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लोकसभा चुनाव 2019 : इन 5 दमदार मुद्दों पर सियासी उठापटक

सबसे बड़ा सवाल ये है कि लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के सामने ऐसे कौन से मुद्दे हैं, जिनके आधार पर वे वोट करेंगे। हरिभूमि ने इस पड़ताल के लिए समाज के अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से बात करके समझने की कोशिश की है।

लोकसभा चुनाव 2019 : इन 5 दमदार मुद्दों पर सियासी उठापटक
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छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव के दौरान अब तक चुनाव प्रचार की वह तेजी नहीं दिखी है, जो आमतौर पर देखी जाती है। सबसे बड़ी बात ये है कि गांवों से लेकर शहरों तक आमतौर पर मतदाता खामोश हैं। छत्तीसगढ़ की 11 सीटों में से एक के लिए वोटिंग हो चुकी है। दूसरे व अंतिम चरण के लिए 18 व 23 अप्रैल को मतदान होना है। ऐसे में राज्य में अब भी सबसे बड़ा सवाल ये है कि लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के सामने ऐसे कौन से मुद्दे हैं, जिनके आधार पर वे वोट करेंगे। हरिभूमि ने इस पड़ताल के लिए समाज के अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से बात करके समझने की कोशिश की है। इससे पहले मुख्य राजनीतिक दल अपने राष्ट्रीय घोषणापत्र में बताए मुद्दे के आधार पर मतदान की अपील कर रहे हैं।

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व की सरकार बनने के बाद सियासी हवा में बदलाव आया है। इससे पहले 2009 व 2014 के चुनाव के समय राज्य में कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में होती थी। राज्य में उसके पास अपनी उपलब्धियां बताने का कोई अवसर नहीं था।

इन दोनों चुनावों में कांग्रेस महज एक-एक सीट जीत पाई थी, लेकिन अब दिसंबर 2018 से कांग्रेस सरकार बनने के बाद कांग्रेस लगातार ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि विधानसभा चुनाव में पार्टी ने जो वादे किए थे, उनमें से अधिकांश पूरे किए हैं।

केंद्र के चुनाव में कांग्रेस जो वादे कर रही है, वह भी सरकार बनने के बाद पूरे किए जाएंगे। लिहाजा इस बार राज्य सरकार के तीन महीने के कार्यकाल की उपलब्धियां भी अपरोक्ष रूप से एक मुद्दा बना हुआ है। दूसरी ओर भाजपा पूरी तरह अपनी पार्टी के राष्ट्रीय घोषणापत्र पर केंद्रित है। भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में एक प्रभावी चेहरा भी है।

पहली बार जनता मांग रही है पांच साल का हिसाब

नदी घाटी मोर्चा के संयोजक तथा सामाजिक कार्यकर्ता गौतम बंदोपाध्याय का कहना है कि उनके हिसाब से अब मतदाताओं के साथ आम लोग भी जागरूक हुए हैं। पहली बार ये देखने में आ रहा है कि जनता अब सरकार से उसके पांच साल के कामकाज का हिसाब मांग रही है।

यही नहीं, सरकार बनने के पहले जिस भी दल ने जो वादे किए हैं, उसका भी हिसाब लिया जा रहा है। श्री बंदोपाध्याय के मुताबिक इस बार के चुनाव में कई मुद्दे हैं। इनमें सबसे बड़ा रोजगार का मुद्दा है। देश में मंहगाई भी बढ़ी हुई है, लेकिन इस बारे में कोई राजनीतिक दल कोई बात नहीं कर रहा है।

इस चुनाव में राष्ट्रवाद व देशप्रेम की भी हवा बनी हुई है। चुनाव में भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा है, लेकिन देश के नेता केवल बड़े भ्रष्टाचार के मामलों पर ही बोल रहे हैं। आम जनता के प्रभावित करने वाले भ्रष्टाचार के मुद्दों पर कोई बात नहीं हो रही है।

इसके साथ ही इस बार भी चुनाव में हिंदुत्व एक मुद्दा हो सकता है। साथ ही कश्मीर मामले को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, उसे लेकर भी चुनावी माहौल बनाने की कोशिश हो रही है।

रोजगार, विकास पर हावी राष्ट्रवाद-जातिवाद

उरला इंड्रस्टीज एसोसिएशन के अध्यक्ष अश्विन गर्ग का कहना है कि लोकसभा चुनाव में मुख्य मुद्दा रोजगार व विकास होना चाहिए, ताकि सबको इसका लाभ मिले, लेकिन चुनाव के दौरान ऐसा लग रहा है कि देश में राष्ट्रवाद व जातिवाद का मुद्दा हावी हो गया है।

