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जानिए रानी पद्मावती की असली कहानी

अधिकतर इतिहासकार पद्मिनी को काल्पनिक पात्र मानते हैं।

जानिए रानी पद्मावती की असली कहानी

फिल्मकार संजय लीला भंसाली की फ़िल्म 'पद्मावती' को लेकर काफी दिनों से विवाद चल रहा है। लेकिन पद्मावती का चरित्र कितना असली है और कितना काल्पनिक, इस बात पर विद्वानों में मतभेद है।

बता दें कि दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश का दूसरा शासक था। वो एक विजेता था और उसने अपना साम्राज्य दक्षिण में मदुरै तक फैला दिया था। इसके बाद इतना बड़ा भारतीय साम्राज्य अगले 300 सालों तक कोई भी शासक स्थापित नहीं कर पाया था।

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वह अपने मेवाड़ चित्तौड़ के विजय अभियान के बारे में भी प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि वो चित्तौड़ की रानी पद्मिनी की सुन्दरता पर मोहित था।

पद्मावती का पहली बार जिक्र

पद्मावती नाम की महिला चरित्र का जिक्र पहली बार मध्यकालीन कवि मलिक मुहम्मद जायसी की कृति 'पद्मावत' में आता है, जो की अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के 250 साल बाद लिखी गई।

पद्मावती का काल्पनिक चरित्र

कई विद्वानों ने पद्मावती को काल्पनिक चरित्र माना है। राजस्थान के राजपुताने के इतिहास पर काम करने वाली इरा चंद ओझा ने भी इसकी वास्तविकता को स्वीकार नहीं किया और साफ कहा है कि ये चरित्र पूरी तरह काल्पनिक है।

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पद्मावती और अमीर खुसरो

कुछ इतिहासकारों ने अमीर खुसरो के रानी शैबा और सुलेमान के प्रेम प्रसंग के उल्लेख के आधार पर और 'पद्मावत की कथा' के आधार पर चित्तौड़ पर आक्रमण का कारण रानी पद्मिनी की सुन्दरता को ठहराया है।

पद्मावती का जौहर

28 जनवरी 1303 ई. को सुल्तान चित्तौड़ के किले पर अधिकार करने में सफल हुआ। राणा रतन सिंह युद्ध में शहीद हुये और उनकी पत्नी रानी पद्मिनी ने अन्य स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया, ये चर्चा का विषय है।

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राजपूतों का कत्ल

ज्यादातर इतिहासकार पद्मिनी को काल्पनिक पात्र मानते हैं। किले पर अधिकार के बाद सुल्तान ने लगभग 30,000 राजपूत वीरों का कत्ल करवा दिया था। उसने चित्तौड़ का नाम खिज्र खां के नाम पर 'ख़िज़्राबाद' रखा और खिज्र खां को सौंप कर दिल्ली वापस आ गया।

'पद्मावत मध्यकाल' का बहुत ही महत्वपूर्ण महाकाव्य है। कुछ लोगों का मानना है कि जायसी सूफ़ी कवि थे। उस समय सूफ़ी कवियों ने जो रचनाएं कीं उसमें उन्होंने चरित्रों को प्रतीकात्मक रूप में ग्रहण किया. उदाहरण के लिए मधुमती, मृगावती आदि का नाम लिया जा सकता है।

यहां जिस पद्मावती का चरित्र गढ़ा गया वो भी राजपुताने की पद्मावती तो नहीं थी, वो सिंघलगढ़ या सिंघल द्वीप जोकि लंका का नाम है, वहां से आती थी।

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रचना के अनुसार, जब राजा रत्नसेन पद्मावती को सिंघल द्वीप जाते हैं, उस समय तक राजा की एक पटरानी भी थी जिसका नाम नागमती था। पद्मावती के आ जाने के बाद रचना में जो संघर्ष दिखाया गया है उसका वर्णन काल्पनिक है।

लेकिन राजस्थान में अब कुछ लोग इसे असल चरित्र बता रहे हैं। इस पर जो फ़िल्म बनी है उसमें अलाउद्दीन का जो चरित्र चित्रण किया गया है उस पर कुछ लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई है।

लेकिन दिलचस्प बात है कि पद्मावत की रचना 16वीं शताब्दी की है जबकि अलाउद्दीन खिलजी का काल 14वीं शताब्दी की शुरुआत से शुरू होता है।

बताते चले की अलाउद्दीन का काल 1296 से 1316 तक था। इसलिए इस बात की संभावना अधिक है कि कथाकार ने कहानी को आगे बढ़ाने के लिए इमेजिंग या कल्पना का सहारा लिया हो।

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अलाउद्दीन के काल में जो रचनाएं लिखी गईं, उनमें तो पद्मावती नाम का कोई चरित्र भी नहीं मिलता।

अलाउद्दीन के समकालीन अमीर खुसरो थे। उनकी तीनों कृतियों में रणथंभौर और चित्तौड़गढ़ पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का अलांकारिक वर्णन है लेकिन उसमें भी पद्मीवती जैसे किसी चरित्र का नाम नहीं है।

आगे की स्लाइड में जानें अलाउद्दीन का कार्यकाल और पद्ममावती की रचना

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