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तीन तलाक पर लगेगी लगाम: अधिवक्ता फराह फैज

तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में 11 मई से सुनवाई शुरू होने वाली है।

तीन तलाक पर लगेगी लगाम: अधिवक्ता फराह फैज

तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में 11 मई से सुनवाई शुरू होने वाली है। इसमें शामिल तीन पक्षकारों में से एक अधिवक्ता फराह फैज हैं। उनका कहना है कि कुरान या शरीयत के नाम पर मुस्लिम महिलाओं का लंबे समय से शोषण किया जाता रहा है। लेकिन अब बहुत हो गया।

इस पर रोक लगनी ही चाहिए। धर्मग्रंथों की आड़ में मुस्लिम महिलाआें के साथ किए जा रहे छल को बर्दाश्त नहीं किया सकता है। मैं इस विषय को कोर्ट में पूरे विश्वास के साथ उठाएंगी जिसमें मुझे उम्मीद है कि जीत हमारी ही होगी। फराह की भूमिका इस मामले में उस लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है।

क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस खेहड़ ने खुद उन्हें यह बात व्यक्तिगत तौर पर कोर्टरूम में कही है कि आप हर एक बात इस मामले में सुनवाई के दौरान सुनी जाएगी, लिखी जाएगी, उसका रिकॉर्ड रखा जाएगा।

आपका पक्ष सुने बिना इस मामले में कोर्ट अपना फैसला नहीं सुनाएगा। यह बातें फराह फैज ने हरिभूमि संवाददाता कविता जोशी को दिए विशेष साक्षात्कार में कही। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश-

आप कब से तीन तलाक को लेकर लड़ाई लड़ रही हैं। 11 मई को कोर्ट में होने वाली सुनवाई में आपकी क्या भूमिका होगी?

मैं ही यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ रही हूं। मेरे परिवार में मेरे मामू उमर ख्याम सहारनपुरी के समय से ही हम इस विषय पर लड़ रहे हैं। उन्होंने 1982 में एक फिल्म भी लिखी थी ‘निकाह’। यह बड़ी चर्चित भी हुई थी। उनकी बड़ी चाहत थी कि इस मामले को सरकार उठाए और इसे दूर किया जाए । लेकिन उनके जीते जी ऐसा नहीं हो सका और उनकी मृत्यु हो गई।

उसके बाद 2015 में प्रकाश वर्सेज पुलावती के जजमेंट के समय हमने यह बात कोर्ट के सामने रखी थी कि समाज में जो औरतों को परेशानी हो रही है। उसमें केवल हिंदू औरतों को ही दिक्कत नहीं हो रही हैं। इसमें मुस्लिम औरतों पर ज्यादा ज्यादती हो रही है। पॉलीगेमी और त्रिपल तलाक को लेकर ज्यादा उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि यह विषय बहुत गंभीर है।

इस पर एक अलग से पीआईएल फाइल होनी चाहिए। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल को निर्देश दिया कि इस पर एक अलग पीआईएल फाइल कीजिए। तब यह स्वत: संज्ञान कोर्ट की तरफ से लिया गया और अक्टूबर 2015 में मामले को टेकअप किया गया। यह विषय तब से चल रहा है। फरवरी में हमने इसमें इंप्लीडमेंट एप्लीकेशन डाला और कोर्ट में तब से इस मामले में लड़ रहे हैं।

आप कोर्ट में इस मामले में अपना पक्ष किस तरह से रखेंगी?