राष्ट्रवाद का मुद्दा देश में प्रभावी दिख रहा है। जबकि यूपी बिहार जैसे राज्यों में जातिवाद भी एक मुद्दा है। श्री गर्ग ने ये भी कहा कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनने के बाद से विकास का कोई काम नहीं हुआ है।

उल्टे पूर्व सरकार के समय जो काम चल रहे थे, अब वे भी बंद हैं। सरकार ने किसानों की कर्जमाफी, धान की कीमत 2500 रुपए देेने आदि का काम ही अब तक किया है। श्री गर्ग ने कहा कि रोजगार व विकास ही मुख्य मुद्दा होना चाहिए, पर फिलहाल ये प्रभावी नहीं लग रहा है।

मोदी सरकार की विफलता ही बड़ा मुद्दा

रायपुर के अधिवक्ता व नोटरी सीके दानी का कहना है कि उन्हें लगता है कि लोकसभा चुनाव में इस बार केंद्र की मोदी सरकार की विफलता ही सबसे बड़ा मुद्दा है। भाजपा ने पिछले चुनाव में कश्मीर से धारा 370 ख हटाने की बात कही थी, लेकिन पांच साल सरकार में रहने के बाद हटा नहीं पाए।

अब घोषणापत्र में यही मुद्दा ले आए हैं। लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में भी विधानसभा 2018 जैसा माहौल है। देश-प्रदेश में व्यापार ठप है। मिडिल क्लास पूरी तरह से त्रस्त हो चुका है। मोदी सरकार ने नोटबंदी करके लोगों के घरों में डाका डाला है।

इसके साथ ही मोदी सरकार ने मीडिया को पूरी तरह खरीद रखा है। हालत ये है कि चुनाव आयोग भी मोदी सरकार की कठपुतली बना हुआ है। भाजपा ने जो वादे किए उसे निभाया नहीं और अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। देश में मोदी हटाओ की लहर बन रही है।

जनता असमंजस में

किसान मजदूर संघ के प्रदेश संयोजक व किसान नेता ललित चंद्रनाहू का कहना है कि किसी भी दल ने देश के 80 प्रतिशत किसानों के लिए फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की बात नहीं की है। यहां तक फसल बीमा को लेकर कोई बात गंभीरता से नहीं कही है। भाजपा कहती है, किसानों को साल में 6 हजार रुपए देंगे। कांग्रेस ने महीने में 6 हजार रुपए देने की बात कही है।

इसकी वजह से कर्मशील व्यक्ति नाराज हैं। कुछ लोगों ने तो चुनाव आयोग से भी मांग की है कि इस तरह की घोषणाओं पर रोक लगाई जाए। इन हालात में हो रहे लोकसभा चुनाव के दौरान जनता एवं मतदाता असमंजस में हैं, किसे वोट दें, किसे नहीं। मतदान करते समय ही मतदाता इस बारे में फैसला करेंगे कि किस पार्टी को वोट दें।

अर्थशास्त्री की नजर में ये हैं मुद्दे

अर्थशास्त्र के जानकार डॉ. जेएल भारद्वाज का कहना है कि लोकसभा चुनाव में इस समय दो मुद्दे उनकी नजर में प्रभावी हैं। पहला राष्ट्रवाद और देश की सुरक्षा, दूसरा मुद्दा गरीबों को न्यूनतम आय की गारंंटी। भाजपा ने राष्ट्रवाद व देश की सुरक्षा को महत्वपूर्ण बताते हुए पाकिस्तान से देश की अस्मिता की सुरक्षा का मुद्दा उठाया है।

यह विचार लोगों पर प्रभावी हो रहा है। इससे जुड़ी बात ये कि देश में एक ही प्रधान हो सकता है, दो नहीं। देश में एक संविधान हो सकता है दो नहीं। दूसरी ओर कांग्रेस ने गरीबों को न्यूनतम आय गारंटी देने की बात कही है। देश में सबसे अधिक संख्या गरीबों की है।

ये लोग राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे से कोई वास्ता नहीं रखते, इन्हें अपनी रोजी-रोटी की चिंता प्रमुख लगती है। ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता कि कौन सा मुद्दा मतदाता को अधिक प्रभावित कर रहा है। ये भी संभव है कि बड़े लोग मोदी के मुद्दे से प्रभावित हों, लेकिन गरीबों को इससे लेना-देना नहीं है।

अर्थशास्त्री के रूप में अपनी निजी राय व्यक्त करते हुए डॉ. भारद्वाज ने कहा कि लोगों को मुफ्त में रुपए बांटने की कोई जरूरत नहीं है, लोगों को काम मिलना चाहिए। रोजगार की गारंटी होनी चाहिए। किसानों के लिए भाजपा-कांग्रेस जो घोषणाएं कर रही है, वह केवल उनके वोट हासिल करने के लिए है।

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