर्म और भक्ति में नकल का भाव भी नहीं होना चाहिए। राहुल पूजा-पाठ करते हुए प्रधानमंत्री मोदी की नकल करते हुए लगते हैं। मोदी तो बचपन से ही फ़कीर हैं, जंगलों में भी ध्यान लगाया है, बाकायदा गुरु-भक्ति भी की है, संन्यासी बनना चाहते थे, लेकिन गुरु का दिव्य संदेश था कि देश को उनकी जरूरत है। वह भूमिका निभाने के लिए संन्यास नहीं लेना चाहिए। ऐसी हिन्दुत्व पृष्ठभूमि पूरे नेहरू-गांधी परिवार की नहीं है। राहुल गांधी की आरती का समय सवालिया है, वस्त्र सवालिया हैं, पूजा की पद्धति सवालिया है, लिहाजा बगलामुखी मंदिर के साधुओं-पुजारियों ने निर्देशों की सूची दी है। अब कांग्रेस और राहुल गांधी को गाय, गौशाला, राम वन गमन यात्रा आदि बहुत कुछ याद आ रहा है। फिर अयोध्या के राम मंदिर पर भी अपना बयान और फैसला देश को क्यों नहीं सुना देते? लिहाजा हम इसे राजनीतिक प्रचार मानते हैं, जिसका धार्मिक आस्था से कोई सरोकार नहीं है। हम एक बार फिर राहुल गांधी से ही जानना चाहते हैं कि अब भाजपा सांप्रदायिक है, तो कांग्रेस क्या है? और मंदिर–मंदिर जाने वाले भी ‘धर्मनिरपेक्ष’ हैं तो भाजपा भी धर्मनिरपेक्ष क्यों नहीं है।

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