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विधानसभा चुनाव 2018 बनाम लोकसभा चुनाव 2019 का सेमीफाइनल, एक बार फिर राहुल गांधी की परीक्षा

विपक्षी दलों द्वारा जिन विधानसभा चुनावों का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था, आखिर उनकी घोषणा हो गई है। भाजपा शासित राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ मिजोरम और तेलंगाना में भी नए जनादेश के लिए वोट डाले जाएंगे।

विधानसभा चुनाव 2018 बनाम लोकसभा चुनाव 2019 का सेमीफाइनल, एक बार फिर राहुल गांधी की परीक्षा

विपक्षी दलों द्वारा जिन विधानसभा चुनावों का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था, आखिर उनकी घोषणा हो गई है। भाजपा शासित राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ मिजोरम और तेलंगाना में भी नए जनादेश के लिए वोट डाले जाएंगे। कुछ लोग इन्हें 2019 के आम चुनाव से पहले का सेमीफाइनल बताने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ का कहना है कि इन पांच में से तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में असल परीक्षा भाजपा की नहीं, विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस की ही होने जा रही है।

भाजपा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार पंद्रह साल से शासन में है और राजस्थान का एक ट्रेंड रहा है, हर पांच साल में सरकार बदलने का। ऐसे में यदि भाजपा को किसी राज्य में झटका लगता भी है तो उसे अस्वाभाविक नहीं माना जाएगा। इसके विपरीत यदि कांग्रेस इन राज्यों में भी सत्ता में वापसी में नाकाम रही तो उसके लिए जवाब देना भारी होगा कि भाजपा के खिलाफ इतने वर्षों की एंटी इंकम्बैंसी का फायदा भी वह क्यों नहीं उठा पाई।

जहां तक पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का लोकसभा के आगामी चुनाव पर असर का प्रश्न है तो आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में इन्हीं तीन राज्यों में सफलता मिलने के बाद भाजपा ने निर्धारित समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए थे। तब उसे हार का सामना करना पड़ा था।

इसलिए लोकसभा चुनाव से पहले राज्यों में सफलता या विफलता का असर केन्द्रीय चुनावों पर लाजिमी तौर पर पड़ेगा, ऐसा दावा भरोसे के साथ नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद यह मानने में किसी को गुरेज नहीं होना चाहिए कि यदि भाजपा इनमें से एक या दो राज्यों में भी सत्ता गंवाती है तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में होने वाले इन चुनाव में उसकी विफलता को विरोधी जरूर उछालेंगे। फिर लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के खिलाफ इसे अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करके विरोधी दलों को कांग्रेस की अगुआई में एकजुट करने की कोशिश भी करेंगे,

जो मायावती के ताजा रुख से बिखरते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह माना जा रहा है कि राजस्थान में यदि कांग्रेस को सफलता मिल गई तो यह जीत उसके लिए संजीवनी का काम कर सकती है। आपको बताते चलें कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 2011 के बाद जितने भी विधानसभा चुनाव लड़े हैं, उनमें से कुछ को छोड़कर अधिकांश में उसे हार का ही सामना करना पड़ा है।

इन राज्यों में 2013 में पिछले चुनाव हुए थे, जिसमें कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई थी। राजस्थान में उसे 200 में से केवल 25 सीटें हासिल हुई थी, जबकि भाजपा 160 सीटों के प्रचंड बहुमत से सत्ता में लौटी थी। मध्य प्रदेश में की 230 में से कांग्रेस को मात्र 58 सीटें प्राप्त हुई थी जबकि वहां भी भाजपा ने 165 सीटें हासिल करके दो तिहाई बहुमत प्राप्त किया था।

छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा सीटें हैं और भाजपा ने 49 सीटें हासिल कर तीसरी बार रमन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई थी। कांग्रेस को इसके अगले साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। वह मात्र 44 लोकसभा सीटों पर सिमट गई। पिछले चार-साढ़े चार साल में जितने भी राज्यों में चुनाव हुए हैं, पंजाब को छोड़कर वह हर जगह हारी है।