मैं इसमें मुस्लिम औरतों के फेवर में बात कर रही हूं। जबकि जमीयत उलेमा-ए-हिंद और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी पार्टी रिसपॉंडेंट हैं। लेकिन वो मुसलमान औरतों के खिलाफ बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये वो प्रैक्टिस है जो शरिया का एक हिस्सा है, जिसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता है। लेकिन हमारा कहना है कि ये शरिया का हिस्सा है।

लेकिन उस पार्ट का हिस्सा है, जिसमें आसानी से बदलाव ला सकते हैं। दूसरी बात यह कि बदलाव लाएं या न लाएं। इस चीज का सवाल इसलिए पैदा नहीं होता कि कुरान शरीफ का जो तरीका है तलाक का। वो इतना बेहतरीन और सेक्युलर है कि उसमें किसी भी तरह की सुधार की गुंजाइश नहीं है। अगर हम उसे सीधे फॉलो कर लेंगे तो वो मर्द और औरत दोनों के लिए फायदेमंद है।

उनकी शादीशुदा जिदंगी को वो सुरक्षित करता है, बच्चों को सुरक्षा देता है। इससे बेहतर तरीका और कोई नहीं हो सकता है। इसलिए हमारी मांग है कि कुरान शरीफ का ही तरीका रहना चाहिए, उसका पालन किया जाना चाहिए। ये जो मौलवियों ने नए-नए तरीके निकाल दिए हैं जैसे-तलाक-ए-अहसन, तलाक ए हसन, तलाक ए बिद्दत।

ये सारी चीजें कुरान शरीफ में कहीं नहीं मिलती हैं। बिद्दत का अर्थ होता है इनोवेशन। वो सारी चीजें जो इस धर्म में ओरिजनल स्कीम में नहीं हैं। उन्हें अपने आप से लाया गया है। तो जो चीजें अपने आप लायी जा रही हैं। हम उन्हें नहीं मानेंगे। जो तरीका कुरान शरीफ में दिया गया है, हम उसे मानेंगे। जो तरीका मौलवियों ने लाया है, हम उसे नहीं मानेंगे। यही हमारा कहना होगा।

तीन तलाक को क्या आप कुरीति मानती हैं। क्या इससे मुस्लिम महिलाआें की जिदंगी बर्बाद हो रही है?

ये बिलकुल एक कुरीति है। इससे एक बसा बसाया घर चंद पलों में खत्म हो जाता है। गुस्सा या छोटी बातों पर भी पति अपनी पत्नी को तलाक की धमकी देता रहता है। जब वो दूर बैठा होता है तो किसी दूसरी औरत के साथ अफेयर होने की स्थिति में वो अपनी पत्नी को फोन पर, मैसेज या वाट्सऐप पर तलाक लिखकर भेज देता है। इससे औरत दुखी होती है और एक मिनट में सड़क पर आ जाती है।

ऐसे में घर में जारी झगड़े के वक्त जब औरत कोर्ट में 125 का सूट फाइल करती है मेंटेनेस का। तब पति द्वारा लिखित स्टेटमेंट देने के दौरान उसका वकील उसे राय देता है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के हिसाब से आप ईददत पीरियड तक मुआवजा देने के हकदार हो। झगड़े के तीन महीने बीत जाने के बाद आप लिखकर दो कि मैंने इसे तलाक दे दी है और अब मेरे ऊपर इसकी कोई वित्तीय जिम्मेदारी नहीं है। मैं इस चीज से आजाद हूं।

इस दौरान 125 का मुआवजा मांगने के लिए जो औरतें कोर्ट में आती हैं। तब उन्हें पता चलता है कि उन्हें तलाक दे दी गई है। अब वो घर भी नहीं जा सकती हैं, बच्चों को देखने वाला कोई नहीं है। उन्हें कहीं से भी कुछ राहत नहीं मिलेगी। वो सीधे सड़क पर आ जाती हैं। ये तरीके हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि मौलाना इस पर खामोश हैं। मौलाना इस पर कुरान शरीफ की जो तालीम है वो देते नहीं हैं, उसको बताते नहीं है। कि इस तरीके से तलाक नहीं बनता है।

