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शादीशुदा गैर मर्द से संबंध बनाने पर महिलाओं को भी होगी सजा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एडल्टरी के अपराध के मामले में कानून को चुनौती देने वाली एक याचिका पांच जजों की बेंच को सौंप दी है।

शादीशुदा गैर मर्द से संबंध बनाने पर महिलाओं को भी होगी सजा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एडल्टरी (व्यभिचार) के अपराध के मामले में कानून को चुनौती देने वाली एक याचिका शुक्रवार को 5 जजों की बेंच को सौंप दी है। इस कानून के तहत विवाह के बाद दूसरी शादीशुदा महिला से शारीरिक संबंध बनाने पर सिर्फ पुरुष को ही सजा देने का प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

इस याचिका पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, डीवाय चंद्रचूड, जस्टिस एएम खानविलकर की बेंच सुनवाई कर रही थी। मामले पर कोर्ट का कहना है कि जब क्रिमिनल कानून महिला और पुरुष के लिए समान है तो ऐसा भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 497 में क्यों नहीं है?

मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वो 1954 में चार जजों की बेंच और 1985 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं है, जिसमें IPC की धारा 497 महिलाओं से भेदभाव नहीं करता।

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पिछले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने साल 1954 के फैसले में धारा 497 की वैधता को बरकरार रखते हुए कहा था कि ये 'राइट टू इक्वलिटी' की तरह मौलिक अधिकार के खिलाफ नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को जारी किया था नोटिस

मामले पर पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। इसमें कोर्ट ने कहा कि जीवन के हर तौर-तरीकों में महिलाओं और पुरुषों को समान माना गया है तो फिर इस मामले में महिलाओं से अलग बर्ताव क्यों? जब अपराध महिला और पुरुष दोनों की रजामंदी से हुआ हे तो महिला को सजा क्यों नहीं दी जाती।

सेक्शन 497 के तहत महिला को नहीं हो सकती सजा

एडल्टरी की परिभाषा तय करने वाले IPC के सेक्शन 497 में सिर्फ मर्दों को सजा देने का जिक्र है। इस सेक्शन के मुताबिक, किसी शादीशुदा महिला से उसके पति की मर्जी के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाने वाले पुरुष को 5 साल तक की सजा का प्रावधान है। लेकिन महिला को पीड़ित मानते हुए उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती। चाहे संबंध दोनों की रजामंदी से ही क्यों न बनाया गया हो।

किसने किया कानून को चैलेंज?

केरल मूल के इटली निवासी एक्टीविस्ट जोसफ साइन ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर की है। जिसमें कहा गया है कि 150 साल पुराना ये कानून मौजूदा दौर में बेमानी है। ये कानून तब बना था जब समाज में महिलाओं की हालत कमजोर थी। इसलिए एडल्टरी के मामलों में उन्हें विक्टिम का दर्जा दे दिया गया था।

याचिकाकर्ता के वकील की दलील

याचिकाकर्ता के वकील कालेश्वरम ने अपनी दलील में कहा है कि आज औरतों की स्थिति मजबूत हौ। यदि कोई महिला अपनी मर्जी से अवैध संबंध बनाती है तो केस सिर्फ उस मर्द पर नहीं चलना चाहिए।

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