कर्नाटक में भी उसने बहुमत खो दिया था। भाजपा बहुमत के काफी करीब पहुंच गई थी। उसे सत्ता से दूर करने के लिए कांग्रेस ने जनता दल एस को आगे करके वहां सरकार बनवा ली। आज हालत यह है कि भाजपा और उसके सहयोगियों की केन्द्र के साथ-साथ 22 राज्यों में सरकारें हैं और कांग्रेस चार छोटे प्रदेशों में सिमटकर रह गई है।

कांग्रेस की रणनीति यह थी कि दूसरे दल इन विधानसभा चुनावों में उसे सहयोग करें परंतु बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने हाल में यह ऐलान करके उसे बड़ा राजनीतिक झटका दे दिया कि वह कांग्रेस से गठबंधन नहीं करेंगी। मायावती ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बजाय अजीत जोगी की पार्टी के साथ हाथ मिलाकर साफ कर दिया है कि वह आगामी लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस के साथ किसी तरह का गठबंधन नहीं करेंगी।

इसके पीछे वजह साफ है। एक जमाना था, जब दलित, मुसलिम और ब्राह्मण कांग्रेस के कोर वोटर माने जाते थे। अतीत में दलित बसपा के साथ जुड़ गए। मुसलिम बंट गए और ब्राह्मण भी भाजपा और दूसरे दलों का रुख कर गए। मायावती को आशंका है कि कहीं उनके साथ भी वही खेल न हो जाए तो मुलायम को समर्थन देने पर कांग्रेस के साथ हुआ था।

तब अधिकांश मुसलिम समाजवादी पार्टी की ओर चले गए और कांग्रेस उत्तर प्रदेश में आज तक नहीं संभल सकी। मायावती को डर है कि दलित कहीं कांग्रेस की तरफ न लौट जाएं। वैसे भी मायावती खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में उनका यूपी में खाता तक नहीं खुला और विधानसभा चुनाव में उनका अब तक सबसे करारी शिकस्त हुई।

ऐसे में वह इन राज्यों के चुनावों में कोई असर डाल पाएंगी, विश्वास के साथ कहना मुश्किल है। निश्चित तौर पर यह चुनाव कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य की दृष्टि से अहम होने जा रहे हैं। उनकी अगुआई में कांग्रेस लगातार हारती आ रही है। यदि वह मिजोरम नहीं बनाए रख सके और भाजपा शासित इन तीन हिंदी भाषी राज्यों में से किसी में सेंध लगाने में सफल नहीं हुए तो उनके नेतृत्व पर तो सवाल उठेंगे ही,

लोकसभा चुनाव में विरोधी दलों के साथ गठबंधन का जो सपना वह देख रहे हैं, उसे टूटते हुए भी देर नहीं लगेगी। ऐसे में विरोधी दलों में यह संदेश चला जाएगा कि पंद्रह-पंद्रह साल की एंटी इन्कंबैंसी का फायदा भी यदि राहुल गांधी और कांग्रेस नहीं उठा पा रहे हैं तो लोकसभा चुनाव में पांच साल की एंटी इनकंबैंसी का वो क्या फायदा उठाएंगे। जहां तक भाजपा का प्रश्न है,

उसे थोड़ा बहुत नुकसान राजस्थान में होने की आशंका है परंतु पिछले कुछ वर्षों में जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें पार्टी की सफलता सुनिश्चित करने के लिए नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने जिन रणनीतियों को सिरे चढ़ाकर विरोधियों को चित्त किया है, उसे देखते हुए तो ऐसा ही लगता है कि लोकसभा चुनाव से पहले वह नहीं चाहेंगे कि इनमें से किसी भी राज्य में उन्हें विफलता और कांग्रेस को सफलता की संजीवनी मिले।

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