उल्टे वो इस पर एक फतवा दे देते हैं कि अब आपका तलाक प्रभावी हो गया है। आप अब दोनों एक साथ नहीं रह सकते हैं। अगर दोनों साथ रहना भी चाहें तो वो कहते हैं कि निकाह हलाला करो। फिर आप एक साथ रह सकते हो। इसकी कुरान शरीफ में कोई गुंजाइश ही नहीं ही है। यह चीज ये मौलाना करवाते हैं। यह एक प्रकार से किसी महिला को वैश्या बनाने की पहली सीढ़ी है। यह व्यवस्था कुरान में कहीं नहीं है। इसे मौलानाओं ने दिया है। हम इसे खत्म करवाना चाहते हैं। जो कुरान का सही तरीका है, उसका कोडिफिकेशन हो। हम यही चाहते हैं कि वो समाज व लोगों तक पहुंचे, यही हमारी मांग हैं।

तीन तलाक की प्रथा सदियों से भारत में चली आ रही हैं। कोर्ट ने भी संज्ञान नहीं लिया और आपने भी विषय को बहुत देर से उठाया। ऐसा क्यों?

नहीं ऐसा नहीं है। कोशिश तो हम समाज में काफी समय से कर रहे हैं। पिछले 16-17 साल से इसे लेकर हम काफी परेशानी में भी घिरे रहे। पहले इस मामले को लेकर हमारे बड़े लड़ रहे थे। मेरे मामू उमर ख्याम सहारनपुरी ने तो इस विषय पर पिक्चर भी लिखी थी। लेकिन उन्हें इस बात के लिए समझौता भी करना पड़ा था कि इस फिल्म की स्क्रिप्ट में राइटर के तौर पर उनका नाम नहीं आएगा।

इसके लिए उन्हें जगह-जगह के दारूल इफताआें से 20 फतवे भी लिए थे। तब जाकर यह फिल्म रिलीज हो पायी थी। इतना ही नहीं उन्होंने 20-25 सूट भी फेस किए। ये सभी मुश्किलों का हमने सामना किया है। उस वक्त मैं छोटी थी, लड़ नहीं सकती थी। तो मेरे बड़े लड़ रहे थे। लेकिन आज मैं इस लायक हुई हूं। कि मैं इस लड़ाई को लड़ सकी। दो साल पहले उमर ख्याम सहारनपुरी को मृत्यु हो चुकी है।

उसके बाद 2015 से मैंने इस विषय को लेकर आवाज उठा रखी है और इस मामले को लेकर तब से मैं कोर्ट में हूं। आज यह विषय काफी फैल चुका है। सब लोग इस बात को जान चुके हैं। कि कुरान का तलाक का सही तरीका क्या है, मौलानाआें ने इस बात को कितना घुमा रखा है। पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस पर अपना फेमिली कोर्ट भी ड्राफ्ट किया हुआ है।

मजमुआ कुवानी ने इस्लामी के नाम से जो बकायदा दारूल उलूम और नदवा के सिलेबस में है। यह इतना खतरनाक है कि अगर एक स्कॉर्लर उसे पढ़कर दारूल इफता या दारूल कजा में बैठकर उसके हिसाब से फैसले देगा तो वो निश्चित ही लोगों की जिदंगियां बर्बाद ही करेगा, आबाद नहीं करेगा। यह सब पढ़ने के बाद अब मैं इस स्थिति मैं हूं कि मैं आज इस बात को पूरे विश्वास से कह सकती हूं कि ये सारी चीजें खत्म होनी चाहिए, बैन होनी चाहिए।

जो संस्थान, संगठन इस तरह से हमारे संविधान का, कानून का और इस देश से मिली हुई आजादी का मजाक उड़ा रहे हैं। उन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना चाहिए। नहीं तो यहां वही हाल होगा जैसे पाकिस्तान में जमात-उद-दावा और हाफिज मोहम्मद सईद जैसे लोगों ने मुस्लिम समुदाय को बंधक करके रखा हुआ है। यहां पर पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे लोग सुमदाय को पकड़कर रखेंगे और अपने दायरे से बाहर नहीं आने देंगे। अभी तो इन्होंने मुसलमान को आतंकवादी ही बनाया है। आगे तो ये क्या बनाएंगे।

तीन तलाक खत्म न होने के पीछे क्या हमारी सरकारें भी जिम्मेदार हैं?

