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पीएम मोदी से भयभीत विपक्ष से लोकसभा चुनाव 2019 से पहले पूछे जाएंगे ये 10 सवाल

कर्नाटक में कांग्रेस और जनतादल सेकुलर गठबंधन की सरकार के मुखिया एचडी कुमार स्वामी के शपथग्रहण के दौरान दिख रही विपक्षी एकजुटता के निहितार्थ को समझना बहुत जरूरी है। पहली बात तो कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन ही बेमेल है। केवल सत्ता हासिल करने के लिए दोनों दलों ने मौकापरस्त गठबंधन बनाया है।

पीएम मोदी से भयभीत विपक्ष से लोकसभा चुनाव 2019 से पहले पूछे जाएंगे ये 10 सवाल

कर्नाटक में कांग्रेस और जनतादल सेकुलर गठबंधन की सरकार के मुखिया एचडी कुमार स्वामी के शपथग्रहण के दौरान दिख रही विपक्षी एकजुटता के निहितार्थ को समझना बहुत जरूरी है। पहली बात तो कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन ही बेमेल है। केवल सत्ता हासिल करने के लिए दोनों दलों ने मौकापरस्त गठबंधन बनाया है।

बड़ा सवाल है कि चुनाव हारने वाले दलों द्वारा गठबंधन बनाकर पिछले दरवाजे से सत्ता पर काबिज होना नैतिक है?

क्या यह लोकतंत्र की मर्यादा का सम्मान है?

क्या यह जनादेश का सम्मान है?

क्योंकि राज्य की जनता ने तो भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनाकर उसे जनादेश दिया था। अगर नहीं है तो फिर इस विपक्षी एकजुटता की नैतिकता पर सवाल उठेंगे ही। क्या इस सरकार के गठन में कर्नाटक के नागरिकों की भावना से खिलवाड़ नहीं हुआ?

दूसरी अहम बात है कि अगर देश के सभी विपक्षी दल अनैतिक गठबंधन के कार्यक्रम में एक मंच पर आते हैं, तो इससे तो यही मतलब निकलेगा कि उन्हें राजनीतिक शुचिता, वैचारिक प्रतिबद्धता, संवैधानिक निष्ठा और मतदाताओं के सम्मान की परवाह नहीं है। ऐसे में देश में यह संदेश तो जाएगा कि विपक्षी दल सत्ता के लिए किसी भी हद अनैतिक राह अपना सकते हैं और जनादेश का मजाक बना सकते हैं। तीसरी अहम बात कांग्रेस की भूमिका है।

कर्नाटक में सत्तासीन थी, जनता ने दूसरे नंबर पर पहुंचा दिया, इसके बावजूद वह दूसरी हारी पार्टी के साथ सरकार बनाकर ऐसे खुश हो रही है, जैसे उसे जीत मिली हो। क्या यह हार के बाद जीत का प्रहसन नहीं है?

चौथी अहम बात इस शपथग्रहण समारोह में विपक्षी दल जिस प्रकार से शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश कर रहे हैं, जनता के बीच तो इनमें से अधिकांश की शक्ति ही नहीं है। कांग्रेस खुद 2014 में 44 पर सिमटी हुई है, करीब पांच साल में उसके हाथ से 14 राज्य छिन गए हैं, खुद राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस करीब 25 चुनाव हार चुकी है।

विपक्ष के दूसरे दलों में से तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी, तेलुगु देशम पार्टी के अध्यक्ष एन चंद्रबाबू नायडू, तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख के़ चंद्रशेखर राव और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल को छोड़ दिया जाय तो बसपा प्रमुख मायावती, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, राजद नेता तेजस्वी यादव, डीएमके नेता स्टालिन, राकांपा प्रमुख शरद पवार, माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, रालोद प्रमुख अजित सिंह, इनेलो नेता अभय चौटाला आदि सभी हारे हुए हैं।

जनता ने इन्हें नकार दिया है। इतना ही नहीं विपक्षी दलों में से क्या ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और माकपा से गठजोड़ करेगी। सीताराम येचुरी ने तो साफ कर दिया है कि बंगाल में वह टीएमसी से समझौता नहीं करेंगे।

दिल्ली में क्या आप और कांग्रेस हाथ मिलाएगी?

कांग्रेस से आंध्र में टीडीपी व तेलंगाना में टीआरएस समझौता करेंगी?

राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में क्या कांग्रेस बसपा, गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी से समझौता करेगी?

हरियाण में कांग्रेस, आप व इनेलो साथ आएंगे?

इसके साथ ही ममता बनर्जी और के चंद्रशेखर राव गैर भाजपा व गैर कांग्रेस गठबंधन की नींव रख रहे हैं और कांग्रेस संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को मजबूत करने में जुटी हुई है, तो ऐसे में विपक्षी किसी एक छतरी में आ पाएंगे और आ भी गए तो उसका भविष्य क्या होगा? विपक्षी एकजुटता में बड़ा सवाल नेता का भी है।

राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी के नेतृत्व को कितने विपक्षी नेता स्वीकार करेंगे?

ऐसे तमाम सवाल हैं, जो विपक्षी एकजुटता की बुनियाद को खोखला बनाते हैं। एक ही कारण नजर आता है कि सभी विपक्षी दल नरेंद्र मोदी और भाजपा के विस्तार के भय से एक मंच पर आ रहे हैं और कर्नाटक से देश में 2019 के लिए विपक्षी एकजुटता का संदेश देने की कमजोर कोशिश कर रहे हैं। जबकि विपक्षी दलों का यह जमावड़ा केवल और केवल राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए दिख रहा है।

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