बिलकुल हैं, 70 साल हो गए हमें आजाद हुए। लेकिन आज तक हम आजाद नहीं हुए हैं। इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ हमारे नेता लोग हैं और हमारे मौलाना लोग हैं। आज तक हमेशा से ही एपीजमेंट की नीति को अपनाया जाता रहा है। आप हिस्ट्री उठाकर देख लीजिए 1947 से 2015 तक। उसके बाद तो बीजेपी की सरकार आ गई है।

2015 तक यही सिलसिला चलता रहा। इस दौरान जो मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि बने रहे। उनका लक्ष्य राज्यसभा की सीटें पाना होना था। लालबती की गाड़ी लेना था। उनके लिए यह माइने नहीं रखता था कि कौम का क्या होना है, ये किस तरफ जाएगी। वो ये चाहते थे कि ये कौम अपाहिज बनी रहे, मजलूम बनी रहे। अगर ये जाग गई तो उनकी राजनीति बंद हो जाएगी।

इसलिए उन नेताओं ने कभी नहीं चाहा कि ये जो समुदाय है वो विकास करे, इनका भी उद्वार हो, ये लोग भी देश की मुख्यधारा में शामिल हों। उन्होंने हमेशा मुसलमानों और राष्ट्र के बीच एक खाई खोदकर रखी। और उस अंतर को कभी भरने नहीं दिया। यही वजह है कि आज मुसलमान वो गिरते-गिरते इतना गिर गया कि वो दो वक्त की रोटी के लिए भी ब्लेकमेल होकर अपने ऊपर आतंकवादी का टैग लगवाने के लिए भी मजबूर है।

लोग इस हद तक मजबूर हैं कि वो अपना धर्म परिवर्तन करने को भी तैयार हैं। लेकिन आज भी नेता लोग उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। उनकी मजबूरियों का फायदा उठाने में लगे हुए हैं। लेकिन अब हम इस विषय को उठा रहे हैं, कोर्ट में हैं।

इस पर चर्चा के समय से ही देवबंद, पर्सनल लॉ बोर्ड विरोधी मुद्रा में हैं। क्या इस्लाम के हिसाब से उनका विरोध सही है?

उनका विरोध इसलिए नहीं हो रहा है कि ये इस्लाम में कोई दखल हो रहा है, शरीयत के खिलाफ कोई बात हो रही है या शरीयत में कोई छेड़छाड़ हो रही है। विरोध इसलिए हो रहा है कि उन्होंने पहले जो शरीयत में छेड़छाड़ की हुई है, उसकी कहीं कलई न खुल जाए। उनकी जो दुकानें चल रही हैं, वो कहीं बंद न हो जाएं।

लोगों के सामने सच्चाई न आ जाए। इसलिए वो विरोध कर रहे हैं। अगर उन्हें विरोध करना होता और मुसलमान के विकास की बात करते या शरीया के उत्थान की बात करते। तो आज मुसलमान बेरोजगार होकर, अशिक्षित होकर आतंकी होने का एक टैग लेकर नहीं घूम रहा होता। आज हर घर में दस-दस बच्चे पैदा हुए हैं। उनकी रोजी-रोटी, शिक्षा का कोई इतंजाम नहीं है।

ये लोग बच्चों को स्कूल नहीं जाने देते, उन्हें मदरसों की तरफ घूमाते हैं। ये लोग परेशानी आने पर उन्हें कोर्ट में नहीं जाने देते। दारूल कजा की ओर घकेलते हैं। तो ये सब वो इसलिए करते हैं कि लोग अंजान रहे, उनको किसी बात का पता न चले। वो कुंए के मेंढ़क बने रहे और ये उनके सर पर वोट बैंक की राजनीति खेलते रहे। अपनी सीट पक्की करते रहे और अपनी दुकानें चलाते रहे।

आपका फैसला सुने बिना कोर्ट निर्णय नहीं सुनाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने आपको क्या आश्वासन दिया है?

क्योंकि सुको में बीते 30 मार्च में सुनवाई के दौरान कुछ लोगों ने कहा कि वो फेवर में रहेंगे, कुछ ने कहा वो विरोध करेंगे। तब मैंने जस्टिस जे.एस.खेहर से कहा था कि कई केस आए हैं इस मामले में। उसके बाद भी ये प्रैक्टिस चलन में है। मुसलमान औरतें अत्याचार का शिकार हैं, परेशान हैं। राष्ट्र की मुख्यधारा में नहीं आ पा रही हैं। इसके क्या कारण हैं? इसी बात को मैं कोर्ट में रखना चाहती हूं।

तब मैंने कहा लार्डशिप ये वकील हैं। ये लॉ पाइंट पर बात करेंगे। जजमेंट आने के बाद भी और कानून बनने के बाद भी। मैं इस पर बात नहीं करूंगी। मैं कोर्ट को यह बताऊंगी कि ये संगठन समाज में क्या करते हैं? कैसे ये लोगों को गुमराह करते हैं? और उनकी मजबूरियों का फायदा उठाते हैं। इसके लिए मुझे सुना जाए। अगर इसे सुने बिना फैसला दिया गया तो उसका भी हश्र वही होगा जो शाहबानो केस का हुआ था।

उसमें जजमेंट आने के बाद, कुरान के वर्सिस का उसमें कोड़ हो जाने के बाद भी संसद में उसे पलट दिया गया। और जो एक्ट बनाया गया उससे आज तक किसी भी एक मुसलमान औरत को मुआवजा नहीं मिल पाया है। किसी ने एप्लाई ही नहीं किया। क्योंकि वो इस लायक है ही नहीं। तो वो चीजें अब दोहराई न जाए। इसलिए उन चीजों का भी सुना जाना चाहिए जो समाज में फैली हुई हैं। इसके बाद जस्टिस खेहर ने कहा कि आपकी एक-एक बात सुनी जाए, उसे लिखा जाएगा, रिकॉर्ड रखा जाएगा। अगर उसके बिना निर्णय आ जाएगा तो आप मुझे कहिएगा।

क्या केवल तीन तलाक खत्म करने भर से ही मुस्लिम औरतों का विकास हो सकता है?

बिलकुल, अब देखिए जैसे सती प्रथा हिंदू धर्म का अभिन्न हिस्सा था। इसमें औरत अपने पति के साथ दुनिया से वापस जाती थीं। चाहे उसका जीवन कितना ही क्यों न बचा हुआ हो। हिंदू धर्म में वो औरतें भी थीं, जो यमराज से अपने पति के प्राण भी वापस लेकर आयी हैं। और उसी स्त्री को ये समाज यही कोशिश करता था कि वो इस दुनिया से अपने पति के साथ ही वापस चली जाए।

लेकिन राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारक भी आए। उन्होंने सुधार किया और कुप्रथा समाप्त हुई। इसके बाद हिंदू कोड बिल जब आया तो राजेंद्र प्रसाद ने उसका विरोध किया। लेकिन बिल आया और कुरीति समाप्त हुई। ऐसे ही हम चाहते हैं कि तीन तलाक की कुप्रथा भी खत्म हो। लेकिन आज समाज के जनजागरण के अलावा कोर्ट ने भी ये महसूस किया है कि यह विषय बेहद गंभीर है।

मुस्लिम औरतों के अधिकारों का हनन हो रहा है। कोर्ट आज बिलकुल तैयार दिख रहा है कि इसे जल्द से जल्द खत्म कर लिया जाएगा। सरकार ने भी कोर्ट में यह एफिडेविट फाइल किया है कि किसी भी औरत के साथ धर्म के नाम पर कोई नाइंसाफी नहीं होगी। उसके अधिकारों की रक्षा की जाएगी, न्याय दिया जाएगा। मेरे ख्याल में जब कोर्ट तैयार है, सरकार तैयार है तो अब इस मामले में और कोई रोड़ा नहीं आएगा।

11 तारीख से सुनवाई शुरू होने वाली है। फिर रोजाना सुनवाई होगी। आपकी तैयारी पूरी हो चुकी है?

तैयार तो हम पूरी तरह से हैं। यह तैयारी सालों से चल रही हैं। बस दुआ इस बात की कीजिए कि हम अपनी बात को कोर्ट के सामने अच्छी तरह से रख सकें। कोर्ट भी इस बात का इतंजार कर रहा है कि उसके सामने वो सभी तथ्य आएं। जिसकी वजह से ये कुप्रथा सदियों से चलन में है। लेकिन सभी डंडे के यार हैं। जब तक कि एक कानून नहीं बनेगा, सख्त सजा नहीं होगी। तब तक यह नहीं रूकेगा।

क्या इस मामले को उठाने के लिए मोदी सरकार को क्रेडिट दिया जाना चाहिए?

बिलकुल दिया जाना चाहिए। क्योंकि अभी तक जो सरकारें आयी हैं, उसमें कई बार बीजेपी सरकार भी आयी है। लेकिन किसी ने इस तरह की हिम्मत नहीं दिखायी है। पहली बार मोदी के नेतृत्व में चल रही सरकार ने ये हिम्मत दिखायी है और कोर्ट में हलफनामे में यह कहा है कि किसी भी औरत के साथ धर्म-मजहब के नाम पर नाइंसाफी नहीं होगी। इसलिए हम उनके बहुत शुक्रगुजार हैं। लेकिन हम ये चाहते हैं कि इस मामले का फैसला आने के बाद जितने भी बोगस एक्ट हैं उन्हें भी खत्म किया जाना चाहिए। काजी, वक्फ एक्ट खत्म इसमें शामिल हैं। इनकी जगह मैरिज एंड डाइर्वोस एक्ट बने। उसी से सारी चीजें हल हो।

आप आरएसएस के संगठनों के कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं। क्या आपकी पूरी कवायद संघ के इशारे पर चल रही है?

नहीं, ना तो मैं आरएसएस की मेंबर हूं और न ही बीजेपी की। लेकिन मैं सरसंघचालक मोहन भागवत जी की कार्यप्रणाली, जीवनशैली से और उनके आचार-विचार से बहुत प्रभावित हूं। जिस तरह से मैंने इस्लाम को पढ़ा है। इस्लाम जिस धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, नारी सम्मान की बात करता है। ये सारी चीजें मुझे संघ में दिखाई देती हैं। जब मैंने संघ की शाखाओं को अटेंड किया। तो मैंने वहां उनकी नियमित दिनचर्या देखी। तब पता चला कि अनुशासित जीवन जीने की जो शैली इस्लाम मजहब बताता है।

उसकी प्रैक्टिकल ट्रेनिंग संघ में दी जाती है। लेकिन हर कोई संघ व बीजेपी से एक दूरी बनाकर रखता है। लेकिन अगर हम किसी चीज से दूरी बनाकर रखते हैं, तो उसे ठीक से नहीं जान पाते हैं। इसी वजह से मैं संघ के नजदीक गई, बीजेपी के नजदीक गई। मैंने अपने संगठन के नाम के साथ भी संघ शब्द जोड़ा है। ऐसे में कोई मुझे जब कहता है कि आप संघ के एजेंट हैं या बीजेपी के। तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि जब आप किसी बड़े काम को लेकर आगे बढ़ते हैं, तो लोग कुछ न कुछ तो कहते ही हैं।

क्या भविष्य में तीन तलाक पर कोर्ट का निर्णय ऐतिहासिक कहलाएगा। जिससे देश में सामाजिक सुधारों की शुरूआत होगी?

जी हां यह बिलकुल ऐतिहासिक निर्णय कहलाएगा। क्योंकि यह पहला ऐसा अकेला पिटीशन है, जिसे लेकर देश के कौन-कौने में चर्चा चल रही है। इस लड़ाई में हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सब बोल रहे हैं। हर कोई कहता है कि ये गलत तरीका है तलाक का। और किसी मजहब का पता हो या ना हो इसका तो पता चल ही गया है। देश का हर नागरिक इसके साथ है। ऐसे में लड़ाई में जीत न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता।

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